
बहुत मोटी मार पड़ती है ठीक तब जब तुम्हें ज़रा भी अंदेशा नहीं होता कि मार खाने वाले हो। माया भी कोई छोटी-मोटी खिलाड़न थोड़े ही है। बेहोशों को छोड़ देती है, वह कहती है, “यह तो पहले ही गिरा हुआ है इसको क्या गिराएँ? शू!” वह भी पसंद करती…

Yesterday I was reading that the male snake chases the female snake following her scent, the trail of her odor. Snakes can’t generally see much. They can’t even hear much. So, the deodorant that you use is Prakriti and the purpose, too, is prakritik. The odor of the female…

माया एक औसत ज़िंदगी का नाम है।
उफ्! कैसे पकड़ोगे?
द एवरेज लाइफ़!
माया, वो चेहरा है जिसमें कुछ खास नहीं। तुम उसे याद ही नहीं रख सकते, इतना साधारण चेहरा है माया। माया जीवन के उन दिनों, उन घण्टों, उन हफ़्तों, उन पलों का नाम है जिनमें कुछ खास


अहंशब्देन विख्यात एक एव स्थित: पर:। स्थूलस्त्वनेकतां प्राप्त: कथं स्याद्देहक: पुमान्।।
“ ‘अहं’ शब्द से प्रसिद्ध परमात्मा एकमात्र स्थित है, अर्थात् वह अनेक तत्वों का संघात नहीं है। फिर जो स्थूल है और अनेक भावों को प्राप्त हो रहा है, वह देह पुरुष कैसे हो सकता है?”
~अपरोक्षानुभूति (श्लोक ३१)

हरि है खांड रेत मांहि बिखरी, हाथी चुनी न जाई। कहैं कबीर गुरु भली बुझाई, चींटी होय के खाई।। ~ संत कबीर
आचार्य प्रशांत: (प्रश्न पढ़ते हुए) कबीर साहब का एक श्लोक भेजा है, कह रहे हैं कि इसका अर्थ बताएँ। और कहते हैं कि “इन्होंने भी नित्य और अनित्य…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बताया तो बहुत गया है कि विषम परिस्थितियों में भी व्यवहार कैसा करें पर जब वैसी विपरीत या विषम परिस्थितियाँ सामने आती हैं, तब सारा ज्ञान हिरा जाता है (खो जाता है) और आदमी अपना आपा खो बैठता है।
आचार्य प्रशांत: वह तो होगा ही, ज्ञान से…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, कभी-कभार संसार निरर्थक लगता है लेकिन ज़्यादा समय संसार ही सच लगता है। दिल है कि मानता नहीं, क्या करें? आपके चरणो में आश्रय दो।
आचार्य प्रशांत: संसार सच लगता है तो कोई ग़लती नहीं हो गई। झूठ भी नहीं है संसार। बात सच-झूठ की नहीं…

आचार्य प्रशांत: जीवात्मा प्रकर्ति से युक्त है। युक्त माने? जुड़ा हुआ, योग में। जो चीज़ किसी से योग में हो उसे कहते हैं युक्त। जीवात्मा त्रिगुणी प्रकृति से योग में है तो जीवात्मा गुणों से युक्त है। जीवात्मा प्रकृति से योग में है इसका क्या अर्थ है?
बात समझते चलिएगा।…

आचार्य प्रशांत: विश्व है, पूरा ब्रह्मांड ही है — ऐसा किसको लगता है? विश्व है भी इसका प्रमाण, या गवाह, या अनुभोक्ता कौन है? अहं है और मात्र अहं है उसके अलावा कोई नहीं है। आप ही हैं जिसके लिए ये विश्व है। यह तो छोड़िए कि आप नहीं रहेंगे…

आचार्य प्रशांत: राघव ने प्रश्न पूछा है, कहते हैं, “आचार्य जी प्रणाम, ज़िन्दगी में लगातार एक अभाव का विचार बना रहता है। जब किसी चीज़ में डूब जाता हूँ, या जब संतों को सुनता हूँ और पढ़ता हूँ, तो वो चला जाता है, लेकिन पुनः वापस आ जाता है। कोई…

प्रश्नकर्ता: कहते हैं कि जैसे ही इंसान भक्ति की तरफ़ बढ़ता है, तो प्रकृति उसमें बहुत अड़चनें डालती है, माया बहुत अड़चनें डालती है। हमारे इधर बिरादरी में एक महात्मा जी रहे थे, महात्मा मंगतराम जी, उन्नीस-सौ-तिरपन में उनका देहांत हो गया था, तो उन्होंने भी बहुत - मतलब जैसे…

Questioner: My question is not about concept, it's more about attitude. I see in the spiritual community, normally we spend a lot of time talking about thoughts, about god, about concepts, about the subjectivity of things and when we go back to our daily life, we just do as everybody…

Questioner (Q): Isn't everything just Māyā? Then what is God? What is the relationship of God with Māyā?
Acharya Prashant (AP): You see, Māyā becomes all things, correct? Māyā becomes all things. So, you find it expressed in both ways. Sometimes, it is said—Māyā becomes all things…

आचार्य प्रशांत: सत्य को मायापति कहा गया है; समझते हैं। माया क्या? वो जो हमें प्रतीत होता है, जिसकी हस्ती के बारे में हमें पूरा विश्वास हो जाता है, पर कुछ ही देर बाद या किसी और जगह पर, किसी और स्थिति में हम पाते हैं कि वो जो बड़ा…

प्रश्नकर्ता: प्रकृति हमारे प्रति इतनी बेरहम और असम्वेदनशील क्यों होती है?
आचार्य प्रशांत: प्रकृति ने ऐसा क्या किया भाई? तुम प्रकृति ही हो, तुम प्रकृति के वो विशिष्ट उत्पाद हो जिसके माध्यम से स्वयं प्रकृति निर्वाण खोज रही है। मैं बार-बार कहता हूँ न कि तुम अहंकार हो; अहंकार कोई…

आचार्य प्रशांत: कोई ऐसा नहीं है जो समाप्त हो जाना चाहता हो। बड़ी अजीब बात है ये; कोई आयु हो, कोई वर्ण हो, कोई रंग हो, कोई लिंग हो, कोई देश हो, कोई काल हो - जैसे हम सब के भीतर बने रहने की एक निरंतर अभीप्सा रहती है। कोई…

आचार्य प्रशांत: देखो प्रकृति से, संसार से भागा नहीं जा सकता, लेकिन प्रकृति और संसार तुम्हारे लिए आख़िरी चीज़ भी नहीं हो सकते। बहुत ध्यान से समझो इस बात को। ना इनसे भाग सकते हो—किससे?—दुनिया से, संसार से। अपने शरीर से बाहर निकलकर भाग सकते हो? तो संसार से बाहर…

Acharya Prashant: Māyā and Brahm are beginningless for you. ‘For you’ because the question is coming ‘from you’. So, to you, these two are beginningless. Why are these two beginningless? Why can’t their origin be known? Because Māyā does not comprise of an entity called ‘Māyā*’. *…

Questioner (Q): My question is about renunciation. I find within me the response about what I have to do, like renunciation and poverty. I see in myself inside but somehow I am fighting very strongly with the opposite in the opposite direction. And I never find the bravado to really…

प्रसंग:
प्रभु का रूप अतुल्य है
मन्दोदरी ने रावण से कहा, “यदि तुम्हें सीता को पाने की इतनी ही इच्छा है, तो तुम उसके पास राम का रूप धारण करके क्यों नहीं चले जाते?” तुम तो मायावी हो, माया का इतना उपयोग तो कर ही सकते हो। रावण ने उत्तर

तव माय बस फिरऊॅं भुलाना ।
ताते मैं नहिं प्रभु पहिचाना ।।
~ संत तुलसीदास

प्रश्नकर्ता: सत्य और माया, दोनों अच्छे लगते हैं। बहुत चंचलता होती है। कोई उपाय बताएँ।
आचार्य प्रशांत: एक माया बुरी लगती है, एक माया अच्छी लगती है—ये मत कहो कि सत्य भी अच्छा लगता है और माया भी अच्छी लगती है। सत्य के सामने बुरा लगना ठहर सकता है, बंद…

प्रश्नकर्ता (प्र): आचार्य जी, शरीर और ब्रह्मांड एक ही ऊर्जा से बने हैं, तो इस शरीर में हम वो परम ऊर्जा कैसे महसूस करें?
आचार्य प्रशांत (आचार्य): थोड़ी-सी ऊर्जा बढ़ जाती है तो थर्मामीटर लेकर दौड़ते हो। और ब्रह्मांड की परम ऊर्जा तुम्हारे शरीर में आ गई तो क्या करोगे?…

प्रश्नकर्ता: अक्सर ऐसा सुनने में आता है कि किसी के पास कोई सिद्धि है और किसी के पास कोई शक्ति है। आध्यात्मिक जगत में ऐसे चर्चे बड़े सुनने को मिलते हैं। जीवन में मुमुक्षा जागृत हो या समाधि प्राप्त हो, इन सब में इन सिद्धियों का क्या महत्व होता है?…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, समय बदल रहा है, और जिस क्षेत्र में मैं कार्यरत हूँ उस क्षेत्र में धीरे-धीरे मंदी आ रही है। मैं इस मंदी से आंतरिक रूप से बहुत ज़्यादा प्रभावित हुआ हूँ। कारणवश अब आर्थिक रूप से भी मैं बिल्कुल खाली हो गया हूँ, और इस प्रक्रिया में…

सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति।। 3.33 ।।
sadṛiśhaṁ cheṣhṭate svasyāḥ prakṛiter jñānavān api

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। कल आपने अनुशासन के बारे में कहते हुए 'शासन' शब्द को अलग करके उसके विषय में भी बताया था। आपने कहा था कि, "व्यक्ति वास्तव में जान जाए कि कौन है, जो सच्चा है और उसमें शासित हो जाए।"
मैं जब अपना जीवन देखता हूँ तो…

आचार्य प्रशांत: बहुत पुराना ग्रंथ है हमारा - श्रीमद्भगवद्गीता, इतना तो हम सब जानते ही हैं। उसमें इंसान के छह शत्रुओं की, छह दुश्मनों की बात करी है श्री कृष्ण ने। ठीक है?
उनको नाम दिया है - षड-रिपु(छह दुश्मन)
और क्या हैं वो?

प्रश्न: आचार्य जी, प्रणाम। कई सालों से साधना कर रहा हूँ, कुछ समय से आपको सुन रहा हूँ, जीवन में स्पष्टता बहुत हद तक आई है। अब जैसे-जैसे आगे बढ़ता जा रहा हूँ, मेरी बीमारियों का पता चल रहा है। जैसे साधना में आगे बढ़ रहा हूँ, माया का हमला…

प्रश्न: आचार्य जी, जीवन की छोटी-छोटी बातों में भी भ्रमित रहता हूँ कि क्या करना उचित है और क्या अनुचित।
आचार्य प्रशांत: एक फ़िल्म देखी थी मैंने। उसमें समझ ही में न आए कि नायक इतना पिट क्यों रहा है। पिक्चर का क्लाइमेक्स है, चरम पर पहुँच चुकी है। दुश्मनों…

प्रश्न: योग वाशिष्ठ में स्त्री भोग एवं संगत को 'सर्पिणी' की संज्ञा दी गई है। परंतु फ्राइड ने कहा है कि लैंगिक इच्छाओं के दमन से मानसिक विकृतियाँ पैदा होती हैं। अध्यात्म और मनोविज्ञान में ये विरोधाभास कैसा?
आचार्य प्रशांत: अध्यात्म तुमको बता रहा है कि - "जिसको तुम रस्सी…

स्त्रियाँ प्रेम में उन्मत्त होकर जिस काम को करने लग जाती हैं, ब्रह्म भी उन्हें उस काम से नहीं हटा सकता।
*~ श्रृंगार शतकम, श्लोक संख्या 54*
जब कोई स्त्री अपने को तुम्हारे चरणों में रख देती है, तब अचानक तुम्हारे सिर पर ताज की तरह बैठ जाती है।

Question: Acharya Ji Pranaam! Once we are attached to anything, there is so much of suffering.
Please help me understand this.
Acharya Prashant Ji: End of suffering is just an idea for us. Let’s rather talk about suffering – that is a fact, that is our daily experience. The questioner

Question: When I sit in open Sky, I see the vastness, and the vastness feels like Freedom to me. It gives me lot of calmness and peace. The cool breeze, the rains, the Sun, these elements of physical nature give a lot of peace.
These elements of nature, especially the…

Questioner (Q): Lots of layers of Ego are dropping and I wake up in the middle of the night and realize that I cannot trust anyone, anything including myself. My mind is going crazy and underneath it, I think I know all the answers to my questions. It feels so…

Questioner: Our education system is at fault because it has been designed to make you a worker, not to live life the way it should be.
Speaker: Yes, yes. It is designed to make you into ‘something’. At some places, it is designed to not to make you…

They ask, “When someone passes eighty then they play. Will they play before eighty?” I say.
~ Rumi
वक्ता:

सभि जीअ तुमारे जी तूं जीआ का दातारा
नितनेम (रहरासि साहिब)
All living beings are Yours.You are the Giver of all souls.

वक्ता: स्रोत में मिल जाना ही स्रोत को जानना है| स्रोत को जानने के लिये स्रोत में विलीन हो जाओ|
श्रोता १: सर, इस पीड़ा को, दूरी को कम करने में भी तो श्रद्धा की ही ज़रुरत है न? यह दूरी ही पीड़ा है, ‘मेरे होने’ और ‘बस होने’ के…

Question: Sir, daily life puts forth so many insane demands and expectations that it becomes difficult to understand what to follow and what not to follow.
Answer: We all have felt that occasional boredom while reading our texts. We all have often felt that inertia to stay back at home…

माया छोड़न सब कहै, माया छोरि न जाय|
छोरन की जो बात करु, बहुत तमाचा खाय|
वक्ता: छोड़ने की बात वैसे ही है, जैसे आधी रात कहे, ‘मुझे अपनी कालिमा छोड़ देनी है’| पाए बिना छोड़ने का ख्याल वैसा ही है कि जैसे रात कहे कि सूरज ना आए, क्योंकि

वक्ता: तुम नाव के पास जाते हो तो पाते हो कि नाव का जो नाविक है, वो सो रहा है। तो नाव आब पूरी तरह से लहरों के हवाले है। जो भी बड़ी लहर आएगी उस पर बाहर से प्रभाव डालेगी और अपने साथ ले जाएगी, फिर दूसरी लहर आएगी…

हास्य है…
prakṛitiṁ yānti bhūtāni nigrahaḥ kiṁ kariṣhyati
Even a man of wisdom behaves according to his own nature. Being follows by their nature. What can restraint do?
~ Shrimad Bhagavad Gita, Chapter 3,…
~…
Speaker: “Sabhi jeea tumaare jee tuun jeea ka daataara (All living beings are Yours. You are the Giver of all souls).”
The question is:…
THis is AP Article

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय:।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्।।29।।
samo ’haṁ sarva-bhūteṣhu na me dveṣhyo ’sti na priyaḥ
ye bhajanti tu māṁ bhaktyā mayi te teṣhu chāpyaham
The same am I to all beings: to Me, There is none hateful or dear. But…

Questioner: Greetings, Acharya Ji. My question is that wherever I look on social media platforms, whether it is YouTube, Instagram, or Twitter, when I read the comment sections under the content posted there, I repeatedly see an allegation being made against the Foundation and against you, that you too are…

हर युवक या युवती के जीवन में एक पड़ाव आता ह है जब उसे ये निर्णय लेना होता है कि वे आम साधारण जिंदगी जीना चाहता है या अपनी कहानी खुद लिखना चाहता है। ऐसे में डर, लालच, संशय अक्सर हमारे मन को घेर लेते हैं और सही निर्णय ले…



The UGC regulations are only a spark. The explosive material is something far more intimate: the unexamined conviction, lodged in the deepest chamber of the collective psyche, that birth determines worth and that this determination carries divine sanction. The atmosphere itself is the disease; the regulation is at best a painkiller. India’s foundational scriptures contain the strongest possible arguments against caste. The Upanishadic view begins where hierarchy ends.