यस्मात्परं नापरमस्ति किंचिद्दस्मान्नाणीयो न ज्यायोस्ति कश्चित। वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम्॥
जिससे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं, जिससे कोई भी न तो सूक्ष्म है और न ही बड़ा। जो अकेला ही वृक्ष की भाँति निश्चल आकाश में स्थित है, उस परम पुरुष से यह सम्पूर्ण विश्व संव्याप्त है।
~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३, श्लोक ९)
ततो यदुत्तरतरं तदरूपमनामयम्। य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति॥
जो उस (हिरण्यगर्भ रूप) से श्रेष्ठ है, वह परब्रह्म परमात्मा रूप है और दुखों से परे है, जो विद्वान उसे जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं, इस ज्ञान से रहित अन्यान्य लोग दुःख को प्राप्त होते हैं।
~श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय ३, श्लोक १०)
आचार्य प्रशांत: मूल बात आरंभ में ही पुनः स्मरण कर लेना आवश्यक है। ऋषियों का एक-एक शब्द सुनने वाले बेचैन मन की शांति हेतु ही है। यही एकमात्र उद्देश्य है उपनिषदों का। एक-एक बात जो कही जा रही है, वो किसी अवस्था विशेष से कही जा रही है।


