वक्ता: विनीत का सवाल है कि जो भी विचार इस मन में आते हैं, वो आते तो बाहर से ही हैं| कोई न कोई बाहरी प्रभाव होता है जिसके फलस्वरूप मन में कोई विचार उठता है| कोई भी विचार पूर्णतया आंतरिक तो हो नहीं सकता| विचार का स्रोत कुछ न कुछ जो बाहर हो रहा है, वहीं पर है| तो विचारों का करें क्या? और मन ये भी जान रहा है कि ये तो ‘मन’ का ही एक नियम ही है|
बिल्कुल ठीक कहा| मन का यही नियम है कि वो पूर्णतया बाहरी पर आश्रित है| मन का यही नियम है कि उसका अपना कुछ नहीं है, वो जो पाता है बाहर से ही पाता है| लेकिन विनीत, तुमसे ये किसने कह दिया कि तुम मात्र मन हो? तुमसे ये किसने कह दिया कि मन के अलावा तुम्हारा कोई और अस्तित्व नहीं?
मन निश्चित रूप से ग़ुलाम है| जो भी तुम देखोगे, वो बाहर से ही आयेगा| जो भी तुम सुनोगे, वो बाहर से ही आयेगा| जो भी जानकारी तुम एकत्रित करोगे, वो भी बाहर से ही आयेगी| पर उन सब को समझने की क्षमता भी क्या बाहर से आयेगी?
सभी श्रोतागण (एक स्वर में): नहीं|
वक्ता: वो पूर्णतया तुम्हारी है, आत्यांतिक है, आंतरिक है और वही तुम हो| प्रभाव बाहरी ही होंगे, पर तुम बाहरी नहीं हो| प्रभावों को आने दो बाहर से, पर तुम ख़ुद को तो बाहर से मत लाओ| बात समझ में आ रही है?
सभी श्रोतागण (एक स्वर में): जी, सर|



