प्रश्नकर्ता: सर, जब भी आपको सुनता हूँ, जितनी भी देर आपके साथ होता हूँ तो ऐसा लगता है मेरे भीतर एक ऊर्जा है। कैसे यह ऊर्जा हर समय बनी रहे? कैसे रोकूँ?
आचार्य प्रशांत: तुम कहते हो कि जब यहाँ होते हो, मेरे साथ, मेरे सामने, तो ऊर्जा होती है। अगर नहीं होते हो मेरे साथ, मेरे सामने, तो ऊर्जा नहीं होती है। तो बात बहुत सीधी है। मैं तुमसे पूछता हूँ कि ऐसा कोई भी बिंदु, समय, स्थान आने क्यों देते हो जब मेरे सामने नहीं हो? कौन यह विचार करता है कि दूर हो गए? तुम ही यह विचार करते हो न कि अब दूर हो गए? तुम ही अपने-आप को यह कह देते हो न कि अब दूर हो गए? और यह कहने के बाद तुम हतोत्साहित हो जाओ, तुम्हारी ऊर्जा गिर जाए, और परिणाम हों, तो तुम जानो। तुमने क्यों कहा अपने-आप से कि दूर हो गए?
तुम कहोगे – सर, ये कैसी बात है? तो क्या चौबीस घण्टे यहीं बैठे रहें? जहाँ जाएँ, आपको साथ ले कर जाएँ? जो करें सामने करें? अगर मुझे ऐसे ही देख रहे हो जैसे तुम्हें दिख रहा हूँ, तो तुम्हारा तर्क जायज़ है कि जहाँ जाओगे मुझे ले कर नहीं जा सकते। यह संसार बहुत बड़ा है, तुम्हें चलना-फिरना, उठना-बैठना, दौड़ना, यह तमाम गतिविधियों में होना है, कैसे सामने रहोगे? अगर मैं वही हूँ जो तुम्हारे सामने बैठा हूँ, तो दूरी पक्की है। होनी ही है। पर फिर यह ध्यान से देखो कि तुम्हें ऊर्जा मिलती किससे है। तुम्हें ऊर्जा उस व्यक्ति से नहीं मिलती है जो तुम्हारे सामने बैठा है और जिससे दूर होना अवश्यम्भावी है। वो व्यक्ति अधिक-से-अधिक प्रतीक हो सकता है। वो व्यक्ति अधिक-से-अधिक एक माध्यम हो सकता है जिसका उपयोग कर के तुम कहीं पहुँचते हो। जिसकी उपस्थिति से तुम उपस्थित हो जाते हो। माध्यम को तुम हमेशा अपने साथ नहीं ले जा सकते, लेकिन वो माध्यम तुम्हें जहाँ पहुँचाता है वह हमेशा तुम्हारे साथ रह सकता है।
तुम्हें यह विचार करने की कोई ज़रूरत नहीं है कि माध्यम दूर हुआ तो वह जिससे तुम्हें चैन मिल रहा था, शांति मिल रही थी और ऊर्जा मिल रही थी वो भी तुमसे दूर हो गया। हाँ! अगर देह भर देखोगे, दुनिया तुम्हारे लिए पदार्थ रहेगी। आँखों से सिर्फ़ शरीर ही नज़र आएगा तो दूरी का दुःख भी भुगतोगे। क्योंकि शरीर कब किसका हुआ है? शरीर कभी पास होता है, कभी दूर होता है और एक दिन तो जल भी जाना है। जिस दिन जल जाएगा उस दिन तो अनंत काल के लिए दूरी हो जानी है। तब क्या करोगे?


