भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च | अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ||
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् | जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ||
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार भी—इस प्रकार ये आठ प्रकार से विभाजित मेरी प्रकृति है। यह आठ प्रकार के भेदों वाली तो अपरा अर्थात् मेरी जड़ प्रकृति है और हे महाबाहो! इससे दूसरी को, जिससे यह सम्पूर्ण जगत धारण किया जाता है, मेरी जीवरूपा परा अर्थात् चेतन प्रकृति जान।
- श्रीमद्भगवद्गीता, (अध्याय ७, श्लोक ४, ५)
आचार्य प्रशांत: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, इनको आप जानते हैं, ये क्या हैं? पंचभूत हैं। कृष्ण पाँच पर नहीं रुक रहे, वो तीन और जोड़ रहे हैं — मन, बुद्धि और अहंकार। एक ही श्रेणी पर ला दिया, एक ही तल पर खड़ा कर दिया सबको। कह रहे हैं, "ये मेरी आठ अंगों वाली प्रकृति है।"
'अष्टांग', और कुछ आपको याद रहे न रहे, आठ अंगों वाली इस प्रकृति को याद कर लीजिए। इसको श्रीकृष्ण नाम देते हैं ‘अपरा प्रकृति’ या हीन प्रकृति। पाँच को नहीं, आठ को। आठ में क्या-क्या शामिल है? मन, बुद्धि, अहंकार। मन, बुद्धि, अहंकार किसके तुल्य खड़े हैं? मिट्टी, धूल, पानी, आग, हवा।




