

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, किसी भी काम को करने में मन क्यों नहीं लगता है?
आचार्य प्रशांत: अभी कल ही एक लड़का आया था मुझसे मिलने। वो मध्य प्रदेश के सागर जिले में खाद्य विभाग में काम करता है। नया लड़का है, अभी-अभी नौकरी का एंट्रेंस क्लियर किया है और डेढ़-दो…

प्रश्नकर्ता: आपका एक वीडियो देखा, जिसमें आप बड़ी भर्त्सना कर रहे थे रियलिटी शो में बच्चियों की डांस (नाच) की। आपको रियलिटी शो में बच्चों के डांस से क्या प्रॉब्लम (परेशानी) है? डांस वगैरह तो आर्ट फॉर्म (कलाएँ) हैं, नृत्य तो एक प्रकार की कला है न, और बच्चे अगर…

प्रश्नकर्ता: मेरा एटिट्यूड रहता है कि अगर कोई बंदा है उसमें कुछ अच्छाईयाँ हैं कुछ बुराइयाँ भी हैं; एवरीथिंग इज देअर (सब कुछ है)। तो उसके अंदर जो अच्छाइयाँ हैं उसके उस अच्छाई को बढ़ावा दिया जाए और तारीफ की जाए, जिससे उसमें सकारात्मक बदलाव हो। और 'किसी को जज…

प्रश्नकर्ता: मैं अपने परिवार की एक स्थिति में असमंजस में पड़ा हुआ हूँ। मेरे भाई एक लड़की से प्रेम करते हैं जो दूसरी जाति की है। इसी कारण मेरे घरवाले इस रिश्ते से काफी अप्रसन्न हैं। भाई बोलता है कि माँ-पापा को समझाओं और मेरी मदद करो और माँ-पापा कहते…

प्रश्नकर्ता: सर मैं बंगाल से हूँ। बचपन से ही धीर-गंभीर मिजाज़ का रहा हूँ। अब मैं दिल्ली पढ़ने आया हूँ। यहाँ देख रहा हूँ कि सेंस ऑफ़ ह्यूमर (हास्यवृत्ति) को बहुत महत्व दिया जाता है। सेंस ऑफ ह्यूमर नहीं है तो आपके यार दोस्त आपको पसंद नहीं करते हैं। कई…

प्रश्नकर्ता: सर जी प्रणाम आपको। आपने ही हमें बचा रखा है। आपकी वीडियो सुनते हैं डेली (रोज़) दस से ज़्यादा। सर, सोशल मीडिया पर इतनी बचकाना और घटिया पोस्टिंग ही क्यों करते हैं ज़्यादातर लोग? बिना बात का डिस्ट्रैक्शन (विकर्षण) होता है।
आचार्य प्रशांत: तुम कचरे की पेटी लेकर चल…

प्रश्नकर्ता: पिछले दिनों गालियों को लेकर आपका एक वीडियो आया, मैं बात की और ज़्यादा गहराई में जाना चाहता हूँ, मुझे बताइए गालियों के पीछे का मनोविज्ञान क्या है?
आचार्य प्रशांत: जो बात बिलकुल सीधी है उसी से शुरू करो — तुम गाली किसी को आहत करने के लिए ही…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, आपने मिशन इंपॉसिबल (असंभव लक्ष्य) की बात की। मैं जब आज तीन दिन से ट्रेन में चला आ रहा था, तो मैं सोच रहा था कि, "मैं ये क्यों कर रहा हूँ? मुझे पता है कि ये लड़ाई तो हारी हुई लड़ाई है, कुछ कर नहीं…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब हमारी ज़रूरतें पूरी नहीं हो पाती हैं तो हम उसी में फँस जाते हैं और आगे नहीं बढ़ पाते और फिर अंततः परिस्थितियों के दास बनकर रह जाते हैं। इस स्थिति से कैसे बाहर निकला जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: बेटा ज़रूरतें हमारी बहुत ज़्यादा होती…

प्रश्नकर्ता: सर आप 'कूल' लोगों का एकदम बाजा बजा देते हो। तो सवाल मेरा यह है कि आप कूल लोगों की इतनी बजाते क्यों हैं? उनकी इतनी बेइज्जती क्यों करते हैं?
आचार्य प्रशांत: 'कूल' माने क्या? 'कूल' के आध्यात्मिक अर्थ हो सकते हैं। कृष्ण अर्जुन को गीता में कहते हैं…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, हमे अपने कैरियर का चुनाव किस आधार पर करना चाहिए? क्या हमें अपना कैरियर अपने व्यक्तित्व के आधार पर चुनना चाहिए या जिसमे रुचि हो और सफलता मिले उस आधार पर?
आचार्य प्रशांत: नहीं, आमतौर पर हम, जिसे कैरियर कह रहे हैं, वो चुनते ही ऐसे…

प्रश्नकर्ता: क्या कुछ लोग प्राकृतिक तौर पर निडर और आध्यात्मिक होते हैं?
आचार्य प्रशांत: अध्यात्म के रास्ते पर जितना हानिप्रद है यह कहना कि मैं कायर हूँ उतना ही हानिप्रद है मानना कि मैं वीर हूँ। जैविकरूप से, निश्चितरूप से ऐसा हो सकता है कि जैसे तुमने कहा कि एक…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बहुत अच्छा लग रहा है यहाँ शिविर में आकर। ऐसा घर पर अनुभव नहीं होता। ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए?
आचार्य प्रशांत: दो-चार बातें हैं, सब ध्यान से सुनो। पहली बात तो ये कि—सही जगह पर जितना समय गुज़ारोगे, भ्रामक और अशांत जगह पर वक्त गुज़ारना…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपके वीडियो में एक बात सुनी थी, वो बात मन में ठहर गई। अब जो भी हरकत करता हूँ, जो भी गलती करता हूँ, तो उस वीडियो में सुनी उस बात को याद कर लेता हूँ, और उसी के संदर्भ में सीखने का प्रयास करता हूँ।
आपने…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आप आइ.आइ.टी., आइ.आइ.एम. से पढ़े, और फिर आइ.ए.एस. भी थे, फिर आपने ये सब छोड़ दिया। तो आपके भी कुछ संकोच रहे होंगे। या फिर परिस्थितियाँ कैसी थी कि आपने सबकुछ छोड़ दिया, इसकी प्रेरणा कहाँ से मिली आपको?
आचार्य प्रशांत: दूर से देखो तो ऐसा…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब कोई कुछ बोलता है, तो न चाहते हुए भी ‘ना’ नहीं बोल पाता हूँ।
आचार्य प्रशांत: ‘ना’ तो तुम बोलते हो, ऐसा तो नहीं है कि ‘ना’ नहीं बोल पाते।
ऐसा नहीं है। ‘ना’ तो हम बोलते हैं, वहाँ हमारा गणित होता है। हमें अच्छे से

प्रश्न: आचार्य जी, हम हमारा सच्चा प्यार, हमारा सच्चा व्यवसाय कैसे पाएँ? पापा ने कह दिया, “बी.टेक. कर लो, अच्छा होता है,” तो हम बी.टेक. करने आ गए। हर कोई अमीर बनना चाहता है, हर कोई अपनी ख़्वाहिशें ही पूरी करना चाहता है। पर ये हमारा सच्चा प्यार नहीं है।…

आचार्य प्रशांत: सिर्फ एक ध्यानस्थ आदमी ही प्रेम जान सकता है। वही स्रोत है, वहाँ से ही सब कुछ निकलता है। ये जो लाल खड़े मैदान हैं न, मैदान में बड़ी लड़ाईयाँ होती हैं। लड़ाई में वही खड़ा रह सकता है, जो अंदर से शांत हो।
बाहर की गहरी अशांति…

आचार्य प्रशांत: कॉलेज, घर, दोस्त, माता-पिता, शिक्षक, शॉपिंग मॉल; तुम्हारा संसार यही है, इतना ही है। यही है न?
कोई और होगा जिससे मैं पूछूँ, “संसार माने क्या?,” वो शायद बोलेगा, ‘*लेबोरेटरी*‘(प्रयोगशाला)। यह उसका संसार है। अगर कोई प्रेम में है और मैं उससे पूछूँ, “संसार क्या है?,” वो कहेगा,…

प्रश्न: गंभीरता क्या है?
आचार्य प्रशांत: गंभीरता का अर्थ है कि कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण है। गंभीरता एक भाव है कि कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण है। जब भी आपको कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण लगेगा, आप गंभीर हो जाओगे। तो इसमें तो कोई गड़बड़ दिखाई नहीं दे रही। मुझे लगा कि कुछ बहुत महत्त्वपूर्ण…

आचार्य प्रशांत: मैं आशा करता हूँ कि हम सभी को उत्कृष्टता की चाह है। यह मेरी कल्पना है, आशा है कि मैं गलत नहीं हूँ। क्या मैं गलत हूँ? हम में से कितने हैं, जो उत्कृष्टता नहीं चाहते?
देखिये, होता क्या है कि जिस तरीके से हम बड़े होते…

प्रश्न: कभी-कभी ऐसा होता है कि मन करता है कि सब कुछ छोड़-छाड़ कर चला जाऊँ, क्या ऐसा करना सही होगा?
आचार्य प्रशांत: देखो दो तरह की बातें हो सकती हैं:
१. एक बात होती है

आचार्य प्रशांत: देखो, अंधविश्वास आज के ज़माने में बहुत आगे नहीं बढ़ सकता है। विज्ञान इतना फैला हुआ है कि अब अंधविश्वासी होने का कोई वास्तविक डर बचा नहीं है, या है भी तो बहुत कम है। आज अन्धविश्वाश से कहीं ज़्यादा बड़ा जो ख़तरा है वह ख़तरा है अश्रद्धा…

आचार्य प्रशांत: क्या चर्चा कर रहे थे आप लोग आरम्भ में?
प्रश्नकर्ता: मज़बूती और कमज़ोरी – ये द्वैत के दो सिरे हैं और किसी भी एक सिरे पर बैठ कर इन दोनों को समझा नहीं जा सकता है। सर ने ये बात बताई थी, यहाँ से शुरुआत होती है।

आचार्य प्रशांत: पहली बात तो ये कि समय को नहीं मैनेज (प्रबंधित) किया जा सकता, ध्यान से समझिएगा इस बात को:
समय का अर्थ है एक प्राकृतिक परिवर्तन जो हो ही रहा है। उसको कोई नहीं मैनेज कर सकता। होना उसका स्वभाव है, वो होगा; हाँ एक एंटिटी (सत्ता) है,…

प्रश्नकर्ता: आपसे और जगह-जगह से ऐसी बातें सुनता हूँ पर जब अपनी ज़िन्दगी में उतारने की कोशिश करता हूँ तो बहुत सारी ऐसी चीज़ें आती हैं जो रोकती हैं, इसकी वजह क्या है?
आचार्य प्रशांत: देखो, हर आदमी के भीतर दो आदमी होते हैं। एक असली आदमी, और एक नकली…

प्रश्नकर्ता: सर, हम दूसरों को तो छोटी-छोटी चीज़ों में भी परखना चाहते हैं, पर अपने अन्दर कभी झाँक कर नहीं देखते।
आचार्य प्रशांत: मैं एक आयोजित चीज़ की बात नहीं कर रहा हूँ जो आपके अहंकार से निकलती है; मैं सहजता से निकलने वाले मुक्त आचरण की बात कर रहा…

श्रोता: सर, आपके अनुसार जिंदगी कैसे जीनी चाहिए? कैसे एन्जॉय करना चाहिए?
वक्ता: आदमी अकेला ही है जो पूछता है कि कैसे ‘एन्जॉय’ करें| इंसान अकेला ही ऐसा है जिसे अलग से कुछ करना पड़ता है, जिसे वो एन्जॉयमेंट का नाम दे सके| वो कहता है ये सब तो मेरी…

वक्ता: मृदुल का सवाल है- हम हारने पर दुखी क्यूँ हो जाते हैं? पिछली शताब्दी की कहानी है, कॉलोनाईज़ेशन’ जानते हो न? यूरोपियन देश थे, तो ये एशिया, अफ्रीका हर जगह अपने साम्राज्य को फैला रहे थे, विस्तार कर रहे थे।
तो सौ साल से ज़्यादा पुरानी ये कहानी है-…

श्रोता: सर, मेरा प्रश्न पढ़ाई से सम्बंधित है। दरअसल मुझे किताबी भाषा और ज्ञान में बिलकुल भी रुचि नहीं है। मैं प्रैक्टिकल ज्ञान हासिल करना चाहती हूँ प्रैक्टिकल चीज़ें सीख के पर, इसके परिणाम स्वरुप मेरे अंक अच्छे नहीं आते। मुझे क्या करना चाहिए?
वक्ता: पहले ये समझते हैं कि…

आचार्य प्रशांत: ब्रह्म विद्या सूक्ष्तम विद्या है और ये श्रेष्ठतम मनों के लिए है। हम बहुत भूल करेंगे अगर हम सोचेंगे कि जो गए-गुज़रे किसी काम के नहीं होते, समाज से पूरे तरीके से त्यक्त जो लोग हैं, निर्वासित किस्म के, आध्यात्मिकता उनके लिए है। कि जब बूढ़े हो जाओ…

उद्धरण : ये धारणा मन से निकाल दो कि तुम्हें गंभीर रहना है। तुम में से कोई ऐसा नहीं है जिसे खेलने-कूदने का मन न करता हो; तुम में से कोई ऐसा नहीं है जिसका व्यर्थ ही दौड़ लगाने का मन न करता हो; जिसका सब कुछ छोड़-छाड़ कर के…

प्रश्न: सर, कोई अगर मर गया, तो वो भी तो स्थिर हो गया?
वक्ता: जिसको ऐसी ज़िन्दगी बोलते हो, उसकी तो स्थिरता यही है। मुर्दा बहुत स्थिर होता है। वैसे तो हर समय जीवन भर हिलता-डुलता ही रहा, कब्र में डाल दो, फिर स्थिर हो जाता है। लेकिन दिक्कत ये…

प्रश्न: सर, हमारे देश में सभी प्रकार के संसाधन होते हुए भी हम विदेशी ताकतों पर निर्भर हैं – जैसे भाषा, प्राक्रतिक संसाधन, संस्कृति आदि।
वक्ता: तुम दूरदर्शन से आए हो? अरे अपने बारे में कुछ पूछ लो। ‘देश, प्राक्रतिक संसाधन, विदेशी ताकतें।’ अपने बारे में सवाल करो बेटा,…

प्रश्न: पापा कहते हैं दोस्त कुछ नहीं होते। दोस्तों पर ध्यान मत दिया करो। इनके साथ मत घूमा करो। “मैं खुद नहीं जाता। किसी के साथ जाते हुए देखा है तूने मुझे?” पर मुझे लगता है दोस्त भी होने ज़रूरी हैं। पर एक तरफ़ मैं भी सोचता हूँ कि विश्वास…

प्रश्न: सर, जब जीवन अपना है तो हम कोई भी निर्णय लेते समय दूसरों की मदद क्यों लेते हैं?
श्री प्रशान्त: अभिषेक, जीवन अपना है ही नहीं, इसलिए दूसरों की तरफ़ देखते रहते हो। जीवन अपना बिल्कुल भी नहीं है। ईमानदारी से बताना अभी पहले सेमेस्टर के नतीजे आ चुके…

प्रश्न: हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है?
वक्ता: न हो तो?
श्रोता १: तो हमारे और जानवरों में क्या फ़र्क रह जाएगा?

मंनै सुरति होवै मनि बुधि
~ जपुजी साहब
(The faithful have intuitive Awareness and Intelligence)

प्रश्न: सर, जैसे कर्ताभाव की बात होती है, तो कर्ताभाव जब उठता है, तब तो पता ही नहीं चलता कि ये कर्ताभाव है। जैसे कभी कर्ताभाव आ जाता है, कि हम पढ़ा रहे हैं, तो उस समय तो पता ही नहीं चलता कि ये कर्ताभाव है। अगर जान जाएँ कि…

वक्ता: जब किसी को बहुत कुछ हासिल होता है, तो वो थोड़ा मिलने पर खुश नहीं हो जाता और थोड़ा जाने पर दुखी भी नहीं हो जाता| जैसे कि कोई करोड़पति नाचने नहीं लग जायेगा, अगर उसे दस रूपए मिल गए और रोने नहीं लग जायेगा, अगर उसके दस रूपए…

प्रश्न: सर, परिपक्वता क्या है?
वक्ता: (१८-२२ वर्ष की आयु के विद्यार्थियों की सभा को संबोधित करते हुए)
यह शब्द ‘परिपक्वता’ हम सभी को अपने लिए महत्वपूर्ण लगता है, क्योंकि शारीरिक रूप से हम सभी परिपक्व हो गए हैं । अपने शरीरों को देखें तो दिखाई देगा कि हम सभी

वक्ता: जहाँ ‘ब्रह्मन’ (अंग्रेज़ी में) लिखा हुआ है, वह ब्रह्म है| ब्रह्म का मतलब होता है निराकार, बेनाम, पूरा स्रोत|
(मौन)
अच्छा एक सवाल| अभी मैंने जैसे बोला कि ब्रह्म माने निराकार, बेनाम, स्रोत, यह बात पूरी तरह से शुद्ध नहीं थी| क्यों शुद्ध नहीं थी?

वक्ता: विनीत का सवाल है कि जो भी विचार इस मन में आते हैं, वो आते तो बाहर से ही हैं| कोई न कोई बाहरी प्रभाव होता है जिसके फलस्वरूप मन में कोई विचार उठता है| कोई भी विचार पूर्णतया आंतरिक तो हो नहीं सकता| विचार का स्रोत कुछ न…

प्रश्न: अच्छा शिक्षक बनने के लिये हम क्या कर सकते हैं?
वक्ता: हम ये कर सकते हैं कि सबसे पहले कि मन से ये धारणा ही हटा दें कि शिक्षा, शिक्षक से पृथक है। बात समझियेगा। हमारे मन में ये बात बहुत गहरी बैठी हुई है कि हम क्या हैं?…

वक्ता: सिर्फ एक व्यक्ति है जिसका तुम्हें सच पता हो सकता हैं, किसका?
सभी श्रोता: अपना
वक्ता: तो उसकी ओर क्यों नहीं देखते? जिस एक आदमी का तुम्हें सच पूरा पता हो सकता हैं, उसकी ओर क्यों नहीं देख रहे? क्यों इधर-उधर निहारते हो? क्यों मन को भटकने देते हो?

प्रश्न: क्या अकेले रहने से हमारा विकास हो सकता है?
वक्ता: बेशक! समझो इस बात को। बाहर से जो तुम्हें मिलता है, वो हमेशा बाहरी ही होगा। याद रखना, बाहर से अलग मिलता है तो किसी को मिलता होगा, जिसको मिलता है वो बाहरी नहीं हो सकता, तुम खुद बाहरी…

प्रश्न: जीवन का ऊँचे से ऊँचा सुख क्या है?
वक्ता: जीवन का ऊँचे से ऊँचा सुख क्या है, अब इसमें, ध्यान सारा परम सुख की ओर चला गया, जीवन का परम सुख।इसमें जीवन को भूल गए, सवाल तो ऐसे पूछ रहे हो जैसे ‘जीवन’ पता ही हो। ‘जीवन तो हमें…

प्रश्न: अगर मैं कहता हूँ, ‘मैं अच्छा हूँ?’, तो ये मेरी ईगो है, अहंकार है, या सहजता?
वक्ता: बात बहुत दूर तक जाती है। हम जिन बातों को अच्छा या बुरा कहते हैं, सही या ग़लत कहते हैं, ज़रा ध्यान से देखो तो कि ये आये कहाँ से हैं? ईगो…

वक्ता: सवाल है किसी पर बहुत विश्वास करते है और विश्वास टूट रहा हो तो क्या करना चाहिए ? हर विश्वास टूटेगा ही टूटेगा। विश्वास अगर किया है तो तुम चोट खाने की तैयारी पहले ही कर के बैठ गए हो। विश्वास का अर्थ समझते हो क्या होता है ?…
“हममें और इंसानों में कोई फर्क ही नहीं…
श्रोता १: क्योंकि आपने…