
ग्रेटर नोएडा। जीबीयू में आयोजित एक कार्यक्रम में पहुंचे आचार्य प्रशांत ने कहा कि महाशिवरात्रि केवल अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि यह मनुष्य को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि शिव को केवल मूर्ति या रूप में सीमित कर देना उनकी व्यापकता को संकुचित करना…


Questioner(Q): What is the process of clarity? Is it just listening with immersion and no resistance? What is Truth? How we decide it?
Acharya Prashant (AP): Listening without effort, plus if there is Truth in what you hear, there is change and transformation, and that Truth becomes the master. We…


प्रश्नकर्ता : आचार्य जी, अध्यात्म उपनिषद् कहता है कि तुम अहंकार को गला दो, देख लो कि तुम ये भी नहीं हो, वो भी नहीं हो। तो जो देखने वाला है, वो भी तो अहंकार ही है? कृपया प्रकाश डालें। आचार्य प्रशांत : सवाल ये है कि, “उपनिषद् कहता है…

पारस में अरु संत में, बड़ो अन्तरो जान। वो लोहा कंचन करे, ये कर दे आप समान।।~कबीर साहब प्रश्नकर्ता: जैसा कि आप कहते हैं, कि जितना जल्दी हो सके अपने को पूरा अर्पण कर दो, या ख़त्म कर दो, पर यदि इसे समझेंगे और करेंगे, तो अपने अपूर्ण स्थिति…

◾ एक ही जाति होती है - वह है "बल"। बल विकसित करो अपने भीतर।
◾ आत्मा का इस पूरे देह व्यापार से कोई लेना देना ही नहीं।

यदा नाहं तदा मोक्षो
यदाहं बन्धनं तदा।
मत्वेति हेलया किंचिन्-
मा गृहाण विमुंच मा॥८- ४॥

न दूरं न च सङ्कोचाल्लब्धमेवात्मनः पदम्। निर्विकल्पं निरायासं निर्विकारं निरञ्जनम्॥
आत्मा का स्वरुप न दूर है, न निकट। वह तो प्राप्त ही है, तुम स्वयं ही हो। उसमें न विकल्प है, न प्रयत्न है, न प्रकार है और न मल।

अर्जयित्वाखिलानर्थान् भोगानाप्नोति पुष्कलान्। न हि सर्वपरित्यागमन्तरेण सुखी भवेत्॥
कोई जगत के समस्त पदार्थों का उपार्जन करके अधिक-से-अधिक भोग प्राप्त कर सकता है, परन्तु सबका परित्याग किए बिना कोई सुखी नहीं हो सकता।
~ अष्टावक्र गीता, अध्याय १८, श्लोक २

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। हाल ही में उत्तर गीता के बारे में ज्ञात हुआ। अभी तक श्रीमद्भगवद्गीता के कृष्ण-अर्जुन संवाद को सुना था। अब कुरूक्षेत्र के युद्ध पाश्चात्य हुए इस संवाद को सुन कर अचरज हुआ। इस संवाद की ज़रूरत क्या थी? राजपाठ मिल जाने के बाद अर्जुन दोबारा कृष्ण…

यद यच्च कुरुते कर्म शुभं वा यदि वाशुभं। पूर्वदेहकृतं सर्वमवश्यमुपभुज्यते।।
~ उत्तर गीता (अध्याय ३, श्लोक १२)
भावार्थ: मनुष्य शुभ अथवा अशुभ जो जो कर्म करता है, पूर्वजन्म के किए गए उन सब कर्मों का फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है।

एवं पूर्वकृतं कर्म नित्यं जन्तुः प्रपद्यते। सर्व तत्कारणम येन विकृतो अयमिहागतः।।
भावार्थ: इस प्रकार जीव सदा अपने पूर्व जन्मों में किए हुए कर्मों का फल भोगता है। यह आत्मा निराकार ब्रह्म होने पर भी विकृत होकर इस जगत में जो जन्म धारण करता है, उसमें कर्म ही कारण है।

देहाभिमानपाशेन चिरं बद्धोऽसि पुत्रक । बोधोऽहं ज्ञानखंगेन तन्निष्कृत्य सुखी भव ॥

"मुक्ति के लिए अपने मन से वस्तुओं के उपभोग की इच्छा को विष की तरह त्याग दो, क्षमा, सरलता, दया, संतोष तथा सत्य का अमृत की तरह सेवन करो" ~ अष्टावक्र गीता, अध्याय १, श्लोक २
आचार्य प्रशांत: अष्टावक्र गीता, पहला अध्याय, दूसरा श्लोक।
अष्टावक्र दया की बात क्यों कर…

Questioner (Q): Acharya Ji, please explain what Shri Ramakrishna meant by the following:
“One day a Marwari gentleman went to Sri Ramakrishna and asked him for permission to present him with some thousands of rupees. But the master had nothing but a stern refusal for this well-meant offer. He said,…

अपने पर्व पर मुझे जन्म दिया लगा मुझे मैं कृतकृत्य हुआ
पर जैसे-जैसे समझ बढ़ी वैसे-वैसे प्रश्न उठा जो जगत तुमसे ही छल करता उसमें मुझे भेजा क्यों भला
जिस संसार में दुर्पयुक्त होता तुम्हारा ही निशान है उस संसार में बोलो फिर मेरा क्या स्थान है?

विलसन्ति महाभोगैर्विशन्ति गिरिगह्वरान्।
निरस्तकल्पना धीरा अबद्धा मुक्तबुद्धयः॥५३ ||
~ अष्टावक्र गीता

आत्मा ब्रीति निश्चित्य भावाभावी च कल्पिती।
निष्कामः कि विजानाति किं ब्रूते च करोति किम्॥
~ अष्टावक्र गीता

क्व निरोधो विमूढस्य यो निर्वन्धं करोति वै।
स्वारामस्यैव धीरस्य सर्वदासावकृत्रिमः।।
~ अष्टावक्र गीता (अध्याय 18 श्लोक 41)

तत्त्वं यथार्थमाकर्ण्य मन्दः प्राप्नोति मूढतां।
अथवा याति संकोचम - मूढः कोऽपि मूढवत्॥
~ अष्टावक्र गीता (अध्याय 18 श्लोक 32)

कुत्रापिन जिहासास्ति नाशो वापि न कुत्रचित्।
आत्मारामस्यधीरस्य शीतलाच्छतरात्मनः॥
~ अष्टावक्र गीता (अध्याय १८ , श्लोक २३)

अनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रयदूषितं।
असारं निन्दितं हेयमि ति निश्चित्य शाम्यति॥९- ३॥
अनुवाद: यह सब अनित्य है, तीन प्रकार के कष्टों (दैहिक, दैविक और भौतिक) से घिरा है, सारहीन है, निंदनीय है, त्याग करने योग्य है, ऐसा निश्चित करके ही शांति प्राप्त होती है।

निर्वासनो निरालंब: स्वच्छन्दो मुक्तबन्धनः । क्षिप्त: संस्कारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत् ।।
~ अष्टावक्र गीता, अध्याय १८, श्लोक २१
अनुवाद: वह वासना, आलंबन, परतंत्रता आदि के बंधनों से स्वच्छंद होता है। प्रारब्ध रूपी वायु के वेग से उसका शरीर उसी प्रकार गतिशील रहता है, जैसे वायु वेग से सूखा पत्ता।

प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा नैव धीरस्य दुर्ग्रहः।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वा तिष्ठते सुखम्।।
~अष्टावक्र गीता
अध्याय १८, श्लोक २०

असंसारस्य तु क्वापिन हर्षो न विषादिता। स शीतलहमना नित्यं विदेह इव राजये॥
~ अष्टावक्र गीता, अध्याय १८, श्लोक २२
अनुवाद: संसार मुक्त पुरुष को ना कहीं कोई हर्ष होता है, ना विषाद, उसका मन सदा शीतल होता है और वह विदेह के समान शोभायमान होता है।

ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता त्रितयं नास्ति वास्तवं।
अज्ञानाद् भाति यत्रेदं सोऽहमस्मि निरंजनः॥ २-१५॥
ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता यह तीनों वास्तव में नहीं हैं, यह जो अज्ञानवश दिखाई देता है वह निष्कलंक मैं ही हूँ

क्व मोहः क्व च वा विश्व क्व तद् ध्यानं क्व मुक्तता ।
सर्वसंकल्पसीमायां विश्रान्तस्य महात्मनः ॥
~ अष्टावक्र गीता
( अध्याय १८ श्लोक १४ )

कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खिद्यते।
मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम्।।१३.२।।
अनुवाद: शारीरिक दुःख भी कहाँ(अर्थात् नहीं) हैं, वाणी के दुःख भी कहाँ हैं, वहाँ मन भी कहाँ है, सभी प्रयत्नों को त्याग कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ।

समस्त कल्पनामात्र - मात्मा मुक्तः सनातनः।
इति विज्ञाय धीरो हि किमभ्यस्यति बालवत्॥
~ अष्टावक्र गीता

व्यामोहमात्रविरतौस्वरूपादानमात्रतः।
वीतशोका विराजन्ते निरावरणदृष्टयः ॥६॥
अनुवाद: अज्ञान मात्र की निवृत्ति होते ही, तथा स्वरूप का बोध होते ही, दृष्टि का आवरण भंग हो जाता है और तत्वज्ञ पुरुष शोकरहित होकर शोभायमान होते हैं।

विहाय वैरिणं कामम-र्थं चानर्थसंकुलं।
धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रा ना दरं कुरु॥१०- १॥
अनुवाद: जब तक जीवन स्वार्थों के पीछे भाग रहा है, तब तक जीवन में आनंद का होना ना मुमकिन है।

भवोऽयं भावनामात्रो न किंचित्परमर्थतः।
नास्त्यभावः स्वभावनां भावाभावविभाविनाम्।।
~ अष्टावक्र गीता (अध्याय 18 श्लोक 4)

सर्वभूतेषु चात्मानं
सर्वभूतानि चात्मनि।
मुनेर्जानत आश्चर्यं
ममत्वमनुवर्तते॥३- ५॥

निर्ध्यातुं चेष्टितुं वापि
यच्चित्तं न प्रवर्तते।
निर्निमित्तमिदं किंतु
निर्ध्यायेति विचेष्टते॥१८- ३१॥

*स्वातंत्र्यात्सुखमाप्नोति स्वातंत्र्याल्लभते परं। *
स्वातंत्र्यान्निवृतिं गच्छेत्स्वातंत्र्यात् परमं पदम् ॥५०॥
आचार्य प्रशांत: स्वतंत्रता से ही सुख की प्राप्ति होती हैं। स्वतंत्रता से ही परम तत्व की उपलब्धि होती है। स्वतंत्रता से ही परम शांति की प्राप्ति होती है। स्वतंत्रता से ही परम पद मिलता है।

धीरो लोकविपर्यस्तो वर्तमानोऽपि लोकवत्।
नो समाधिं न विक्षेपं न लोपं स्वस्य पश्यति॥१८- १८॥
अनुवाद: तत्त्वज्ञ पुरुष तो संसारियों से उल्टा ही होता है, वह सामान्य लोगों जैसा व्यवहार करता हुआ भी अपने स्वरुप में न समाधि देखता है, न विक्षेप और न लेप ही।

भवोऽयं भावनामात्रो न किंचित् परमर्थतः।
नास्त्यभावः स्वभावनां भावाभावविभाविनाम् ॥१८-४॥
~ अष्टावक्र गीता
अर्थ: विश्व तुम्हारी चेतना में उभरा हुआ एक चित्र है। विश्व तुम्हारी चेतना में उठती-गिरती एक तरंग है। जिसने जान लिया कि क्या अस्तित्वमान है, और क्या अस्तित्वहीन है वह जन्म मरण के पार चला जाता है। वह

येन विश्वमिदं दृष्टं स नास्तीति करोतु वै।
निर्वासनः किं कुरुते पश्यन्नपि न पश्यति॥१५॥
अनुवाद: जिसने इस विश्व को कभी यथार्थ देखा हो, वह कहा करें कि नहीं है, नहीं है,

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, पिछले एक महीने से मैं अष्टावक्र गीता पढ़ रहा हूँ। तो मैंने अपने जीवन में भी देखा, शांति के रास्ते में शरीर और मन बीच-बीच में बाधा बनते हैं। तो इसी विषय पर जब मैंने अष्टावक्र गीता देखा; उसमें दो श्लोक मिले जो इससे रिलेवेंट थे,…

कस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात्।
जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमं गताः॥९- २॥
~ अष्टावक्र गीता
हे पुत्र! इस संसार की (व्यर्थ) चेष्टा को देखकर किसी धन्य पुरुष की ही जीने की इच्छा, भोगों के उपभोग की इच्छा और भोजन की इच्छा शांत हो पाती है।

I am not the body, nor have I the body
मैं देह नहीं हूँ, न देह मेरी है
अष्टावक्र गीता, (अध्याय-2, श्लोक-22)

निःसंगो निष्क्रियोऽसि
त्वं स्वप्रकाशो निरंजनः।
अयमेव हि ते बन्धः
समाधिमनुतिष्ठति॥१-१५॥

वाग्मिप्राज्ञामहोद्योगं जनं मूकजडालसं।

शून्या दृष्टिर्वृथा चेष्टा विकलानीन्द्रियाणि च ।
न स्पृहा न विरक्तिर्वा क्षीणसंसारसागरे ॥ 17.९ ॥
śūnyā dṛṣṭirvṛthā ceṣṭā vikalānīndriyāṇi ca

Questioner (Q): Is ego pride? What is enlightenment?
Acharya Prashant (AP): Ego is the ‘I’-feeling that causes you suffering.
Pride causes you suffering, but it is not merely pride that causes you suffering: even the opposite of pride causes you suffering. Taking yourself as too big will cause suffering, but

निराधारा ग्रहव्यग्रा मूढाः संसारपोषकाः ।
एतस्यानर्थमूलस्य मूलच्छेदः कृतो बुधैः ॥ 18.३८ ॥
nirādhārā grahavyagrā mūḍhāḥ saṃsārapoṣakāḥ

निर्वासनं हरिं दृष्ट्वा तूष्णीं विषयदन्तिनः ।
पलायन्ते न शक्तास्ते सेवन्ते कृतचाटवः ॥ 18.४६ ॥
nirvāsanaṃ hariṃ dṛṣṭvā tūṣṇīṃ viṣayadantinaḥ

नाहं देहो न मे देहो बोधोऽहमिति निश्चयी।
कैवल्यं इव संप्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम्॥ ११.६ ॥
nāhaṃ deho na me deho bodho'hamiti niścayī

अलमर्थेन कामेन सुकृतेनापि कर्मणा ।
एभ्यः संसारकान्तारे न विश्रान्तमभून्मनः ॥ 10.७ ॥
alamarthena kāmena sukṛtenāpi karmaṇā
You see, what does it mean to say that “righteousness is on decline”? Mind is moving away from Krishna. Mind is moving away from Krishna. Krishna is the centre of the mind. Right? Krishna is the centre of mind. As soon as the mind moves away from the Krishna, the centre applies a spring like force on the mind.
I am just summarising what it really means. Individuals on the platforms of social media or digital platforms, in general, have a kind of justice system, where someone can be kicked out…
◾ आत्मा का विकृत सिद्धांत ही भारत की दुर्दशा…
आचार्य प्रशांत: "आत्मा…
आचार्य प्रशांत: बता रहे हैं अष्टावक्र कि आए ही क्यों हो…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब जीवात्मा का पूर्वजन्म नहीं होता…
dehābhimānapāśena ciraṃ baddho'si putraka bodho'haṃ jñānakhaḍgena tanniṣkṛtya sukhī bhava
O son, you have become habitual of thinking “I am body” since long. Experience the Self and by this sword of knowledge cut that bondage and be happy.
~ Chapter…
देखो…
आचार्य प्रशांत: हमारे भोग भी छोटे होते हैं। और…
अनुवाद: आत्मा ही ब्रह्म है और भाव - अभाव कल्पित हैं, ऐसा निश्चय होते ही निष्काम ज्ञानी फिर क्या जाने, क्या कहे, क्या करे?
अचार्य प्रशांत: जो…
आचार्य…
आचार्य प्रशांत: यह श्लोक कहता है कि…
प्रकृत्या शून्यचित्तस्य कुर्वतोऽस्य यदृच्छया।…
आचार्य प्रशांत:…
अनुवाद: जो धीर पुरुष है उसका न प्रवृत्ति से, न निवृत्ति से कोई आग्रह होता है। जब जो सामने आ जाता है तब उसे करके वह आनंद से रहता है।
आचार्य प्रशांत:…
~ अष्टावक्र गीता (अध्याय 2 श्लोक १५)
प्रसंग:
"The Self is abstract intelligence free from thought.…
अनुवाद: जो महात्मा समस्त संकल्पों की सीमा पर विश्राम कर रहा है, उसके लिए अज्ञान कहां, विश्व कहां, ध्यान कहां और मुक्ति भी कहां?
आचार्य…
~ अष्टावक्र गीता ( अध्याय -१३ , श्लोक…
अनुवाद: सब कुछ कल्पना मात्र है और आत्मा नित्य मुक्त है। धीरपुरुष इस बात को जानकर फिर बालक के समान क्या अभ्यास करे? अर्थात् ज्ञानी के लिए अभ्यास निरर्थक है।
आचार्य…
आचार्य प्रशांत: अधर्म को छोड़कर, जो इन दोनों का कारण…
आचार्य प्रशांत: पहली पंक्ति कह रही है कि…
~ अष्टावक्र गीता
आचार्य प्रशांत: जब उस योगी ने जान ही लिया है कि वही समस्त भूतों में निवास करता है और समस्त भूत उसमें हैं, तब ये बड़े आश्चर्य की बात है कि अभी भी उसमें ममत्व बचा रहे। जिस मुनि…
अनुवाद: जीवन्मुक्त का चित्त ध्यान से विरक्त होने के लिए और व्यवहार करने के लिए प्रवृत्त नहीं होता है। किन्तु निमित्त के शून्य होने पर भी वह ध्यान से विरत भी होता है और व्यवहार भी…
प्रश्नकर्ता: किस स्वतंत्रता की बात…
~ अष्टावक्र गीता (…
आचार्य प्रशांत: इच्छा को शांत करना कोई…
आप असंग, अक्रिय, स्वयं-प्रकाशवान तथा सर्वथा-दोषमुक्त हैं। आपका ध्यान द्वारा मस्तिस्क को शांत रखने का प्रयत्न ही बंधन है ॥15॥
~ अष्टावक्र गीता
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अष्टावक्र इस श्लोक में ऐसा क्यों कह रहे हैं कि ध्यान की हर विधि…
vāgmiprājñānamahodyogaṁ janaṁ mūkajaḍālasam karoti
tattvabodho'yamatastyakto bubhukṣabhiḥ || 15.3 ||
This awareness of the Truth makes an eloquent, clever and energetic man dumb, stupid and lazy, so it is avoided by those whose aim is enjoyment.
~ Ashatavakra Gita, Chapter 15, Verse 3…
In him for whom the ocean of samsara (world) has dried up, there is neither attachment nor aversion. His gaze is vacant, his…
Even when living without any support and eager for achievement, the stupid are still nourishing samsara (world), while the wise have cut at the very root of…
palāyante na śaktāste sevante kṛtacāṭavaḥ
Seeing the desireless lion, the elephants of the senses silently run away, and if that is impossible, serve him like courtiers.
~ Ashtavakra Gita, Chapter 18,…
kaivalyamiva saṃprāpto na smaratyakṛtaṃ kṛtam
Neither I am this body, nor this body is mine. I am pure knowledge. One who knows it with definiteness gets liberated in…
Enough of prosperity, sensuality and pious deeds. The mind did not find repose in these in the dreary forest of the world.
~ Ashtavakra Gita, Chapter…