विहाय वैरिणं कामम-र्थं चानर्थसंकुलं।
धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रा ना दरं कुरु॥१०- १॥
अनुवाद: जब तक जीवन स्वार्थों के पीछे भाग रहा है, तब तक जीवन में आनंद का होना ना मुमकिन है।
~ अष्टावक्र गीता ( अध्याय - १0, श्लोक – १)
आचार्य प्रशांत: अधर्म को छोड़कर, जो इन दोनों का कारण हैं, सबके प्रति अनादर से भर जाओ। आमतौर पर हमने इनको जीवन का लक्ष्य माना हैं। पुरुषार्थी के लिए प्राप्य माना है - धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। माना यह गया है कि अर्थ रहेगा, काम रहेगा और धर्म रहेगा तो अंततः मोक्ष उतरेगा। एक यात्रा बना दिया गया है जीवन को, जिसमे कामनाओं की पूर्ति होनी चाहिए, जिसमे अर्थ का संचय होना चाहिए और जिसमें धर्म के नाम पर ऐसा एक मार्ग होना चाहिए, जिसमें अर्थ और काम के लिए स्थान हो। यह भ्रम हैं और यह आदमी के मन की चाल हैं।
अष्टावक्र सीधे-सीधे इसी झूठ का पर्दाफाश कर रहे हैं। वह कह रहे कि पहली बात तो यह है कि काम की प्राप्ति का मोक्ष से कोई लेना-देना हो नहीं सकता। काम किसी भी तरह से पुरुषार्थों में शामिल किया नहीं जा सकता। साफ साफ कह रहे हैं कि काम बैरी है तुम्हारा। समस्त कामना - मानसिक, दैहिक, सब।
काम में और अर्थ में कोई विशेष अंतर है नहीं क्योंकि मन के लिए अर्थ वहीं है जिसकी पहले उसकी कामना उठी हो। एक ही है दोनो - काम और अर्थ। एक थोड़ा स्थूल और एक थोड़ा सूक्ष्म लग सकता है पर मूलतः दोनो एक ही है - काम और अर्थ।




