न दूरं न च सङ्कोचाल्लब्धमेवात्मनः पदम्। निर्विकल्पं निरायासं निर्विकारं निरञ्जनम्॥
आत्मा का स्वरुप न दूर है, न निकट। वह तो प्राप्त ही है, तुम स्वयं ही हो। उसमें न विकल्प है, न प्रयत्न है, न प्रकार है और न मल।
~ अष्टावक्र गीता, अध्याय १८, श्लोक ५
आचार्य प्रशांत: "आत्मा का स्वरुप न दूर है, न निकट। वह तो प्राप्त ही है, तुम स्वयं ही हो। उसमें न विकल्प है, न प्रयत्न है, न प्रकार है और न मल।"
कुछ नहीं कहेंगे कि क्या है, यही कहते रहेंगे कि क्या नहीं है। जो कुछ भी तुम्हें बुरा लगता है, वही नहीं है। और मैं तुम्हें बता दूँ, तुम्हें सब कुछ बुरा ही लगता है। कुछ बता दो जो अच्छा लगता हो।
जो कुछ भी तुम्हें अच्छा लगा है न, वो किसी और वस्तु की तुलना में लगा है जो ज़्यादा बुरी लगती है। हमें जो कुछ भी लगता है, या तो बुरा लगता है या बहुत बुरा लगता है। जो हमें बहुत बुरे की तुलना में कम बुरा लगता है, उसे हम कभी-कभार अच्छा बोल देते हैं। अगर तुम्हें वास्तव में कुछ अच्छा लगता तो कुछ तो होता तुम्हारे जीवन में जो सदैव अच्छा बना रहता। ज़रा एक चीज़ ऐसी बता देना जो तुम्हारे जीवन में सदैव अच्छी बनी रही है? तुमने तो भगवान को भी कभी न कभी गाली ज़रूर दी होगी।
कुछ भी ऐसा है जो सदा अच्छा बना रहा है? कोई बैठा है यहाँ पर जिसने ईश्वर को कभी दोषी न ठहराया हो, भाग्य को कभी-न-कभी कोसा न हो? कभी-न-कभी कहा न हो कि “हे भगवान! क्या कर रहा है? मुझे ही क्यों चुना इस सारे दंड के लिए?” कोई है ऐसा यहाँ पर जिसे अच्छे-से-अच्छा भी कभी बुरा न लगा हो?




