अनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रयदूषितं।
असारं निन्दितं हेयमि ति निश्चित्य शाम्यति॥९- ३॥
अनुवाद: यह सब अनित्य है, तीन प्रकार के कष्टों (दैहिक, दैविक और भौतिक) से घिरा है, सारहीन है, निंदनीय है, त्याग करने योग्य है, ऐसा निश्चित करके ही शांति प्राप्त होती है।
~ अष्टावक्र गीता ( अध्याय - ९, श्लोक – ३)
आचार्य प्रशांत: थोड़ा टेढ़ा है मामला, ध्यान से समझिएगा। जो अनित्य है, अनित्य माने जो लगातार बदल रहा है लगातार। जो अनित्य है ही, जो असार है, उसकी निंदा भी अनित्य और असार ही होगी। नहीं समझ रहे हो आप? अच्छा मैं एक सवाल पूछता हूं, बताइएगा ठीक ठीक। यहां पर एक छाया पड़ती है या वही सांप और रस्सी वाला क्लासिकल उदाहरण ले लो: यहां पर रस्सी रखी हुई है, अनित्य है, असार है, आपने उसको सांप समझ लिया है, या फूलों की बड़ी प्यारी माला समझ लिया है या कुछ भी समझ लिया है। अब जब सत्य दिखे, तो क्या आप उसकी निंदा करोगे? क्या निंदा करोगे उसकी? वह अनित्य भी और असार भी है। तो क्या करोगे उसकी? कुछ नहीं करोगे? हां! निंदनीय अगर कुछ है तो यह है कि मन वही प्रातिभासिक में अटक कर रह गया है, और स्पष्टतया देख भी नहीं पा रहा है।
संसार नहीं निंदनीय है, संसार को ठीक ठीक न देख पाना निंदनीय है। स्पष्ट समझिएगा! संसार नहीं निंदनीय है, संसार नहीं असार है। जब वह कह रहे हैं कि निंदा करने योग्य है, तो बात थोड़ी सी पेंचदार है। निंदा संसार की नहीं करनी है, निंदा उस मन की करनी है जो भटका हुआ है। निंदा का अर्थ यह है कि मैं नहीं देख पा रहा हूं कि संसार मन में ही है। निंदा योज्ञ सिर्फ वह स्थिति है जहां पर उसे देख पाने के लिए जो दूरी आवश्यक है मन से, मैंने वह दूरी नहीं बनाई है। अर्थात् अंततः निंदनीय हैं सिर्फ साक्षी भाव का अभाव।




