
इन सब से मुक्ति का एक ही तरीका है, वो बचो ही नहीं जो मूर्ख जाकर के दुनिया से, जगत से, प्रकृति से कामना पूर्ति की आशा रखता था, वो बचो ही नहीं। उसके अलावा और तुम कितने भी हथकंडे लगा लो, अतीत तो लौट-लौट के बार-बार आएगा और सर पर चढ़ेगा ही चढ़ेगा।

प्रश्नकर्ता: अपरोक्षानुभूति में बताया गया है कि मैं सब गुणों, सब क्रियाओं के पार हूँ, मैं अमर और मुक्त हूँ। तो फिर जीवन में किए गए कार्यों के लिए मैं ज़िम्मेदार कैसे हुआ?
आचार्य प्रशांत: अपरोक्षानुभूति कह रही है कि “जीव अमर है और मुक्त है, जीव अकर्ता है, जीव…

प्रश्नकर्ता: मैं कर्मयोग को समझना चाहता हूँ, कर्मयोग को जीवन में उतारना चाहता हूँ क्योंकि ज्ञान की बात आती है तब मन विचलित हो जाता है और जब भक्ति की बात आती है तब निष्क्रिय हो जाता हूँ, आलसी हो जाता हूँ, और भौतिक तल पर भी खाने के भी…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं आज शिविर में आया हूँ तो क्या यह मेरा निर्णय है या यह एक पूर्व-निर्धारित घटना है?
आचार्य प्रशांत: आप यहाँ पर आए हो ये आपके अहं का निर्णय है। आपको मुक्त होना ही है ये बात आपके निर्णय की नहीं है, यह बात तय है।…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कर्मों के बारे में कुछ कहेंगे? कर्म क्या चीज़ है?
आचार्य प्रशांत: हमारे कर्म तो सही चीज़ को पाने का ग़लत प्रयास हैं। जो गहरी नीयत है वो तो ठीक ही है कि शान्ति मिल जाए, पर जो प्रयास की पूरी दिशा है, प्रयास करने वाले का…

कर्माणि कतिविधानि सन्तीति चेत् आगामिसञ्चितप्रारब्धभेदेन त्रिविधानि सन्ति। ~तत्वबोध
कर्म कितने प्रकार के होते हैं? आगामी, संचित और प्रारब्ध - तीन प्रकार के होते हैं।
ज्ञानोत्पत्त्यनन्तरं ज्ञानिदेहकृतं पुण्यपापरूपं कर्म यदस्ति तदागामीत्यभिधीयते ।

प्रश्नकर्ताः आचार्य जी, कर्म माने क्या?
आचार्य प्रशान्त: कर्म होता है और कर्म दो जगहों से निकलता है — या तो साफ केंद्र से, हृदय से, या अहंकार से। बस इतना ही। अहंकार से जो कर्म निकलेगा वह हमेशा भविष्यवाची होता है, हमेशा किसी फल, किसी मंतव्य की अपेक्षा में…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी आपने कहा था कि कर्म को नहीं, उसके पीछे के कर्ता को देखना चाहिए, लेकिन उसके लिए वैसी नज़र भी तो चाहिए। हम तो सिर्फ़ कर्म ही देख सकते हैं। कृपया समझाएँ।
आचार्य प्रशांत: पर अगर तुम्हारी नज़र ही यही है कि, "मुझे काम को देखना है"…

प्रश्नकर्ता: कृष्णमूर्ति साहब सभी वृत्तियों, विचारों, भावनाओं वगैरह को बिना निर्णय के देखने को कहते हैं। ये मुझे असंभव लगता है। किसी भी विचार या भावना के उठते ही मैं या तो उसके पक्ष में हो जाता हूँ या विपक्ष में। कृपया समझाएँ।
आचार्य प्रशांत: विचार जिसको उठ रहा है…

प्रश्नकर्ता: गीता में श्रीकृष्ण तीन तरीके के काम का ज़िक्र करते हैं: सकाम कर्म, कर्म, अकर्म और विकर्म। तो इनमें क्या भेद है?
आचार्य प्रशांत: कर्म, अकर्म, विकर्म, सकाम कर्म, निष्काम कर्म। चलो समझते हैं। संसार माने गति। प्रकृति माने परिवर्तन, समय माने परिवर्तन। ये पाँच तरह के कर्म क्या…

आचार्य प्रशांत: “कर्ता कौन है? जीव कौन है?” उपनिषद् ने यहाँ भी बड़े संक्षेप में उत्तर दिए हैं। कर्ता वो है जिसे सुख और दु:ख की अभीप्सा है। जिसे सुख और दु:ख की अभीप्सा है उसका नाम कर्ता है; क्योंकि वो जो कुछ भी करता है किस लिए करता है?…

प्रश्नकर्ता: ओशो जी से ये बात सुनी है है कि कर्मफल कर्म के बिलकुल साथ में आता है। कृपया इसे समझाने की कृपा करें।
आचार्य प्रशांत: झूठ कोई ऐसे ही तो बोलता नहीं न। हिंसा कोई यूँ ही तो करता नहीं। जितने भी कृत्य होते हैं जिनको तुम पाप कहते…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम स्वयं को कर्ता मानें या नहीं?
आचार्य प्रशांत: कर्ता तुम हो, लगातार हो, तुम्हीं हो, कोई और नहीं है। आम आदमी जिस स्थिति पर बैठा है उसके लिए बहुत ज़रूरी है कि वो लगातार खुद को ही कर्ता माने। आम आदमी के लिए बोल रहा हूँ,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। ये पूछना था कि मैंने कई बार देखा है कि बचपन में ही छोटे बच्चे बहुत ही गंभीर हालत में बीमारियों में आ जाते हैं अस्पतालों में, कैंसर हो जाता है, बहुत सी अलग-अलग बीमारियाँ हो जाती हैं। सबका कारण यही दिया जाता है कि ये…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जिस दिन से शिविर में आया हूँ, खाँस रहा हूँ। हो सकता है पहले भी खाँसता होऊँगा, पर वो इतना महसूस नहीं होता था जितना अब शिविर में हो रहा है। इससे बड़ी शर्मिंदगी महसूस हो रही है, और ऐसा लग रहा है कि इससे सभी लोगों…

आचार्य प्रशांत: बहुत अच्छा सवाल है। तुम्हारा नाम क्या है?
श्रोता: रोहित।
आचार्य जी: रोहित, रोहित पूछ रहा है कि यथार्थता और औचित्य के बीच अंतर क्या है? और आप में से जो भी लोग आज और कुछ ना समझ पाएं, बस इस सवाल को समझ लें।

प्रश्नकर्ता: कभी-कभी यह जो वक्तव्य आता है कि सब स्वचलित है, स्वघटित है मन को देने के लिए, अब जिसने यह समझ लिया कि न समाधि पाने की चीज़ है न विक्षेप पाने की चीज़ है, तो अब विचार तो आने बंद हो नहीं जाएँगे, लोग भी बाते करेंगे, वहाँ…

प्रश्नकर्ता: सर, हर प्रयास के साथ हम कुछ-न-कुछ उम्मीद क्यों लगाए रहते हैं?
आचार्य प्रशांत: ऐसा है नहीं। फिर वही पूछूँगा — प्रेम में होते हो, किसी से गले मिल रहे हो, तो कुछ उम्मीद भी रख रहे हो क्या?

प्रश्न: यहाँ मुद्दा जो है, जो मैंने उदाहरण दिया था दिये को बुझाना| तो अंततःदबाना तो नहीं है| तो कैसे बुझाना है?
वक्ता: वो बुझाने का अर्थ कुछ करना नहीं है| उस बुझाने का अर्थ ही है ये कि जान लेना कि ये रौशनी झूठी है| उन्होंने कहा ना कि…

आचार्य प्रशांत: अच्छा, आप ने एक चीज़ गौर करी है? यूँ ही, कहीं रहो, घर में, बाज़ार में, बोलना आसान होता है। यहाँ आते हैं, शुरुआत में, बोलना थोड़ा सा अटक जाता है और फिर कुछ देर बाद, या आधे घंटे बाद, यहाँ भी बोलना आसान हो जाता है,…

प्रश्नकर्ता: गिरते हुए समाज में मेरा सही कर्म क्या है?
आचार्य प्रशांत: समाज या दुनिया क्या है? हम हैं, आप हैं; जैसे हम हैं, आप हैं, वैसा ही संसार है। अगर आप समाज को और संसार को गिरता हुआ पाते हैं, तो उसका कारण यही है कि इंसान गिर रहा…

If desire shall conceal true self, True self will manifest itself even more. If desire shall weaken true self, True self will strengthen itself even more. If desire shall abandon true self, True self will be prosperous even more. If desire shall deprive true self, True self will give even…

आचार्य प्रशांत: हम जो कुछ करते हैं, उसमें मन के कितने सूक्ष्म खेल चल रहे हैं, इसकी हमें खबर ही नहीं होती। हम सोचते हैं की हम मदद कर रहे हैं। नहीं, कोई मदद नहीं कर रहे, सिर्फ अपने अहंकार को प्रोत्साहन दे रहे हो।
श्रोता: सर, हर…

आचार्य प्रशांत: पहली बात तो ये कि समय को नहीं मैनेज (प्रबंधित) किया जा सकता, ध्यान से समझिएगा इस बात को:
समय का अर्थ है एक प्राकृतिक परिवर्तन जो हो ही रहा है। उसको कोई नहीं मैनेज कर सकता। होना उसका स्वभाव है, वो होगा; हाँ एक एंटिटी (सत्ता) है,…

श्रोता: “*लव इज़ एफर्ट एंड एक्शन*”
वक्ता: बात क्या है? एक्शन को समझेंगे। जगत में कुछ भी स्थिर नहीं है। कुछ भी स्थिर नहीं है। छोटे से छोटे समय के लिए भी स्थिर नहीं है। आप उसको हमेशा गतिमान पाएंगे। मन चल रहा है, शरीर चल रहा है ये दोनों…

प्रश्न: ‘क्रिया’, ‘कर्म’ और ‘फल’ में क्या सम्बन्ध है?
वक्ता: तीन तल होते हैं किसी भी घटना के। एक तल है क्रिया का, एक तल है सकाम कर्म का, और एक तल है निष्काम कर्म का। क्रिया वो तल है, जहाँ पर वृत्तियाँ काम करती हैं और कर्ता को कर्ता…

प्रश्नकर्ता: सर, मेरा प्रशन यह है कि भाग्य नाम की भी कोई चीज़ होती है जो ज़िंदगी से जुड़ी होती है या केवल कर्म ही सब कुछ होता है?
आचार्य प्रशांत: प्रश्नकर्ता ने कहा कि, "क्या कर्म ही सब कुछ होता है या भाग्य का भी कोई महत्व है?" दोनों…

आचार्य प्रशांत: विषय-वासना, विषय माने ऑब्जेक्ट। जब भी आप विषय बनते हो तो आप किसी चीज़ को वस्तु बना देते हो। विषय और वस्तु बनने का मतलब ही यही होता है कि आप अधूरे हैं, कुछ है जो बाहर है और आपसे अलग है। अलग होने का अर्थ ही यही…

प्रश्न: ‘सब कुछ असत्य परोक्ष रूप से असली है और वास्तविक सीधे वास्तविक है।चोरी इत्यादी कार्य कष्ट देते हैं जब तक हम इस कष्ट का एहसास नहीं करते|’
एहसास किसका? क्या ऐसा है कि यह भी परोक्ष रूप से असली हैं या कष्ट का एहसास हैं?

आचार्य प्रशांत: ये मत पूछो कि, ‘ मुझे कैसे पता कि मेरा एक्शन पूर्णतया सही है या नहीं?’ ज़्यादा ईमानदारी की बात यह है कि, ‘मुझे जो चीज़ पता है कि सही है, मैं वो भी कर पा रहा हूँ या नहीं?’ ग़लती यह नहीं है कि कोई पूर्णतया सही…

कुलवन्ता कोटिक मिले, पण्डित कोटि पचीस।सुपाच भक्त की पनहि में, तुलै न काहू शीश।।~ संत कबीर
वक्ता: पंडित भक्त से क्यों निम्नतर है?पंडित कौन है? किसको पंडित कह रहें हैं? हर ज्ञान पंडिताई है क्योंकि ज्ञान होता है मानसिक और जीवन मानसिक नहीं होता, तो ऐसा नहीं है कि…

प्रश्नकर्ता: जीवन में सर्वश्रेष्ठ करने योग्य क्या है? हम यहाँ - पृथ्वी कहें, पृथ्वी-लोक कहें - हमारा यहाँ जीवन-काल सीमित समय तक है। क्या है सर्वश्रेष्ठ जो हमें करना चाहिए? और वास्तव में तो ये खेल ही क्या है, लाइफ़ (जीवन)? हम यहाँ हैं, कभी नहीं थे, फिर कभी नहीं…

श्रोता १: बेटे और पिता के बीच में प्रेम के अलावा कर्तव्य भी है, मतलब ऐसा किसी भी रिलेशन (रिश्ते) में नहीं है कि कर्तव्य न हो।
वक्ता: बेटा, जब बाहर से कोई बताए कि ऐसा करो, तो उसका नाम होता है ‘कर्तव्य’। और जब पिता के प्रति प्रेम हो…

वक्ता: विनय ने लिखा है- ‘क्या करें जब आपके भीतर बड़ी ऊब, चिढ़, बेचैनी पैदा हो जाए, कोई काम करते समय, यद्यपि आपको पता है कि जो आप कर रहे हैं, वो कर पाने का सामर्थ्य आपमें है?’
सवाल क्या है, सबको पता है? मैं कोई काम कर रहा…

प्रश्न: सर, जैसे कर्ताभाव की बात होती है, तो कर्ताभाव जब उठता है, तब तो पता ही नहीं चलता कि ये कर्ताभाव है। जैसे कभी कर्ताभाव आ जाता है, कि हम पढ़ा रहे हैं, तो उस समय तो पता ही नहीं चलता कि ये कर्ताभाव है। अगर जान जाएँ कि…

प्रश्न: ‘ज्ञानयोगी’ और ‘कर्मयोगी’ में क्या अंतर है? आदमी कैसे जाने कि वह किस मार्ग पर है? जहाँ ज्ञान है वहीं कर्म है, जहाँ कर्म है वहीं ज्ञान है, तो इनमें भेद क्या है?
वक्ता: कोई भेद नहीं है। कोई भेद है ही नहीं। आप कहाँ से देख रहे हो,…

गुरु कीजै जानि के, पानी पीजै छानि |
बिना विचारे गुरु करे, परै चौरासी खानि ||
संत कबीर

कहा चुनावै मेड़िया, चूना माटी लाय ।मीच सुनेगी पापिनी, दौरि के लेगी आय ।।-कबीर
वक्ता: आदमी जो कुछ भी करता है, वो करता किसी इच्छा के वशीभूत होकर ही है, और हर इच्छा आख़िर में परम की ही इच्छा है। लेकिन आप जो कुछ भी करते हैं, उस पर तुरंत…

प्रश्नकर्ता: धर्म क्या है?
आचार्य प्रशांत: हमारे लिए धर्म क्या है, वो मैं बता देता हूँ। हमारे लिए धर्म का इतना ही अर्थ है- मंदिर चले जाना या मस्जिद चले जाना, कोई किताब है उसको पूजनीय मान लेना, कुछ त्यौहार हैं, उन त्यौहारों को मना लेना, और कुछ रस्में बना…

प्रश्न: महर्षि रमण से किसी से प्रश्न किया कि क्या कर्म का फल मिलना आवश्यक है? तो उन्होंने जवाब दिया कि नहीं। फिर भक्त ने पूछा क्यों? तो उन्होंने कहा की एक स्थिति ऐसी आती है जब आदमी का अहंकार ही समर्पित हो जाता है और वो आत्म ही हो…






पृथ्वी को बचाने के लिए यूनाइटेड नेशंस की सीओपी ने यह शर्त रखी थी कि 2030 तक वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री से अधिक नहीं बढ़ना चाहिए। हमने वह सीमा 2025 में ही लांघ दी है। यह आने वाले बहुत-बहुत बड़े विनाश का संकेत है। आदमी के इतिहास में इससे ख़तरनाक पल कभी नहीं आया। उस ख़तरे को चुनौती देने के लिए ही यह "ऑपरेशन 2030" है, जिसका उद्देश्य है कि आम आदमी में चेतना जगाई जाए — “देखो, तुम्हारा ग्रह विनाश की ओर कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है। तुम अपने बच्चों के लिए एक ऐसा ग्रह छोड़कर जा रहे हो, जहाँ आफ़तें ही आफ़तें होंगी।”



ज्ञान की उत्पत्ति के पश्चात ज्ञानी के शरीर के द्वारा जो पाप-पुण्य रूप कर्म होते हैं, वे आगामी…
अध्यात्म की रोशनी जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ती है, तो राजनीति पर भी पड़ेगी ही पड़ेगी। ऐसा कुछ नहीं है कि आध्यात्मिक आदमी राजनीति के प्रति अंधा हो जाता है। बल्कि हक़ीक़त तो यह है कि राजनीति को आध्यात्मिक लोगों की बहुत सख़्त ज़रूरत है, क्योंकि राजनेता ताक़त की ऐसी गद्दियों पर बैठते हैं, जहाँ से वो आपके जीवन को बहुत तरीके से प्रभावित करते हैं। राजनेता अगर आध्यात्मिक नहीं है, तो देश रसातल में जाएगा। राजनीति त्यागनी नहीं है, सही राजनीति करनी है।https://acharyaprashant.org/en/articles/raajneeti-mein-adhyatm-kyon-zaroori-1_795988a15
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प्रश्नकर्ता: कृष्ण अध्याय नौ में बताते हैं कि वे सब भूतों में समभाव से व्यक्त हैं, वहीं अध्याय दस में बताते हैं कि जो कुछ भी विभूतियुक्त, कांतियुक्त और शक्ति युक्त है, वो कृष्ण की अभिव्यक्ति है। अध्याय नौ में कृष्ण कहते हैं कि ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद मैं ही हूँ…
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने:।।
जो सब जीवों के लिए रात्रि है, वह आत्मसंयमी के जागने का समय है और जो समस्त जीवों के जागने का समय है, वह आत्मनिरीक्षक मुनि के लिए रात्रि है।
—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ६९
प्रश्नकर्ता: जब…