श्रोता: “*लव इज़ एफर्ट एंड एक्शन*”
वक्ता: बात क्या है? एक्शन को समझेंगे। जगत में कुछ भी स्थिर नहीं है। कुछ भी स्थिर नहीं है। छोटे से छोटे समय के लिए भी स्थिर नहीं है। आप उसको हमेशा गतिमान पाएंगे। मन चल रहा है, शरीर चल रहा है ये दोनों ही एक्शन हैं। मन का चलना और शरीर का चलना ये दोनों ही एक्शन हैं। लव इज़ एफर्ट एंड एक्शन। जो चलना है ये दो प्रकार से होता है, जैसे आज हमने बात करी थी कि एक जिन्दा प्रवाह और एक मुर्दा प्रवाह, ड़ेड फ्लो। तो वैसे ही ये चलना भी दो प्रकार से होता है: एक होता है पूरी तरह से अव्यवस्थित, केओटिक। और एक होता है जिसमें एक आंतरिक व्यवस्था हो, आर्डरली। पैटर्न्स नहीं आर्डर। प्रेम उस व्यवस्था का नाम है, प्रेम उस गतिशीलता का नाम है।
ऐसा नहीं है कि जिस मन ने प्रेम जाना नहीं वहाँ कोई गति होती ही नहीं। गति वहाँ भी होती है पर वो गति वैसे ही होती है जैसे किसी पागल की गति हो। गिर रहा है, ठोकरें खा रहा है, कष्ट भी पा रहा है।
प्रेम में जो गति होती है उसमें एक सुव्यवस्था होती है। प्रेम में जो गति होती है वो न तो शराबी की होती है, न वो धावक की होती है। प्रेम की गति वैसी होती है जैसे नर्तक की होती है।
हम द्वैत के दो सिरों को जानते हैं, हम ये जानते हैं कि दो तरह के लोग होते हैं : एक वो जो कहीं को भी नहीं पहुँच रहे, एक वो लोग हैं जो कहीं को भी नहीं पहुँच पा रहे क्योंकि वो सामान्य बुद्धि से भी नीचे हैं, वो एक



