भवोऽयं भावनामात्रो न किंचित्परमर्थतः।
नास्त्यभावः स्वभावनां भावाभावविभाविनाम्।।
~ अष्टावक्र गीता (अध्याय 18 श्लोक 4)
अनुवाद: यह संसार केवल एक भावना मात्र हैं, परमार्थत: कुछ भी नहीं है। भाव और अभाव के रूप में स्वभावत: स्थित पदार्थों का कभी अभाव नहीं हो सकता।
आचार्य प्रशांत: पहली पंक्ति कह रही है कि हाँ ठीक है यह बात कि जो दिखाई पड़ता है यह पूरा विश्व, यह कल्पना मात्र हैं। लेकिन दूसरी पंक्ति उसके साथ ही बात जोड़ रही है कि जो देख सकता है वह नॉन बींग में भी बींग को ही देखेगा। क्योंकि बींग के अलावा और कुछ है नहीं, स्वभाव एक ही है।
पहली पंक्ति कह रही है कि विश्व खाली है नॉन बींग। दूसरी कह रही है कि नॉन बींग में भी स्वभाव बींग का ही है। तुम्हारे देखने की भूल है अगर तुम देख नहीं पा रहे हो तो। स्पष्ट हो जाना चाहिए कि यहाँ पर भाषा त्याग की रिजेक्शन की नहीं है; दो बातें एक साथ कहीं जा रही है।
पहला तो ये कि दिखता है जो नकली सा है, दूसरा ये कि नकली भी असली है। मन के लिए किसी दो में से एक सिरे पर चले जाना बड़ा आसान है। एक सिरा ये हो सकता है कि सब नकली है तो सबको छोड़ दो, त्याग दो भरसना कर दो और यह मान लो कि सच कहीं और बैठा हुआ है। जो सामने दिख रहा है वह सब तो झूठा है और सच कहीं और होता है। मन इस सिरे पर जाने के लिए बड़ा उत्सुक रहेगा और जो दूसरा सिरा होता है, मन उसके लिए भी बड़ा उत्सुक रहेगा कि यह सब जो है ना यही तो जीवन है; ये सब असली है। इससे मोह लगा लो इसी को जीवन मान लो, इसी की कामना करो, इसी से बंधे बैठे रहो। और हमारा मन इन्हीं दो सिरों के बीच झूलता रहता है: आसक्ति-अनासक्ति, राग-द्वेष, बहुत अच्छा है-बहुत खराब है।





