अर्जुन उवाच अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः। अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति।।
अर्जुन बोले – हे श्रीकृष्ण! जो योग में श्रध्दा रखने वाला है, किंतु संयमी नहीं है, इस कारण जिसका मन अन्तकाल में योग से विचलित हो गया है, ऐसा साधक योग की सिद्धि को अर्थात् भगवत्साक्षात्कार को न प्राप्त होकर किस गति को प्राप्त होता है।
—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ६, श्लोक ३७
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, चरणस्पर्श। अध्याय ६ में श्लोक संख्या ३७ से सम्बंधित प्रश्न है। योग के प्रति आस्था बहुत है पर संयम में थोड़ी सी कमी है, तो क्या मुझे भगवत प्राप्ति हो पाएगी? यही मेरे मन में हमेशा से आता रहा है। आपसे मार्गदर्शन चाहूँगा।
आचार्य प्रशांत: उत्तर तो साफ-साफ कृष्ण ने ही दे दिया है न। जब अर्जुन कहते हैं कि योग में श्रध्दा तो है पर संयम नहीं है, तो ऐसों के बारे में क्या कहते हैं कृष्ण?
प्र: “अगर तुम्हारे मन में श्रध्दा है तो तुम्हारी श्रद्धा कभी अपूर्ण नहीं जाएगी। भले इस बार तुम्हें ना हो, अगले जन्म में तुम अच्छी प्रवृत्ति वाले घर में पैदा होओगे, जिसमें तुम्हारा अंतरमन कहेगा कि अच्छी संगति में जाओ।”




