प्रश्न: अगर मैं कहता हूँ, ‘मैं अच्छा हूँ?’, तो ये मेरी ईगो है, अहंकार है, या सहजता?
वक्ता: बात बहुत दूर तक जाती है। हम जिन बातों को अच्छा या बुरा कहते हैं, सही या ग़लत कहते हैं, ज़रा ध्यान से देखो तो कि ये आये कहाँ से हैं? ईगो क्या है? कि बाहर से कोई कुछ दे दे तो हम उसको ही सच मानना शुरू कर देते हैं। हमारे सारे अच्छे और बुरे, सही और ग़लत की सारी परिभाषा क्या हमारी हैं? एक देश में जो सही होता है, दूसरे देश में वो ग़लत हो जाता है। अमेरिका अगर चले जाओ तो वहाँ जो एक स्टेट में सही है वो दूसरे स्टेट में ग़लत है। एक घर में जो अच्छा है, उसे दूसरे घर में बुरा माना जाता है। एक धर्म में जो सही है, दूसरे धर्म में उसे ग़लत माना जाता है। एक ही घर में, एक ही देश में आज जो अच्छा है, वो कल बुरा बन सकता है। इसी देश में, इसी ज़मीन पर, आज से दो सौ साल पहले अगर पति मर जाए तो पत्नी का खुद को आग लगा लेना बड़ा पुण्य माना जाता था। मंदिर बनते थे ऐसी औरतों के, ‘सती देवी’ कहा जाता था। आज यहाँ पर कितनी ऐसी महिलाएं हैं जो पति के पीछे अपने को आग लगाना पसंद करेंगी?
(सारे हँस पड़ते हैं)
माहौल विपरीत हो सकता है लेकिन ये ना होगा कि पति मरा तो आग ही लगा ली अपने आप को, तो ये बात आज अधिक से अधिक एक मज़ाक का विषय बन कर रह सकती है। अभी बस उसे इतनी अहमियत दी जा सकती है कि मज़ाक है, तो हंस लो। लेकिन चले जाओ इतिहास में बस दो सौ साल पहले, तो ये मज़ाक नहीं था, ये बड़ा गम्भीर मुद्दा था, प्रथा थी। राज राममोहन रॉय जैसे लोगों को नाकों चने चबाने पड़े थे, इस कुप्रथा को बंद करवाने में।
मूल बात पर वापस आते हैं कि जो अच्छा है या जो बुरा है, ये तो बहुत कुछ स्थान, समय, समाज पर आधारित चीज़ें हैं। ‘हमने खुद जाना कहाँ है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा ! हमने खुद जाना कहाँ? अगर मैं खुद ठीक-ठीक जानूँ कि ये बात है, तो बस यही बात अच्छी है। बाकी सारे अच्छे-बुरे उधारी के हैं, नकली हैं, उनमें कुछ रखा नहीं हैं’। मुझसे पूछो तो मैं कहूँगा एक ही चीज़ अच्छी है और वो है समझ के अनुसार चलना। सिर्फ तुम्हारा अपना होश ही अच्छा है। और फिर एक ही बात बुरी भी है, तुम्हारी अपनी बेहोशी। बाकी अच्छे-बुरे तो बदलते रहते हैं। समझ रहे हो? अगर अपने को अपनी नज़र से जाना तो सब अच्छा है। अपने को अपनी नज़र से जाना तो दुनिया को भी अपनी नज़र से ही देखोगे तो फिर सब अच्छा है। वरना तुमने जितने सही और ग़लत पकड़ रखे हैं, उनमें कुछ रखा नहीं है।

