प्रश्न: यहाँ मुद्दा जो है, जो मैंने उदाहरण दिया था दिये को बुझाना| तो अंततःदबाना तो नहीं है| तो कैसे बुझाना है?
वक्ता: वो बुझाने का अर्थ कुछ करना नहीं है| उस बुझाने का अर्थ ही है ये कि जान लेना कि ये रौशनी झूठी है| उन्होंने कहा ना कि मिट वही सकता है जो है ही नहीं| अब अगर रौशनी होती तो मिट कैसे जाती? उस दिये के बुझने का मतलब ये नहीं है कि कुछ कर दिया| उस दिये के बुझने का मतलब है ये जान लिया कि रौशनी झूठी है| दिया वास्तव में नहीं बुझ गया| दिया वास्तव में बुझ गया तो अर्थ ये होगा कि पहले जल रहा था| जल कभी भी नहीं रहा था वो|
रौशनी झूठी है| बस ये| क्या रौशनियाँ होती हैं हमारी जिन्दगी में?
श्रोता१: जैसे कि मेरी एक इच्छा है फ़ोन लेना|
वक्ता: क्या रौशनियाँ हैं हमारी जिन्दगी में? कौन से लोग हैं? कौन सी घटनाएँ हैं जो हमारी ज़िंदगी को रौशन करते है? वो कौन आया, रौशन हो गयी महफ़िल जिसके नाम से? गाना भी है, “मेरे घर में जैसे सूरज निकला है शाम से”| तो कौन सी रौशनियाँ हैं? बड़ी-बड़ी रौशनियाँ हैं? तो निर्वाण का अर्थ है यही जान लेना कि रौशनी है ही नहीं| ये फ्यूज़ बल्ब हैं| इनमे से कभी कुछ नहीं होगा| ये फुस्स पटाखे हैं? न इनमे रौशनी निकलेगी, न आवाज होंगी| ये सिर्फ उम्मीदों पर रखे हैं हमको| इनमें कुछ और नहीं है|
जिस दिन तक दिवाली नहीं आती उस दिन तक फुस्स पटाका भी बिकता है, संभाला जाता है| जिस दिन तक दिवाली नहीं आती उस दिन झालर जिसमे फ्यूज़ ही फ्यूज़ बल्ब हो वो झालर भी…?



