
प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। मैं ईशावास्य उपनिषद् पढ़ रहा था जिसमें नौवाँ, दसवाँ, ग्यारहवाँ श्लोक था विद्या और अविद्या पर। तो उसमें यह लिखा था कि अविद्या इज़ ऑब्जेक्टिव नॉलेज एंड विद्या इज़ अविद्या विद सेल्फ नॉलेज (अविद्या भौतिक ज्ञान है और विद्या भौतिक ज्ञान के साथ-साथ आत्म-ज्ञान है)।
तो…

The Upanishads were not composed to give you the normal kind of comfort and happiness. The Upanishads are there to give you an exalted happiness, a transcendental happiness, an eternal happiness. A happiness so rare and exquisite that it is not called as harṣa or moda or prasannatā; a…

मुक्तिका उपनिषद् है, उसमें राम ही कह रहे हैं, ‘एक उपनिषद् को कोई पढ़ ले वो तर जाएगा।‘ अच्छा एक में काम नहीं होता तो चलो जो १० या ११ प्रमुख उपनिषद् हैं उनको पढ़ लो! अच्छा उनसे भी काम नहीं होता तो लो मैं सूची दिए देता हूँ १०८…

Questioner (Q): I am studying philosophy at Hansraj College, and I have read that Hegel’s philosophy was that mankind has been increasing its power by increasing its knowledge about itself and its surroundings. This kind of a philosophy might suggest that our projected purpose is to become the most powerful…

Questioner (Q): Does Vedanta, or wisdom literature in general, offer any fundamental solutions to the problems that we face as normal individuals in our personal and professional lives?
Acharya Prashant (AP): Vedanta doesn’t go at all into the specifics of the problems we face. If it does that, it would…

य एको जालवानीशत ईशनीभिः सर्वांल्लोकानीशतः ईशनीभिः। य एवैक उद्भवे सम्भवे च य एताद्विदुरमृतास्ते भवन्ति॥
जो एक मायापति अपनी प्रभुतासंपन्न शक्तियों द्वारा संपूर्ण लोकों पर शासन करता है, जो अकेला ही सृष्टि की उत्पत्ति-विकास में समर्थ है, उस परम पुरुष को जो विद्वान जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं।…

अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः। स वेति वेद्यं न च तस्यारित वेता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम्॥
वह पुरम पुरुष हाथ-पैरों से रहित होकर भी वेगपूर्वक गमन करने वाला है। आँखों से रहित होकर भी देखता और कानों से रहित होकर भी सब सुनता है। वह जानने वाली चीज़ों को जानता…

प्रश्नकर्ता: हमने अभी समझा, आचार्य जी, कि निराशा होना बहुत ज़रूरी है। तो अब जो इंसान बाहर भी ढूँढ रहा है, बुलडोज़र चला रहा है, खरगोश मार रहा है, तो मेरे ख्याल से निराशा का भी सही आयाम ज़रूरी है क्योंकि इंसान वहाँ भी निराशा तो पा ही रहा है।…

सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोक्षिशिरोमुखमा्। सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥
वह परमपुरुष सब जगह हाथ-पैर वाला, सब जगह आँख, सिर और मुख वाला और सब जगह कानों वाला है, वही लोक में सबको व्याप्त करके स्थित है।

नवद्वारे पूरे देही हँसो लेलायते बहि:। वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च॥
वह परम-पुरुष प्रकाश के रूप में नवद्वार वाले देह रूपी नगर में अंतर्यामी होकर स्थित है। वही इस बाह्य-स्थूल जगत में लीला कर रहा है।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, शुरुआत में आपने एक बात कही थी कि हम सब की जो शुरुआत है वो एक बिंदु मात्र से हुई है और वैसा ही कुछ वैज्ञानिक भी कहते हैं कि शुरुआत बिग-बैंग से हुई थी। तो क्या अध्यात्म में जो आंतरिक जगत की बात है और ये…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, यदि सत्य पूर्ण है तो उसी स्रोत से जब चेतना आती है तो वह अपूर्ण क्यों होती है?
आचार्य प्रशांत: चेतना अपूर्ण होती नहीं है, चेतना के पास चुनाव होता है पूर्ण या अपूर्ण होने का। वास्तव में सत्य और चेतना अलग-अलग नहीं हैं। सत्य ही जब…

अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायां रताः ॥
andhaṁ tamaḥ praviśanti ye'vidyāmupāsate tato bhūya iva te tamo ya u vidyāyāṁ ratāḥ

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने पहले कहा कि चेतना को पूर्णता चाहिए यानि सत्य चाहिए, वो बिंदु चाहिए। लेकिन चेतना छली जाती है, यानि कि सुख से छली जाती है एक तरह से। तो उस सुख में ऐसा क्या है जो सत्य जैसा प्रतीत होता है?
आचार्य प्रशांत: दुःख का अभाव।…

एको हि रूद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमॉंल्लोकानीशत ईशनीभि:। प्रत्यङ्जनास्तिष्ठति संचुकोपान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपा:॥
वह एक परमात्मा ही रूद्र है। वही अपनी प्रभुता-सम्पन्न शक्तियों द्वारा सम्पूर्ण लोकों पर शासन करता है, सभी प्राणी एक उन्हीं का आश्रय लेते हैं, अन्य किसी का नहीं। वही समस्त प्राणियों के अन्दर स्थित है,…

स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् । कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधात् शाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥
sa paryagācchukramakāyamavraṇamasnāviraṁ śuddhamapāpaviddham kavirmanīṣī paribhūḥ svayambhūryāthātathyato'rthān vyadadhāt śāśvatībhyaḥ samābhyaḥ

वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्णं तमसः परस्तात्। तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥
मैं इस अविद्यारूप तमस से दूर उस प्रकाशमय आदित्य स्वरुप परमात्मा को जानता हूँ, उसे जानकर ही विद्वान मृत्यु के चक्र को पार कर सकता है, अमरत्व प्राप्ति के लिए इसके अतिरिक्त कोई अन्य मार्ग नहीं।

ततः परं ब्रह्म परं बृहन्तं यथा निकायं सर्वभूतेषु गूढम्। विश्वस्यैकं परिवेष्टितारमीशं तं ज्ञात्वाऽमृता भवन्ति॥
जो उस जीवजगत से परे हिरण्यगर्भरूप ब्रह्मा से भी अत्यंत श्रेष्ठ है, जो अत्यंत व्यापक है, किन्तु प्राणियों के शरीरों के अनुरूप उन सब प्राणियों में समाया हुआ है, सम्पूर्ण जगत को अपनी सत्ता से घेरे…

Questioner: You mentioned that mumukṣā (deep desire for liberation) is what matters when we choose a path for liberation. But the mind is always playing games. Once I do things against its comfort, it tries to make up stories, create random, non-existent problems for me. Should I listen to my…

पुरुष एवेदँ सर्वं यद् भूतं यच्च भव्यम्। उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति॥
जो भूतकाल में हो चुका है, जो भविष्यकाल में होने वाला है और जो अन्नादि पदार्थों से पोषित हो रहा है, यह सम्पूर्ण परम पुरुष ही है और वही अमृतत्व का स्वामी है।

सहस्त्रशीर्षा पुरुष: सहस्त्राक्षः सहस्त्रपात्। स भूमिं विश्वतो वृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥
वह परमात्मा सहस्त्र सिर वाला, सहस्त्र नेत्रों वाला और सहस्त्र पैरों वाला है। वह सम्पूर्ण जगत को सब ओर से घेर कर भी दस अंगुल बाहर (सम्पूर्ण रूप से) स्थित है अथवा नाभि से दस अंगुल ऊपर हृदयाकाश में स्थित है।

Questioner: I see myself rooted in habit, and I procrastinate real work by thinking that the real happens on its own. Please talk about breaking habits and living a more aware life.
Acharya Prashant: Habits will remain. As long as you are alive, habits will remain. You know what is

या ते रुद्र शिवा तनूरघोराऽपापकाशिनी। तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि॥
पर्वत पर वास करने वाले सुखप्रदाता, हे रुद्रदेव! आपका कल्याणकारी, सौम्य, पुण्य से कांतिमान जो रूप है, आप हमें अपने उसी सुखदायी स्वरूप से देखें।

Questioner: In Katha Upanishad, the young boy Nachiketa attained the highest wisdom and immortality by the virtue of dispassion and the firm resolve to know the Truth. Kindly speak on the virtues of determination and dispassion that Nachiketa had.
Acharya Prashant: Yes, obviously Nachiketa had determination and dispassion, but…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। क्या चेतना और सत्य भिन्न हैं? ये विवेक क्या होता है?
आचार्य प्रशांत: हमारी चेतना अशुद्ध चेतना होती है। उसका लक्ष्य होता है सत्य। तो हम जैसे हैं, जीव की जो स्थिति होती है, उसमें चेतना और सत्य बिलकुल भी एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं।

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्। सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहता्॥
वह परम पुरुष समस्त इंद्रियों से रहित होने पर भी उनके (इंद्रियों के) विषय-गुणों को जानने वाला है। सबका स्वामी-नियंता और सबका बृहद् आश्रय है।

विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्। संबाहुभ्यां धमति सं पततैर्द्यावाभूमी जनयन्देव एकः।।
वह एक परमात्मा सब ओर नेत्रों वाला, बाहुओं और पैरों वाला है। वही एक मनुष्य आदि जीवों को बाहुओं से तथा पक्षी-कीट आदि को पंखों से संयुक्त करता है, वही इस द्यावा पृथ्वी का रचयिता है।

Questioner: Wherever I find myself entering into conversations with people, I am often asked questions such as ‘How are you?’, ‘How was your day?’, ‘Where are you from?’, ‘What are your hobbies and interests?’. Any answer that I give I know to be ultimately false. Answers such as ‘I am…

विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्। संबाहुभ्यां धमति सं पततैर्द्यावाभूमी जनयन्देव एकः॥
वह एक परमात्मा सब ओर नेत्रों वाला, बाहुओं और पैरों वाला है। वही एक मनुष्य आदि जीवों को बाहुओं से तथा पक्षी-कीट आदि को पंखों से संयुक्त करता है, वहीं इस द्यावा पृथ्वी का रचयिता है।

एको हि रूद्रो न द्वितीयाय तस्थुर्य इमाँल्लोकानीशत ईशनीभि:। प्रत्यङ्जनास्तिष्ठति संचुकोपान्तकाले संसृज्य विश्वा भुवनानि गोपा:॥
वह एक परमात्मा ही रूद्र है। वही अपनी प्रभुता-सम्पन्न शक्तियों द्वारा सम्पूर्ण लोकों पर शासन करता है, सभी प्राणी एक उन्हीं का आश्रय लेते हैं, अन्य किसी का नहीं। वही समस्त प्राणियों के अन्दर स्थित है,…

अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् । अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥
anyatra dharmādanyatrādharmādanyatrāsmātkṛtākṛtāt anyatra bhūtācca bhavyācca yattatpaśyasi tadvada

ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम्। य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति॥
जो उस (हिरण्यगर्भ रूप) से श्रेष्ठ है, वह परब्रह्म परमात्मा रूप है और दुखों से परे है, जो विद्वान उसे जानते हैं, वह अमर हो जाते हैं, इस ज्ञान से रहित अनन्य लोग दुःख को प्राप्त होते हैं।

ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम्। य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति।।
जो उस (हिरण्यगर्भ रूप) से श्रेष्ठ है, वह परब्रह्म परमात्मा रूप है और दुखों से परे है, जो विद्वान उसे जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं, इस ज्ञान से रहित अनन्य लोग दुःख को प्राप्त होते हैं।

इत्थं वाक्यैस्तथार्थानुसन्धानं श्रवणं भवेत् । युक्त्या संभावितत्वानुसन्धानं मननं तु तत् ॥
itthaṃ vākyaistathārthānusandhānaṃ śravaṇaṃ bhavet yuktyā saṃbhāvitatvānusandhānaṃ mananaṃ tu tat

आचार्य प्रशांत: ब्रह्म को किन-किन उपाधियों से इंगित किया गया है, विभूषित किया गया है, कहो जैसे? अनिकेत। अनिकेत कह दिया वहीं से शुरुआत कर लो। तो तुम्हारे सामने दो विकल्प आ रहे हैं, एक विकल्प ऐसा है जो तुमको इस धरती पर ही किसी पार्थिव वस्तु से, व्यक्ति से…

यस्मात्परं नापरमस्ति किंचिद्यस्मान्नाणीयो न ज्यायोअस्ति कष्चित्। वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्ण पुरूषेण सर्वम्॥
जिससे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं, जिससे कोई भी न तो सूक्ष्म है और न ही बड़ा। जो अकेला ही वृक्ष की भाँति निश्चल जो आकाश में स्थित है, उस परम पुरुष से ही यह संपूर्ण…

निद्राया लोकवार्तायाः शब्दादेरात्मविस्मृतेः । क्वचिन्नावसरं दत्त्वा चिन्तयात्मानमात्मनि ॥
nidrāyā lokavārtāyāḥ śabdāderātmavismṛteḥ kvacinnāvasaraṃ dattvā cintayātmānamātmani

यस्मात्परं नापरमस्ति किंचिद्यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित्। वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदनं पूणं पुरुषेण सर्वं॥
जिससे कोई भी न तो सूक्ष्म है और न ही बड़ा। जो अकेला ही वृक्ष की भाँति निश्चल आकाश में स्थित है, उस परम पुरुष से ही यह संपूर्ण विश्व संव्याप्त है।

प्रश्नकर्ता: क्या जीवन को उसकी उच्चतम संभावना में जीना ही ब्रह्म को पाना है? जीवन के पार भी कुछ है?
आचार्य प्रशांत: जीवन के पार कुछ भी नहीं है। ठीक है? बिलकुल इस भ्रांति से बाज आ जाइए कि अध्यात्म जीवन के पार या मृत्यु के पार इत्यादि किसी अन्य…

क्रियानाशाद्भवेच्छिन्तानाशोऽस्माद्वासनाक्षयः । वासनाप्रक्षयो मोक्षः सा जीवन्मुक्तिरिष्यते ॥
kriyānāśādbhavecchintānāśo'smādvāsanākṣayaḥ vāsanāprakṣayo mokṣaḥ sā jīvanmuktiriṣyate
The destruction of action leads to that of thought; thence results the dwindling of innate impulse (to act). The obliteration of innate impulse is liberation; it is held to be freedom in life.

Questioner: In the last session you said that cessation of passion is dispassion. I don’t feel I am passionate towards anything in my life. I like classical music, reading about spirituality, listening to the masters, I like the silence, but I am not passionate about anything. I am unable to…

प्रश्नकर्ता: माया की गति, आपने कहा, इतनी तेज़ है जैसे मक्खन में छुरी। हम समझ भी नहीं पाते और सब कुछ घट जाता है। तो फिर हम माया की गति कैसे कम करें ताकि हमको चुनाव का समय मिल जाए?
आचार्य प्रशांत: अच्छा हुआ मैंने कह दिया कि सवाल भेजिए…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रकृति हमारे प्रति इतनी बेरहम और असंवेदनशील क्यों होती है?
आचार्य प्रशांत: ये नया है। (हँसते हुए) प्रकृति हमारे प्रति इतनी बेरहम और असंवेदनशील क्यों होती है? प्रकृति ने ऐसा क्या किया, भाई? तुम प्रकृति ही हो। तुम प्रकृति के वो विशिष्ट उत्पाद हो जिसके माध्यम से…

यदात्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वं दीपोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत। अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः।।
जब योग साधना से युक्त साधक दीपक के सदृश आत्मतत्व के द्वारा ब्रह्मतत्व का साक्षात्कार करता है, तब वह अजन्मा, निश्चल, सम्पूर्ण तत्वों से पवित्र उस परमात्मा को जानकर सम्पूर्ण विकार रूप बंधनों से मुक्ति पा लेता

यथाऽपकृष्टं शैवालं क्षणमात्रं न तिष्ठति । आवृणोति तथा माया प्राज्ञं वापि पराङ्मुखम् ॥
yathā'pakṛṣṭaṃ śaivālaṃ kṣaṇamātraṃ na tiṣṭhati āvṛṇoti tathā māyā prājñaṃ vāpi parāṅmukham
Just as a pulled-up water reed stays not still even for a moment, so does Maya (ceaselessly) envelop even a wise man if he averts his

यथैव बिम्बं मृदयोपलिप्तं तेजोमयं भ्राजते तत्सुधान्तम् । तद्वाऽऽत्मतत्तवं प्रसमीक्ष्य देही एकः कृतार्थो भवते वीतशोकः॥
जिस प्रकार मिट्टी से मलिन हुआ रत्न या आभूषण शोधित होकर प्रकाशमय हो कर चमकने लगता है, उसी प्रकार देहधारी जीव आत्मतत्व का साक्षात्कार कर के शोकादि से मुक्त होता है और अद्वितीय तथा कृतकृत्य हो…

यस्मात्परं नापरमस्ति किंचिद्दस्मान्नाणीयो न ज्यायोस्ति कश्चित। वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम्॥
जिससे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं, जिससे कोई भी न तो सूक्ष्म है और न ही बड़ा। जो अकेला ही वृक्ष की भाँति निश्चल आकाश में स्थित है, उस परम पुरुष से यह सम्पूर्ण विश्व संव्याप्त…

Throw out concepts like ‘I am virtuous’ or ‘I am a sinner’. What is the entity that senses this? Body-consciousness will not lose its grasp on you with the thought that your well-being is the result of some spiritual activity. All you need is to keep observing yourself.
Do not…

यो देवोऽग्नौ योऽप्सु यो विश्वं भुवनमाविवेश। य ओषधीषु यो वनस्पतिषु तस्मै देवाय नमो नमः।।
जो परमात्मा अग्नि में है, जो जल में है, जो समस्त लोकों में संव्याप्त है, जो औषधियों तथा वनस्पतियों में है, उस परमात्मा के लिए नमस्कार है।

लघुत्वमारोग्यमलोलुपत्वं वर्णप्रसादं खरसौष्ठवं च। गंधः शुभो मूत्रपुरीषमल्पं योगवृत्तिं प्रथमा वदंति॥
शरीर की स्थूलता कम होना, निरोग होना, विषयों में आसक्ति न होना, शरीर में कांति-तेजस्विता होना, स्वर की मधुरता, शुभ गंध का होना, मल-मूत्र अल्प होना, ये सब योग की पहली सिद्धि है।
आचार्य प्रशांत: जो मूल औपनिषदिक सिद्धान्त है इस श्लोक के…
आचार्य प्रशांत: नवद्वार तो समझते ही…
आचार्य…
हे हिमालयवासी सुखदाता!…
आचार्य प्रशांत: वह परम पुरुष, वह शुद्ध-मुक्त चेतना इंद्रियों द्वारा लाए…
~ Katha Upanishad,…
~ Adhyatma Upanishad, Verse 33
✥…
~ Adhyatma Upanishad, Verse 5
✥ ✥ ✥
Questioner: I am not sure…
~ Adhyatma Upanishad, Verse 12…
आचार्य प्रशांत:…