

दिल में जिसको बैठाना था उसकी जगह और बहुत कुछ बैठा लिया। अब सरकारी नौकरी का लालच बैठा हुआ है दिल में, क्यों? सब जानते हैं क्यों! गाड़ी मिल जाएगी, सरकारी बंगला मिल जाएगा, कोई निकाल नहीं सकता। कोई निकाल नहीं सकता बड़ा आनंद रहता है, अज़ीम-ओ-शान-शहंशाह। ग्यारह बजे जाओ,…

जिनके दिल नहीं टूटते उनके लिए जीवन में कोई प्रगति संभव नहीं है। जो अपनी असफलता को भी चुटकुला बनाए घूमते हैं, जिन्हें लाज ही नहीं आती, उनके लिए जीवन में कोई उन्नति, उत्थान संभव नहीं है।
इंसान ऐसा चाहिए जो लक्ष्य ऊँचा बनाए। और लक्ष्य फिर ना मिले तो…

अगर आप अपने लक्ष्यों में बार-बार असफलता पाते हैं तो इसकी वजह संकल्पशक्ति, विल पावर इत्यादि का अभाव नहीं है। इसकी वजह ये है कि आपके लक्ष्य हैं ही ग़लत। सही लक्ष्य तो प्रेम-प्रसंग की तरह होता है, वह पकड़ लेता है, आप उसे फिर छोड़ना भी चाहोगे वो आपको…

सफलता ऐसे नहीं देखी जा सकती कि कौन कहाँ पहुँचा। सफलता ऐसे नापिए कि किसने कितनी चुनौतियों का सामना किया आगे बढ़ने के लिए। व्हाट आर द ऑड्स (चुनौतियाँ क्या थीं), बाधाएँ क्या थी? तुम जितना भी आगे बढ़े हो, उतना आगे बढ़ने के लिए तुमने कितना जीता है, कितना…

ज़िंदगी में पहले कुछ बन जाओ, कोई आंतरिक मक़ाम हासिल कर लो, फिर तुम्हें समझ में आएगा न कि रिश्ता किससे बनाना है। अब रिश्ता बना लिया छब्बीस की उम्र में ही, तुम्हारा लक्ष्य हो सकता है ज़िंदगी में ऊँचा उठना; जिससे तुमने रिश्ता बना लिया उसे ना उठने से…

जीवन परिवर्तन के लिए जिसको मैं कहता हूँ ठंडी उर्जा, शाश्वत उत्साह चाहिए। एक भीतर ऐसी हार्दिक प्रेरणा चाहिए जो दसों साल थमे नहीं, कमे नहीं, मिटे नहीं। गर्म जोश में वो बात होती ही नहीं है। गर्म जोश के खिलाफ़ तो सावधान रहा करिए, वो फ़िल्मी होता है।
“मैं…

सही लक्ष्य की खातिर जियो। दिल में एक सही उद्वेश्य होना चाहिए। उसके बाद किसी पॉजिटिव थिंकिंग की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। ये चीज़ इतनी ज़बरदस्त मिल गई है, प्यार हो गया है इससे, अब मजबूर हैं इसके सामने। अब चाहें भी पीछे हटना तो हट नहीं सकते। जब ऐसा हो…

प्रश्नकर्ता: एक तरफ़ तो आप कहते हैं कि, "तुम इसलिए पैदा हुए हो कि तुमको मुक्ति मिले और प्रकृति भी चाहती है कि तुम मुक्त हो जाओ", लेकिन दूसरी तरफ़ आप कहते हैं कि प्रकृति तुमको बाँधकर रखना चाहती है। तो इन दोनों बातों में तो विरोधाभास है।
आचार्य प्रशांत:…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी आपसे एक मार्गदर्शन चाहते हैं कि हमें अपना लक्ष्य किस तरह से निश्चित करना चाहिए? क्या हमें अपना लक्ष्य अपने स्वभाव के अनुसार बनाना चाहिए कि हमारे लिए क्या अच्छा होगा?
आचार्य प्रशांत: नहीं, लक्ष्य मात्र स्वभाव के अनुसार नहीं बनता। आपका स्वभाव ये…

प्रश्नकर्ता: हमें सब पता होता है कि हमारे लिए क्या अच्छा है, क्या बुरा है, हमें जीवन में आगे बढ़ने के लिए क्या करना है, मगर फिर भी हम वो नहीं कर पाते। हर बार एक नया लक्ष्य तय करते हैं, नया जोश होता है, नई प्लानिंग (योजना) करते हैं…

प्रश्नकर्ता: कभी-कभी ऐसे हालात आ रहे हैं लगता है कि जो भी मैं इस वक्त कर रहा हूँ, जैसे कॉलेज जाना इत्यादि, यह सभी निरर्थक है, और ऐसा एहसास मुझे अक्सर इसलिए आता है क्योंकि मैं देखता हूँ कि जीवन की दौड़ में सभी मुझसे आगे निकल चुके हैं और…

प्रश्नकर्ता: क्या खोज रहे हैं हम?
आचार्य प्रशांत: यह जितना कुछ हम देखते हैं, यह जो कुछ भी हम अनुभव करते हैं, सुनते हैं, इसका अनुभव हमें यूँ ही नहीं हो रहा। थोड़ा गौर करेंगें तो आपको भी दिखेगा। कुछ भी आपको व्यर्थ ही नहीं दिख रहा, अकारण ही नहीं…

आचार्य प्रशांत: तुम मुझे बताओ 'सफलता' क्या है?
प्रश्नकर्ता: काम करने के बाद जो खुशी मिलती है उसे सफलता बोलते हैं।
आचार्य: अगर मैं काम करने के बाद खुश हूँ तो काम करने के दौरान मैं कैसा हूँ?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम! कुछ ही महीने हुए हैं आपसे यूट्यूब के माध्यम से जुड़े हुए। 'वैराग्य शतकम' का इक्कीस्वाँ श्लोक मुझे सता रहा है, मेरे वजूद पर सवाल उठा रहा है। मैं कॉर्पोरेट में काम कर रहा हूँ तीन साल से, आप समझ ही गए होंगे मैं पापियों के…

प्रश्न: आचार्य जी, आपकी सफलता के पीछे क्या राज़ है?
आचार्य प्रशांत: राज़ कुछ भी नहीं है। बात सिर्फ़ इतनी-सी थी कि सक्सेस (सफलता) वगैरह का कभी बहुत सोचा नहीं। हर क़दम पर जो उचित लगा वो करता गया, उसी से अगला क़दम निकलता चला गया। सक्सेस की बात सोचकर…

प्रश्न: मन सही लक्ष्य से क्यों भटक जाता है? जीवन के लक्ष्य के प्रति हमेशा एकनिष्ठ कैसे रहें?
आचार्य प्रशांत: प्रेम।
कामना इतनी तीव्र होनी चाहिए कि एक पल को भी भूलो नहीं, कुछ और याद ही न आए। अपनी पीड़ा के प्रति बड़ी संवेदनशीलता होनी चाहिए। तुम्हें पता होना

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कल मेरी परीक्षा है, लेकिन मन शांत नहीं है। मैंने प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय वर्ष में विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया। पर इस वर्ष ऐसा हो रहा है कि मन बड़ा अशांत है। कुछ ही घण्टे बचे हैं। आपका आशीर्वाद मिल जाएगा तो कल का दिन…

प्रश्न: आचार्य जी, मुझे अपनी आगे की पढ़ाई के लिए कुछ ऐसे विषयों का चुनाव करना पड़ रहा है जिनमें मेरी बहुत ज़्यादा रुचि नहीं है। ऐसा लगता है उनमें नकली रुचि जगानी पड़ेगी। लेकिन ऐसा भी लग रहा है कि वो विषय आगे कैरियर में बहुत लाभ देंगे, और…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अपने लक्ष्य को कैसे हासिल करें?
आचार्य प्रशांत: जो तुम उपलब्ध करना चाहते हो, अपने-आप को बार-बार याद दिलाओ कि वो तुम क्यों उपलब्ध करना चाहते हो, और वो उपलब्ध करके क्या मिलेगा। उपलब्धि से पहले की प्रेरणा क्या है, इंस्पिरेशन क्या है – ये अपने-आप को…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, पढ़ाई-लिखाई में मन नहीं लगता है। कक्षा में जब पढ़ाई-लिखाई होती है, तो ध्यान पढ़ाई से भटकता रहता है। कक्षा छोड़कर, बाहर मैदान में खेलता ही रहता हूँ। इस कारण मेरे अंक भी कम आते हैं। ध्यान भटकता रहता है, और बहुत आलस भी रहता है। आपके …

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम जिसके पीछे भाग रहे हैं वो अल्टीमेट डिज़ायर (आख़िरी इच्छा) क्या है?
आचार्य प्रशांत: तुम भाग रहे हो तो कोई तो उद्देश्य होगा। और अगर बिना उद्देश्य जाने भाग रहे हो, तो फिर स्पष्ट है कि क्या उद्देश्य है। एक आदमी जो बिना उद्देश्य जाने भाग…

प्रश्न: अगर हम चालाकी नहीं दिखाएँगे, तो क्या हमें कुछ नहीं मिलेगा?
आचार्य प्रशांत: चालाकी दिखाने वाले को क्या मिलता है? क्या मिलते देखा है?
प्रश्नकर्ता:

क्यों नहीं पूरे होते हमारे संकल्प?
इस विषय में हमें यह बाज अच्छी तरह जान लेनी चाहिए कि आमतौर पर हम जिस भी लक्ष्य के पीछे भागते हैं, वो हमें किसी और से मिला होता है। नतीजतन, उसके प्रति लिए संकल्प में भी बहुत दम नहीं होता। जो लक्ष्य हमें…

प्रश्न: आचार्य जी, हम जीवन में संकल्प करते हैं और पाते हैं कि जल्द ही फीका पड़ने लगता है। ऐसा क्यों?
आचार्य प्रशांत: सही बात तो ये है कि जो काम शुरू किया, वो शुरू ही इसलिए नहीं किया कि ख़ुद समझ आई थी कोई बात, वो शुरू इसलिए…

आचार्य प्रशांत: सवाल आया है रोहित से, कि ‘परिणाम’ शब्द से क्या अर्थ है?
अब ऐसा तो है नहीं कि ‘परिणाम’ शब्द हम पहली बार सुन रहे हैं। ‘परिणाम’ शब्द से हमारा वास्ता रोज़ ही पड़ता रहता है। रोज़ाना ही ये हमारे सामने आता रहता है। तो ‘परिणाम’ शब्द के…

प्रश्नकर्ता: मैं थोड़ा सोचती ज़्यादा हूँ, काम कम करती हूँ और वो (मेरे पति) तो सोचते ही नहीं हैं, बस काम करते हैं। इतना ज़्यादा, इतना ज़्यादा कि अगर काम नहीं है तो बेचैन हो जाते हैं। और मेरा है कि काम तो लास्ट (अंत) में, जब टाला नहीं जा…

वक्ता: आप जो कुछ भी पाना चाहते हो, वो पहले ही मौजूद है। अगर पहले से ही मौजूद ना हो तो वो इंस्टिंक्ट ही नहीं उठेगी पाने की।
श्रोता: हम ये कह सकते हैं कि जो लक्ष्य है मूलतया वो गन्दगी को साफ़ करने का है ताकि जो हम हैं,…

वक्ता: जिसे तुम विश्वास कह रहे हो वह दो तरह का होता है: पहला, विश्वास और दूसरा श्रद्धा, और इन दोनों में ज़मीन आसमान का अंतर है। इसको ध्यान से समझिएगा। विश्वास का अर्थ होता है कि मैंने जाना नहीं है। विश्वास जो है, दो तरह का होता है, पहले…

प्रश्न: सर, प्रश्न यह था कि हम अपना ऑब्जेक्टिव एक लाइन में कैसे लिखेंगे रिज्यूम के अन्दर।
वक्ता: तो सवाल यह है कि सी.वी पर क्या लिखना है या यह है कि पता नहीं है कि क्या करना है?

प्रश्न: सर, अपना लक्ष्य निर्धारित करते हैं भविष्य के लिये। तो वो कैसे करते हैं?
वक्ता : कल्पना कर कर के।
श्रोता : कल्पना तो कुछ नहीं है।

प्रश्न: सर, ये बात तो पक्की ही है कि हम दूसरों की इसलिए सुनते हैं, 100 आदमियों की इसलिए सुनते हैं क्यूँकी हम ख़ुद जान नहीं पाते। हम जानने से मना कर देते हैं, हम जान नहीं पाते। तो कैसे हम किसी भी चीज़ को जाने?
वक्ता: कुछ भी कैसे…

आचार्य प्रशांत: ब्रह्म विद्या सूक्ष्तम विद्या है और ये श्रेष्ठतम मनों के लिए है। हम बहुत भूल करेंगे अगर हम सोचेंगे कि जो गए-गुज़रे किसी काम के नहीं होते, समाज से पूरे तरीके से त्यक्त जो लोग हैं, निर्वासित किस्म के, आध्यात्मिकता उनके लिए है। कि जब बूढ़े हो जाओ…

प्रश्न: क्या इंसान का एक ही काम होता है – रहना और सोना? लेकिन सर, योजना आयोजित तो करनी पड़ती है। हर इंसान को खाना चाहिए, और इंसान खाने के लिए किसी की हत्या तक कर देता है। ज़िन्दगी में एक उद्देश्य तो है – खाना। जानवर तक को अगर…

प्रश्न: हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है?
वक्ता: न हो तो?
श्रोता १: तो हमारे और जानवरों में क्या फ़र्क रह जाएगा?

वक्ता: आप बिंदु पर बैठते हैं। आपका आसन वहाँ पर है, वहाँ कुछ बदलता नहीं है। आपका आसन थोड़ा सा डोलता है, मन का क्षेत्र शुरू हो जाता है। वहाँ तीन खंड होते हैं – जाग्रृत, सुषुप्ति, स्वप्न। दो ही मान लीजिये – जगना और सोना। पर दो खंड तो…

प्रश्नकर्ता: सर, जब भी आपको सुनता हूँ, जितनी भी देर आपके साथ होता हूँ तो ऐसा लगता है मेरे भीतर एक ऊर्जा है। कैसे यह ऊर्जा हर समय बनी रहे? कैसे रोकूँ?
आचार्य प्रशांत: तुम कहते हो कि जब यहाँ होते हो, मेरे साथ, मेरे सामने, तो ऊर्जा होती है।…

पारस में अरु संत में, बड़ो अन्तरो जान। वो लोहा कंचन करे, ये कर दे आप समान।। ~ संत कबीर
वक्ता: “पारस और संत में, एक अन्तरो जान, एक लोहा सोना करे, एक कर दे आप समान।”

प्रश्न: सर, जीवन में कुछ चीज़ें हैं जो फ़ायदे की हैं और कुछ नुक़सानदायक| ये बातें तो अनुभव से ही सीखी जा सकती हैं ना?
वक्ता: फ़ायदे का फ़ायदा क्या है? तुम बचपन से ही तो फ़ायदे की तलाश में नहीं थे| तुम्हें ये किसने सिखाया कि फ़ायदा बड़ी बेहतरीन…

प्रश्न: प्रश्न है, ‘जिसको हम बौद्धिक स्तर(इंटेलिजेंस कोशिएंट, आई.क्यू.) बोलते हैं वो अलग-अलग व्यक्तियों में अलग-अलग होता है, इस बात का क्या अर्थ है?’
वक्ता: शायद ये सवाल यहाँ से आ रहा है कि मैंने ‘इंटेलिजेंस’ शब्द का प्रयोग किया था| मैंने कहा था कि मूलतः तुम ‘इंटेलीजेंट’ हो, तो…

प्रश्नकर्ता: सर बात दाएँ-बाएँ इसलिए हो गई क्योंकि आपने हमें एक दर्जे से ऊपर बात कही, पर कुछ समझ नहीं आया। मेरा स्तर इतना नहीं कि उतना तक सोच पाऊँ। मैं सोचने की कोशिश कर रही थी लेकिन समझ नहीं आ रहा था।
आचार्य प्रशांत: तुमको इसलिए समझ में नहीं…

श्रोता १: क्या कोई ऐसा लक्ष्य हो सकता है, जिसका पहले से कोई पता ना हो?
वक्ता: जो बाहर से लक्ष्य आयेगा, वो और कुछ नहीं होगा, पास्ट की पुनरावृति होगी। तुम्हारा सवाल है कि क्या कोई ऐसा लक्ष्य हो सकता है, जिसका पहले से ही पता नहीं…

वक्ता: जहाँ कहीं भी तुम परम लक्ष्य बनाओगे, उससे चाहते तो तुम एक प्रकार की ख़ुशी ही हो। यही तो चाहते हो और क्या चाहते हो? परम लक्ष्य नही होता है। परम ये होता है कि उसी ख़ुशी में रह कर तुम ने अपने बाकी सारे काम करे। छोटे- बड़े,…

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ग्रेटर नोएडा। जीबीयू में आयोजित एक कार्यक्रम में पहुंचे आचार्य प्रशांत ने कहा कि महाशिवरात्रि केवल अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि यह मनुष्य को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि शिव को केवल मूर्ति या रूप में सीमित कर देना उनकी व्यापकता को संकुचित करना…


अगर मैं लगातार खुश ही हूँ तो काम करने के बाद…
आचार्य प्रशांत: जो चालाकी नहीं दिखाते, वैसे लोग तो शायद तुम्हारे संपर्क में आए ही नहीं।…
वक्ता: तो उसी…
“हममें और इंसानों में कोई फर्क ही नहीं…
The UGC regulations are only a spark. The explosive material is something far more intimate: the unexamined conviction, lodged in the deepest chamber of the collective psyche, that birth determines worth and that this determination carries divine sanction. The atmosphere itself is the disease; the regulation is at best a painkiller. India’s foundational scriptures contain the strongest possible arguments against caste. The Upanishadic view begins where hierarchy ends.