
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रिय:।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्।।29।।
samo ’haṁ sarva-bhūteṣhu na me dveṣhyo ’sti na priyaḥ
ye bhajanti tu māṁ bhaktyā mayi te teṣhu chāpyaham
The same am I to all beings: to Me, There is none hateful or dear. But…


हमारा मिजाज हमेशा दूसरों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। नतीजे आपकी उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहे। इसलिए अब आपको मनोबल बढ़ाने वाले किसी प्रेरक वक्ता की ज़रूरत है। जैसे ही वह व्यक्ति चला जाता है, आपकी ऊर्जा भी थम जाती है। लेकिन जीने का एक और तरीका भी है। अपने भीतर गहराई में, मुझे एक ऐसा बिंदु मिलता है जिसे कोई बाहरी परिस्थिति छू नहीं सकती। जो कुछ भी होता है, वह सतह पर ही घटित होता है। वह स्थिर, उदासीन और तटस्थ बना रहता है। तब आप सचमुच स्वतंत्र होते हैं।

Questioner(Q): What is the process of clarity? Is it just listening with immersion and no resistance? What is Truth? How we decide it?
Acharya Prashant (AP): Listening without effort, plus if there is Truth in what you hear, there is change and transformation, and that Truth becomes the master. We…




सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।। पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रिया: ।।1.42।।

Overview
We want to reach the end of wanting. We want completion, fulfillment in such a final way that we are left with nothing to want anymore. That’s the destination. Born a human being, you will have to act. Act rightly. Act for the right purpose. Live for the right



प्रश्नकर्ता: अभी आप कह रहे थे कि श्रीकृष्ण अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं और बाकी सब लोग अपने बारे में बोले जा रहे हैं। तो क्या इसका सम्बन्ध इससे है कि श्रीकृष्ण का कर्मफल और प्रारब्ध कट चुका है लेकिन बाकी सभी का कर्मफल और प्रारब्ध अभी जारी

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥
"कुल के नाश से, चले आ रहे कुल के धर्म नष्ट हो जाते हैं और कुलधर्म के नष्ट होने से पाप समस्त कुल को दबा लेता है।"

आचार्य प्रशांत: श्रीकृष्ण की निकटता सीखनी है अर्जुन से; अर्जुन के भीतर का कोहरा उधार नहीं ले लेना है। और हमारी हालत ज़बरदस्त है, हमारे पास वो सब कुछ है जो अर्जुन के पास है, बस एक चीज़ नहीं है। हम हर मायने में अर्जुन हैं, अर्जुन का पूरा नर्क

आचार्य प्रशांत: देखिए, बात को समझिए। गीता, सांख्ययोग में, शुरू के कुछ श्लोकों के बाद से भी आरम्भ हो सकती थी। पहला अध्याय तो पूरा ही अर्जुन के विषाद का निरूपण है और दूसरे अध्याय के भी कुछ आरंभिक श्लोकों में अर्जुन की ही व्यथा है। कृष्ण की ज्ञानवर्षा तदोपरांत…

आचार्य प्रशांत: श्रीमद्भगवद्गीता, प्रथम अध्याय, अर्जुन विषाद योग। देखेंगे कि श्रीकृष्ण अर्जुन के सब भावुक, मार्मिक वक्तव्यों को किस प्रकाश में देख रहे हैं। तो अपनी ही मोहजनित पीड़ा को आगे अभिव्यक्त करते हुए अर्जुन कहते हैं:
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतस: |

प्रश्नकर्ता: आपकी जो बाकी शिक्षाएँ हैं वो भी मुझे बिलकुल गीता से मिलती हुई लग रही हैं। आप जैसे पहले कहते थे कि हृदय में शिव और भुजाओं में शक्ति। तो अभी आप बोले कि हृदय कोमल होना चाहिए और बलिष्ठ भुजाएँ होनी चाहिए तो बिलकुल वो बातें एक जैसी…

तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्। कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ॥27॥
अर्जुन उवाच।
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।

यावदेतानिरीक्षेऽहं योद्धकामानवस्थितान्।
कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥22॥
“मैं इन सब युद्ध करने की कामनाओं से अवस्थित योद्धाओं को देखूँ कि किन वीरों के साथ मुझे युद्ध करना होगा।”

सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत ॥21॥
“हे अच्युत! दोनों सेनाओं के मध्य मेरा रथ स्थापित करें।”
~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोक २१, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग

आचार्य प्रशांत: हम सबके भीतर, हम कितना भी छुपा लें, पर होता है कोई जो सत्य को छोड़ नहीं सकता। हम स्वयं को कितना भी भ्रम में रख लें, एक तल पर सच्चाई हम सबको पता होती है। वास्तव में अगर सच्चाई पता ना हो तो स्वयं को भ्रम में…

आचार्य प्रशांत: इन सैकड़ों श्लोकों की यात्रा करेंगे हम। इस यात्रा में ये सोच कर आगे नहीं बढ़िएगा कि आप पहले से कुछ भी जानते हैं। हर जगह रुकिए और पूछिए — ये क्या हो रहा है? उसको आदत-सा बना लीजिए, अभ्यास करिए।
जो अभ्यास आपका बाहर की तरफ़ रहता…

आचार्य प्रशांत: पहले ही अध्याय में, अच्छे से देखिए, दो हैं जो परेशान हैं। कौन? रणक्षेत्र में दो हैं जिनकी चिंता पहले ही अध्याय में हमारे सामने आ जाती है — दुर्योधन और अर्जुन।
इस बात को अच्छे से पकड़िए। चिन्ताग्रस्त होना बुरा नहीं है; दुर्योधन वाली चिंता रखना बुरा…

सञ्जय उवाच।
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा। आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रतीत् ॥२॥
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्। व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥३॥


The world’s oldest calendar comes from India. They never recorded when Krishna was born, never, and they never recorded when the character called Krishna died. This was out of a simple understanding and respect that He is not a character at all. Characters come and go, so dates can be…

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना | न चाभावयत: शान्तिरशान्तस्य कुत: सुखम् || २, ६६ ||
न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस आयुक्त मनुष्य के अंतःकरण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शांति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को…

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ। समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥२, १५॥
क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दुःख-सुख समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक १५

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः। धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत || १, ४० ||
कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं तथा धर्म का नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में पाप भी बहुत फैल जाता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, श्लोक ४०

प्रश्नकर्ता: जाति से ब्राह्मण हूँ और पंडिताई करता हूँ। आपको सुनने के बाद लगा कि मैं लोगों को भ्रमित कर रहा हूँ। मेरा वास्तविक कर्म क्या है?
आचार्य प्रशांत: सच्चे पंडित बन जाइए और सच्चे ब्राह्मण बन जाइए। आपके समक्ष जो ग्रन्थ है आज, वो साफ़ बताता है कि पंडित…

भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च | अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ||
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् | जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ||
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार भी—इस प्रकार ये आठ प्रकार से विभाजित मेरी प्रकृति है। यह आठ प्रकार के भेदों वाली

प्रश्नकर्ता: प्रिय आचार्य जी, प्रणाम। गीता आदि ग्रंथों को दूर से ही पढ़ने का मन करता है, करीब से पढ़ने पर शांति की जगह अशांति मिलती है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि संसार का मूल कृष्ण ही हैं।
कबीर साहब भी कहते हैं -
कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढ़े बन माहि।

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते। योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते।।
योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मननशील पुरुष के लिए योग की प्राप्ति में निष्काम भाव से कर्म करना ही हेतु कहा जाता है और योगरूढ़ हो जाने पर उस योगरूढ़ पुरुष का जो सर्वसंकल्पो का अभाव है, वही कल्याण में हेतु…

यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते। एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति।।
ज्ञान योगियों द्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है, कर्म योगियों द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग फल स्वरुप में एक देखता है, वही यथार्थ देखता है।

श्रीभगवानुवाच अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः। स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः।।
श्रीभगवान् बोले – जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य काम करता है, वह सन्यासी तथा योगी है और केवल अग्नि का त्याग करने वाला सन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओं का त्याग…

सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु। साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते।।
सुहृद् (दिल का अच्छा), मित्र और वैरी के प्रति उदासीन (अर्थात् निष्पक्ष, पक्षपातरहित), मध्यस्थ (द्वैत के दोनों सिरों में से कहीं भी स्थापित नहीं), द्वेष्य और बन्धुगणों में (शत्रुओं और मित्रों में), धर्मात्माओं में और पापियों में भी समान भाव रखने वाला अत्यंत श्रेष्ठ है।…

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव | न ह्यसंन्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ||
हे अर्जुन! जिसको सन्यास कहते हैं, उसी को तुम योग जान; क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता।

अर्जुन उवाच अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः। अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति।।
अर्जुन बोले – हे श्रीकृष्ण! जो योग में श्रध्दा रखने वाला है, किंतु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकाल में योग से विचलित हो गया है, ऐसा साधक योग की सिद्धि को अर्थात् भगवत्साक्षात्कार को न प्राप्त…

कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि। योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वाऽऽत्मशुद्धये।।
कर्मयोगी ममत्वबुद्धिरहित केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति को त्याग कर अन्तःकरण की शुध्दि के लिए कर्म करते हैं।
—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ५, श्लोक ११

योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः। स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति।।
जो पुरुष अंतरात्मा में ही सुखवाला है, आत्मा में ही रमण करने वाला है तथा जो आत्मा में ही ज्ञान वाला है, वह सच्चिदानंदघन परब्रह्म परमात्मा के साथ एकीभाव को प्राप्त सांख्य योगी शांत ब्रह्म को प्राप्त होता है। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ५, श्लोक २४…

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः। छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।।
जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब संशय ज्ञान के द्वारा निवृत्त हो गए हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चलभाव से परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत मन को प्राप्त…

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः।।
जिनका मन समभाव में स्थित है, उनके द्वारा उस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया है, क्योंकि सच्चिदानंदघन परमात्मा निर्दोष और सम है, इससे वे सच्चिदानंदघन परमात्मा में ही स्थित हैं।

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः।।
मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखने वाला, आशारहित और संग्रहरहित योगी अकेला ही एकांत स्थान में स्थिर होकर आत्मा को परमात्मा में लगाए। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ६, श्लोक १०
प्रश्नकर्ता:

न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपा | न चैव न भविष्याम: सर्वे वयमत: परम् || २, १२ ||
न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे और न ही ऐसा है कि इससे आगे हम…

अथ व्यवटस्थतान्दृष्टवा धातकराष्ट्रान्कटपध्वजः | प्रवृत्तेशस्त्रसम्पातेधनुरुद्यम्य पाण्डवः | हृषीकेशंतदा वाक्यटमदमाह महीपते || १, २० ||
सेनयोरुभयोमकध्येरथंस्थाप्य मेऽच्श्यतु | यावदेताटन्निरक्षेऽहंयोद्धुकामानवटस्थतान् || १, २१||
हे राजन! इसके बाद कपिध्वज ने मोर्चा बाँधकर डटे हुए धृतराष्ट्र-सम्बन्धियों को देखकर, उस शस्त्र चलने की तैयारी के समय धनुष उठाकर हृषिकेश श्रीकृष्ण महाराज से यह वचन कहा

निहत्य धार्तराष्ट्रान्न: का प्रीति: स्याज्जनार्दन | पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिन: || १, ३६ ||
हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, श्लोक ३६

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम, मैं ये पूछना चाहता हूँ कि आज के समय के लिए भक्ति उचित है कि ज्ञान? भक्ति मार्ग या ज्ञान मार्ग?
जितना मुझे समझ में आया है, जो शायद ग़लत हो। भक्ति से आजकल समझ में आता है कि नाम लेना, मंदिर जाना या मंत्र आदि…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा प्रश्न गीता से सम्बंधित है। भगवान कृष्ण ने गीता में बोला हुआ है कि मरते वक़्त अगर मेरा स्मरण किया जाए तो वो मुझे ही प्राप्त होता है। और उसी गीता में उन्होंने बोला हुआ है कि मैं कण-कण में हर प्राणियों में वास करता…

प्रश्नकर्ता: गीता में श्रीकृष्ण तीन तरीके के काम का ज़िक्र करते हैं: सकाम कर्म, कर्म, अकर्म और विकर्म। तो इनमें क्या भेद है?
आचार्य प्रशांत: कर्म, अकर्म, विकर्म, सकाम कर्म, निष्काम कर्म। चलो समझते हैं। संसार माने गति। प्रकृति माने परिवर्तन, समय माने परिवर्तन। ये पाँच तरह के कर्म क्या…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम स्वयं को कर्ता मानें या नहीं?
आचार्य प्रशांत: कर्ता तुम हो, लगातार हो, तुम्हीं हो, कोई और नहीं है। आम आदमी जिस स्थिति पर बैठा है उसके लिए बहुत ज़रूरी है कि वो लगातार खुद को ही कर्ता माने। आम आदमी के लिए बोल रहा हूँ,…
This article is related to restlessness.
कृष्ण का खुद ऊँचा होना, कृष्ण के पूरे जीवनवृत्त में, उनकी ज़िंदगी की जो पूरी कहानी है उसमें और श्री कृष्ण की प्रेमकथा में एक सूत्र है जो साझा पिरोया हुआ है। गीता की ऊँचाई, कृष्ण के जीवन की ऊँचाई, और कृष्ण के प्रेम की ऊँचाई तीनों एक हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि कृष्ण बहुत ऊँचे हों और उनका प्रेम निचले तल का हो जाए। ये संभव नहीं है।
Overview
Fighting Duryodhana is Dharma. Fight Duryodhana in the way you can, that is swadharma. Dharma is the same for everybody, but swadharma varies according to your physical, social, temporal conditions. But remember that swadharma can never be in contradiction of Dharma; swadharma will always be something…
saṅkaro narakāyaiva kula-ghnānāṁ kulasya cha patanti pitaro hy eṣhāṁ lupta-piṇḍodaka-kriyāḥ
When the castes mix, that spells hell for the family. It destroys the family, in the way that the ancestors all fall because they are deprived of the Pindokdakriya.…
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, अर्जुन कहते हैं कृष्ण से कि ‘धृतराष्ट्र पुत्र चाहे मुझे मार भी दें तो भी उनसे लड़ना तो ग़लत ही है।‘ हमारे आम जीवन में भी ऐसे ही चलता रहता है कि हम इमोशनल ब्लैकमेल (भावनाओं से किसी को नियंत्रित करना) करते हैं बहुत बार, या…
प्रश्नकर्ता: कुछ दिन पहले आपने एक उदाहरण दिया था, एम एच ३७० का, कि हम जो खोज रहे हैं वो हमें कहीं मिल नहीं रहा इसलिए यूनिवर्स (ब्रह्माण्ड) इतना बड़ा है कि लगातार हम खोजते जा रहे हैं। तो स्पेस (स्थान) की तो बात उससे समझ में आ रही है।…
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ४०
आचार्य प्रशांत तो अर्जुन के…
यद्यपि ये…
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥29॥
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चै व परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥30॥
“जब कुन्तिपुत्र अर्जुन ने अपने बंधु बान्धवों को वहाँ…
~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोक २२, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग
आचार्य प्रशांत: क्या जानते नहीं हैं अर्जुन कि किनके साथ युद्ध करना होगा?…
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि । युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥४॥
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् । पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥५॥
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् । सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥६॥
अस्माकं तु…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, संकल्पो के बिना कोई जीवन…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। कृष्ण जी कह रहे हैं, "कर्मयोगी ममत्वबुद्धिरहित केवल इन्द्रिय, मन,…