वक्ता: स्रोत में मिल जाना ही स्रोत को जानना है| स्रोत को जानने के लिये स्रोत में विलीन हो जाओ|
श्रोता १: सर, इस पीड़ा को, दूरी को कम करने में भी तो श्रद्धा की ही ज़रुरत है न? यह दूरी ही पीड़ा है, ‘मेरे होने’ और ‘बस होने’ के बीच की दूरी|
वक्ता: उस दूरी को कम करने का निर्णय भी तुम्हीं को लेना है| वो जो दूसरे छोर पर है, कौन? स्रोत, वो तो हमेशा ही ये दूरी कम करने को कह रहा है| तुम ही उस दूरी को न कम करने पर अड़े हुए हो, वो निर्णय तो तुम्हीं को लेना है| अतः ये पुकार है, जिसे तुम्हें स्वीकारना है| तुम इसे प्रेम का आमंत्रण समझो| तुम्हें निर्णय करना पड़ेगा कि ‘मैं इस आमंत्रण को स्वीकार करती हूँ’|
श्रोता २: क्या ये स्रोत द्वारा ही तय होगा कि मैं कब इस आमंत्रण को स्वीकार करूँगा?
वक्ता: ठीक, बिलकुल ठीक| ये स्रोत द्वारा ही तय होगा| मैं एक बार मूसा की कहानी कह रहा था| मूसा एक बार बहुत बेचैन हो गए, तो चिल्लाने लगे, ‘अल्लाह, तुझे कैसे ढूँढूं? कहाँ ढूँढूं?’ तो अल्लाह का जवाब आता है, ‘अगर मैं तुझे पहले ही न मिल गया होता, तो तू मुझे ढूँढने की इच्छा कैसे करता? तो ये सवाल क्यों करता है कि तुझे कहाँ ढूँढूं? मैं मिला ही हुआ हूँ| मेरे होने से ही तो तू मुझे ढूँढने की इच्छा कर रहा है’|

