श्रोता १: क्या कोई ऐसा लक्ष्य हो सकता है, जिसका पहले से कोई पता ना हो?
वक्ता: जो बाहर से लक्ष्य आयेगा, वो और कुछ नहीं होगा, पास्ट की पुनरावृति होगी। तुम्हारा सवाल है कि क्या कोई ऐसा लक्ष्य हो सकता है, जिसका पहले से ही पता नहीं है? जो हमारे अतीत के अनुभवों में शामिल नहीं है? बिलकुल ठीक कह रहा है। जो भी लक्ष्य बाहर से आयेगा, वो अतीत के अनुभवों से ही आयेगा। और वो होगा अतीत का, पर भविष्य के बारे में। जो लक्ष्य अपना होता है, वो लक्ष्य जैसा लगता ही नहीं। वो एक नॉन-टारगेट टारगेट होता है। वो टारगेट होता ही नहीं। ध्यान देना, जो अपना होता है, वो कभी अतीत से नहीं आता। उदाहरण के लिए, अभीमैं तुम्हें जवाब दे रहा हूँ; तुमने जो सवाल पूछा, ये सवाल मुझसे कुछ नहीं तो शायद ६० -७० बार पहले भी पूछा जा चूका है। मेरे लिए बहुत आसन होगा कि मैनें इसका कल जो जवाब दिया था, परसों जो दिया था, पिछले हफ्ते जो दिया था, वही उठा कर तुम्हें परोस दूँ। पर अगर मैं वो करूँगा तो अन्याय करूँगा। अभी जो बोल रहा हूँ, उसे ताज़ा ही होना पड़ेगा। अभी भी मेरे एक लक्ष्य की पूर्ति हो रही है लेकिन वो अतीत से नहीं आ रहा। क्योंकि जो बोल रहा हूँ, वो अभी है। हाँ, अगर मैं कुछ भविष्य की सोचूंगा तो निश्चित वो अतीत से आयेगा।
एक चीज़ नोट कर लें हम:‘एनी इमेजिनेशन ऑफ़ द फ्यूचर ऑलवेज कम्स फ्रॉम द पास्ट| हेन्स एनी टारगेट ऑफ़ द फ्यूचर विल आल्सो बी अ रेपेटिशन ऑफ़ द पास्ट| द ओनली न्यू एंड फ्रेश एक्सपीरियंस इज़ दैट इन द प्रेजेंट मोमेंट| हेन्स ऑल टारगेट्स ऑफ़ योर ओन,विल ऑलवेज बी अबाउट द प्रेजेंट ओनली’|
तुमने जो बात पूछी है, वो है बहुत कीमती। वो ये कह रहा है कि एक लक्ष्य मान लीजिये हटा दिया, कोई दूसरा बनायेंगे। पर जो भी दूसरा बनाऊँगा वो किसी ना किसी पुरानी सोच से ही तो बनाऊँगा! जिसके बारे में मुझे पहले ही पता है, जिसके बारे में मुझे पहले ही अनुभव है, जो मेरे अतीत में शामिल है। बात बिलकुल ठीक है। तुम जब भी लक्ष्य बनाओगे, तो अतीत के प्रभाव में ही बनाओगे और उस लक्ष्य का कोई ख़ास महत्व होगा नहीं। लक्ष्य बनाना नहीं है, होश में रहना है

