प्रश्न: प्रश्न है, ‘जिसको हम बौद्धिक स्तर(इंटेलिजेंस कोशिएंट, आई.क्यू.) बोलते हैं वो अलग-अलग व्यक्तियों में अलग-अलग होता है, इस बात का क्या अर्थ है?’
वक्ता: शायद ये सवाल यहाँ से आ रहा है कि मैंने ‘इंटेलिजेंस’ शब्द का प्रयोग किया था| मैंने कहा था कि मूलतः तुम ‘इंटेलीजेंट’ हो, तो शायद इसलिए मन में ये संदेह उठ रहा हो| तुमने अभी तक यही सुना है कि ‘इंटेलिजेंस’ तो अलग-अलग होती है, और उसको उस आई.क्यू., बौद्धिक स्तर नाम की विधि से नापा भी जाता है| तो मूलतः सब एक समान ‘इंटेलीजेंट’ कैसे हो सकते हैं?
देखो जिस ‘इंटेलिजेंस’ की मैं बात कर रहा हूँ, वो आई.क्यू.,बौद्धिक स्तर नहीं है, बिल्कुल भी नहीं है| वो ‘इंटेलिजेंस’ है तुम्हारी समझ, तुम्हारी दृष्टा हो पाने की क्षमता| तुम बस अलग हट कर, साक्षी होकर घटना को देख पा रहे हो, यही ‘इंटेलिजेंस’ है|
साक्षी हो पाने की क्षमता को ही ‘इंटेलिजेंस’ कहते हैं| कुछ हो रहा है, मन में कुछ हो रहा है, दुनिया में कुछ हो रहा है, और मैं उसको बस देख पा रहा हूँ, बिना उसमें लिप्त हुए|यही ‘इंटेलिजेंस’ है|
जिसको तुम एक विधि के द्वारा नापते हो, एक बौद्धिक स्तर(इंटेलिजेंस कोशिएंट), उसका संबंध तो कुशलता, निपुणता से है| उसका वास्तविक ‘इंटेलिजेंस’ से बड़ा कम संबंध है| उसमें नापा जाता है तुम्हारी संख्यात्मक निपुणता(न्युमेरिकल एबिलिटी) कैसी है, उसमें स्मृति(मेमोरी) का बड़ा स्थान होता है, कि तुम कितना जल्दी बातों को याद रख पाते हो| बौद्धिक स्तर की योग्यता बहुत सारे कामों में व्यवहारिक रूप से उपयोगी है, पर वो ‘इंटेलिजेंस’ नहीं है| वो तो एक प्रकार का कौशल मापने का स्तर है, एक दक्षता है| उसका अपना उपयोग है, पर उसको हम ‘इंटेलिजेंस’ ना समझ लें|


