प्रश्न: मन सही लक्ष्य से क्यों भटक जाता है? जीवन के लक्ष्य के प्रति हमेशा एकनिष्ठ कैसे रहें?
आचार्य प्रशांत: प्रेम।
कामना इतनी तीव्र होनी चाहिए कि एक पल को भी भूलो नहीं, कुछ और याद ही न आए। अपनी पीड़ा के प्रति बड़ी संवेदनशीलता होनी चाहिए। तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम तड़प रहे हो; बड़े वियोग में हो। अब तुम कुछ और कैसे याद रख सकते हो? छोटी-मोटी क्षुद्र बातों में मन कैसे लगा सकते हो?
तुम्हारे प्राण अटके हुए हैं गले में, न जी पा रहे हो, न मर पा रहे हो, तो अब तो तुम बस एक ही आशा कर सकते हो न – राहत की। तुमने पाँच-दस आशाएँ कर कैसे लीं? निश्चय ही अपने प्रति बड़े निष्ठुर हो।
अपनी स्थिति के प्रति तुम में कोई सद्भावना ही नहीं है।
तुम्हारी हालत ऐसी है कि जैसे किसी आदमी की छाती में छुरा घुंपा हुआ हो, और वो पूछे, “इस शहर में सैंडविच कहाँ मिलता है?” और, “जूतों का कोई नया ब्रांड आया है बाज़ार में?”,”वो जो लड़की जा रही है, वो बड़ी ख़ूबसूरत है। किस मोहल्ले में रहती है?” और छाती में क्या उतरा हुआ है? ख़ंजर। और ख़ून से लथपथ हैं। और सवाल क्या है जनाब का? “बर्गर कहाँ मिलेगा?”
हम ऐसा ही जीवन जी रहे हैं। हम घोर कष्ट में हैं, हमारी छाती फटी हुई है, लेकिन हम अपने प्रति बड़े कठोर, बड़े निष्ठुर हैं।



