काम को पूरी सच्चाई से चुनो और फिर उसमें निर्विकल्प होकर डूब जाओ || आचार्य प्रशांत(2015)

वक्ता: विनय ने लिखा है- ‘क्या करें जब आपके भीतर बड़ी ऊब, चिढ़, बेचैनी पैदा हो जाए, कोई काम करते समय, यद्यपि आपको पता है कि जो आप कर रहे हैं, वो कर पाने का सामर्थ्य आपमें है?’
सवाल क्या है, सबको पता है? मैं कोई काम कर रहा हूँ, लेकिन उस काम को करते समय मुझे बड़ी खीझ हो रही है – *फ्रस्ट्रेशन(निराशा)*।बेचैनी है। किसी न किसी तरीके का आंतरिक कोलाहल मचा हुआ है। मुझे पता है, मैं यह काम कर सकता हूँ लेकिन उसके बाद भी मन इधर-उधर भाग रहा है।
बेटा! एक ओर तो तुम यह लिख रहे हो कि जो काम तुम कर रहे हो, वो कर पाने का सामर्थ्य तुममें है। क्या मैं यह मानूँ कि वो काम तुम वाकयी करना चाहते हो, उस काम से प्रेम है तुम्हें। मानूँ? है ऐसा?
श्रोता १: प्रेम है।
वक्ता: तुम कह रहे हो कि तुम्हें प्रेम है। तुम्हें वाकयी अगर किसी काम से प्रेम होता है। उदाहरण के लिए अगर अभी मैं तुमसे कुछ कह रहा हूँ और तुम मुझे सुन रहे हो, ठीक-ठीक बताओ, क्या तुम्हें पता भी है कि मौसाजी का कौन सा हाथ ऊपर है और कौनसा हाथ नीचे है?
श्रोता १: नहीं पता।
वक्ता: नहीं पता। देख नहीं रहे। क्या तुम्हें यह भी पता है कि मेरे बगल में जो लोग बैठे हैं, उनकी आँखें खुली हैं या बंद हैं? अभी मुझे देख रहे हो या उनको देख रहे हो, ठीक अभी जब मुझसे बात कर रहे हो?


