इस बात को भूलना नहीं – इनटियूटिव प्री-अंडरस्टेंडिंग (सहज ज्ञान युक्त पूर्व समझ)। और यह आपने देखा होगा कि बात कान में पड़ती है और हमें लगता है कि ‘हाँ हाँ पता है’। पता है। बस शब्द दे दो। मैं शब्द नहीं खोज पा रहा हूँ, पर पता है। यह जो कहा जा रहा है, मैं पूरी तरह से इसको जानता हूँ। यह आवाज़ सुनी हुई है। यह सत्य जाना हुआ है। यह मेरा ही सत्य है। भले ही कह अभी कोई और रहा है, पर यह सत्य मेरा ही है। और जब तुम्हें यह लगने लगे की ‘हाँ हाँ हाँ हाँ…कह कोई और रहा होगा पर बात मेरी ही है, तब समझना कि तुमने समझा। जब तक बात किसी दूसरे की है तब तक कुछ नहीं समझा। और यह प्रतीति तुम्हें पक्के तौर पर होके रहेगी। गहराई से सुनने के षणों में तुम्हें यह प्रतीति होकर के रहेगी कि यह जो बात है वह निर्विवाद रूप से सत्य है। क्यूंकि मुझे पहले से ही पता है। मैं प्रमाण हूँ इस बात का कि यह सत्य है। बड़ा पुराना सत्य है, पर पता नहीं कितना पुराना। जितना पुराना मैं हूँ, उतना पुराना। मैं जानता हूँ। किसी प्रमाण की ज़रुरत नहीं है। प्रमाण की ज़रुरत तो तब पड़ती है जब संदेह हो। जहाँ संदेह ही नहीं है वहाँ प्रमाण कौन मांगेगा? तुम्हें संदेह ही नहीं रह जाता। इतनी पक्की रहती है बात। पक्की इसलिए नहीं कि किसी और ने बोल दी जिसपर तुम्हें विश्वास है। पक्की इसलिए है क्यूंकि तुम कहते हो ‘अच्छा ठीक है पता ही थी’ – इनटियूटिव प्री अंडरस्टेंडिंग (सहज ज्ञान युक्त पूर्व समझ)।