प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आचार्य जी आपसे एक मार्गदर्शन चाहते हैं कि हमें अपना लक्ष्य किस तरह से निश्चित करना चाहिए? क्या हमें अपना लक्ष्य अपने स्वभाव के अनुसार बनाना चाहिए कि हमारे लिए क्या अच्छा होगा?
आचार्य प्रशांत: नहीं, लक्ष्य मात्र स्वभाव के अनुसार नहीं बनता। आपका स्वभाव ये है ही नहीं कि आप कोई लक्ष्य बनाएँ। स्वभाव तो अलख है। अलख समझते हैं? जिसका कोई लक्ष्य नहीं किया जा सकता, अलक्ष्य स्वभाव है हमारा। स्वभाव अलक्ष्य है तो स्वभाव में लक्ष्य नहीं होते। जो स्वभाव में जीने लग गया उसे अब लक्ष्यों की ज़रूरत भी नहीं रहेगी।
तो लक्ष्य स्वभाव के कारण नहीं बनते, लक्ष्य बनते हैं जो हमारे ऊपर दुष्प्रभाव पड़े होते हैं उनके कारण। अभी अपनी हालत देखिए और उस हालत में जो कुछ भी आपको कष्ट देता है उसका निराकरण करना ही लक्ष्य है। और अगर अभी कुछ नहीं है आपकी ज़िन्दगी में जो आपको तकलीफ देता हो तो आप फ़िर स्वभाव में ही जी रहे हैं, आपको फ़िर किसी लक्ष्य की ज़रूरत ही नहीं है।
कोई ज़बरदस्ती या शौकिया थोड़े ही लक्ष्य बनाए जाते हैं कि, "सबके लक्ष्य हैं तो मेरे भी होने चाहिए।" ये वैसी ही बात हो जाएगी कि, "सब नींद की गोली ले कर सोते हैं तो मैं भी नींद की गोली ले कर सोऊँगा।" अरे भाई, तुम्हें अगर यूँही नींद आ जाती है, प्राकृतिक, तो तुम्हें क्यों चाहिए नींद की गोली?
लक्ष्य समझिए एक तरह की दवाई है, वो बीमारों को ही चाहिए। आपका स्वभाव तो स्वास्थ्य है न, तो स्वभाव में तो न किसी बीमारी की जगह है न दवाई की जगह है। लेकिन अभी हम स्वस्थ्य नहीं हैं। हमारी ज़िन्दगी का यथार्थ ये है कि हम बीमार हैं। तो अब आप पूछ रहे हैं कि, "लक्ष्य क्या बनाएँ?" दूसरे शब्दों में, "दवाई कौन सी लें?" दवाई कौन सी लें ये तो मैं तब बता पाऊँगा न जब मुझे पहले पता हो कि आपकी बीमारी क्या है। बीमारी बताइए भाई और बीमारी बहुत साफ़-साफ़ बतानी होगी, ऊँगली रख कर बताना होगा, एकदम देखना होगा।



