प्रश्नकर्ता: धर्म क्या है?
आचार्य प्रशांत: हमारे लिए धर्म क्या है, वो मैं बता देता हूँ। हमारे लिए धर्म का इतना ही अर्थ है- मंदिर चले जाना या मस्जिद चले जाना, कोई किताब है उसको पूजनीय मान लेना, कुछ त्यौहार हैं, उन त्यौहारों को मना लेना, और कुछ रस्में बना दी गईं हैं, जिनका पालन करना। उन रस्मों में यह भी शामिल है कि क्या ठीक है और क्या नहीं। तो एक प्रकार की नैतिकता है। हमारा धर्म इसके आगे और कुछ नहीं है। पर क्या यही सच्ची धार्मिकता है? कि कुछ त्यौहार मना लिए, दशहरा, होली, दीवाली मना लिया, कुछ संस्कारों का पालन कर लिया, गीता या क़ुरआन की पूजा कर ली। क्या इसी का नाम धर्म है? कुछ उचित और अनुचित को मान लिया, क्या उसी का नाम धर्म है? या धर्म कुछ और है?
धर्म का अर्थ है लगातार हर पल ये जानना, हर पल ये जानना कि मेरे लिए सही क्या है। धर्म का अर्थ है प्रतिपल जागृत रहना। इस वक़्त तुम पूरे ध्यान में हो और जान रहे हो, तो तुम धार्मिक हो। यहाँ पर ऐसे भी लोग हैं जिनका मन विचलित है। वह गहराई से अधार्मिक व्यक्ति है। धर्म का अर्थ है, पूरे तरीके से अपने संपर्क में रहना। धर्म का अर्थ है, लगातार-लगातार जो नकली है उससे बचे रहना। बात समझ में आ रही है?
तुम्हें कुछ रस्में दे दी गईं हैं, इनको मानने से धर्म नहीं होता है। तुम्हें कुछ देवी-देवता के नाम बता दिए गए हैं, वह धर्म नहीं है। आतिशबाजी करना, रंग लगाना, वह धर्म नहीं है। क़ुर्बानी देना भी धर्म नहीं है। ये सब तो आनी-जानी बातें हैं। ये धर्म नहीं है। यदि धर्म जीवन जीना सिखाता है, तो इसका अर्थ ये है कि धार्मिकता हर पल की होनी चाहिए क्योंकि जीवन हर पल है। या जीवन रुक-रुक कर है? जीवन हर पल है, तो धर्म भी हर पल है। और हर पल ये जानना कि ये सब क्या है, ये माझरा क्या है, इसी का नाम धर्म है। कोई भी धर्म किसी-न-किसी परम की बात ज़रूर करता है, द अल्टीमेट, सर्वोच्च। कभी इसको ब्रह्म कहते हैं, कभी विशुद्ध चेतना। पर नाम कुछ भी दिया जाए, कहीं-न-कहीं किसी परम का नाम होता है।



