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Bhagavad Gita

Why do I restless
Bhagavad Gita
Why do I restless
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This article is related to restlessness.

ऑपरेशन 2030
Bhagavad Gita
ऑपरेशन 2030
11min
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पृथ्वी को बचाने के लिए यूनाइटेड नेशंस की सीओपी ने यह शर्त रखी थी कि 2030 तक वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री से अधिक नहीं बढ़ना चाहिए। हमने वह सीमा 2025 में ही लांघ दी है। यह आने वाले बहुत-बहुत बड़े विनाश का संकेत है। आदमी के इतिहास में इससे ख़तरनाक पल कभी नहीं आया। उस ख़तरे को चुनौती देने के लिए ही यह "ऑपरेशन 2030" है, जिसका उद्देश्य है कि आम आदमी में चेतना जगाई जाए — “देखो, तुम्हारा ग्रह विनाश की ओर कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है। तुम अपने बच्चों के लिए एक ऐसा ग्रह छोड़कर जा रहे हो, जहाँ आफ़तें ही आफ़तें होंगी।”

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Bhagavad Gita
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जो कठिनतम है उसे साध लो, बाकी अपने आप साध जाएगा || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Bhagavad Gita
जो कठिनतम है उसे साध लो, बाकी अपने आप साध जाएगा || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
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प्रश्नकर्ता: कृष्ण अध्याय नौ में बताते हैं कि वे सब भूतों में समभाव से व्यक्त हैं, वहीं अध्याय दस में बताते हैं कि जो कुछ भी विभूतियुक्त, कांतियुक्त और शक्ति युक्त है, वो कृष्ण की अभिव्यक्ति है। अध्याय नौ में कृष्ण कहते हैं कि ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद मैं ही हूँ…

वास्तव में जागना तब हुआ जब कृष्ण दिखने लगें || श्रीमद्भगवदगीता पर (2020)
Bhagavad Gita
वास्तव में जागना तब हुआ जब कृष्ण दिखने लगें || श्रीमद्भगवदगीता पर (2020)
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या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने:।।

जो सब जीवों के लिए रात्रि है, वह आत्मसंयमी के जागने का समय है और जो समस्त जीवों के जागने का समय है, वह आत्मनिरीक्षक मुनि के लिए रात्रि है।

—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ६९

प्रश्नकर्ता: जब…

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Why do I restless
This article is related to restlessness.
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Who controls your mood?
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स्मोक टेस्ट हिन्दी लेख 16 अगस्त 2026
हिन्दी स्मोक टेस्ट लेख का संक्षिप्त विवरण।
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जीवन-मरण का ये चक्र चल क्यों रहा है? || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2021)
जन्म-मरण का चक्र क्यों है? इसका अर्थ यही नहीं है कि शिष्य बस इतना ही पूछना चाहता है कि कोई जन्मता क्यों है, कोई मरता क्यों है, चक्र क्यों चल रहा है। वो वास्तव में सबकुछ पूछ रहा है, सबकुछ। अब ये पढ़ने वाले की बुद्धि पर है कि वो इस बात को समझ जाए कि इतना ही नहीं पूछा गया है कि जन्म-मरण का चक्र क्यों है।
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“माँसाहार गरीबों के लिए वरदान है क्योंकि माँसाहार के माध्यम से गरीबों को सस्ता प्रोटीन मिल जाता है।“ १ ग्राम प्रोटीन अगर आप मटन से लेते हैं तो लगते हैं ३ रुपये। उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप अंडे से लेते हैं तो लगते हैं १ रुपय ३० पैसे, उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप चिकन से लेते हैं तो लगता हैं १ रुपया।
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What does love mean?
You must know what is love. How it shapes your life.
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आंसू अगर सच्चे हैं तो भीतर आनंद ही आनंद है
अगर आँसू सच्चे हैं तो उनका संबंध उत्सव और आनंद से है, उनका संबंध जाते हुए दुःख से है। आँसुओं के अर्थ ये नहीं है कि तुम दुखी हो, आँसुओं का अर्थ भी हो सकता है कि तुम आनंदित हो। मुक्त अनुभव कर रहे हो, भीतर की जकड़ को छोड़ने के लिए।
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Who controls your mood?
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शिव-शक्ति
नवरात्र का माहौल है। शक्ति के बारे में कुछ बातें करना प्रासंगिक रहेगा। शिव केंद्र हैं, शिव सत्य हैं। शिव वो हैं जिन तक मन, 'मन' रह कर नहीं पहुंच सकता। शिव को तो रहस्य रहना है सदा। शक्ति, मन है, संसार है। शिव में स्थिरता है, अचलता है।
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राधा-कृष्ण में भी तो प्रेम था, तो आप हमारे प्रेम को सम्मान क्यों नहीं देते?
कृष्ण का खुद ऊँचा होना, कृष्ण के पूरे जीवनवृत्त में, उनकी ज़िंदगी की जो पूरी कहानी है उसमें और श्री कृष्ण की प्रेमकथा में एक सूत्र है जो साझा पिरोया हुआ है। गीता की ऊँचाई, कृष्ण के जीवन की ऊँचाई, और कृष्ण के प्रेम की ऊँचाई तीनों एक हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि कृष्ण बहुत ऊँचे हों और उनका प्रेम निचले तल का हो जाए। ये संभव नहीं है।
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Why do I restless
Hindi article on restlessness by AP
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गुरु के प्रति धन्यवाद कम क्यों हो जाता है? आचार्य प्रशांत (2017)
अब देखिएगा, क्या हो रहा है। कोई कृतज्ञ कब अनुभव करेगा? जब पहले उसकी हालत ख़राब हो और कोई बचाए। आपके भीतर अभी यह इच्छा शेष है कि आप कृतज्ञ अनुभव करती रहें और कृतज्ञता अनुभव करने के लिए ज़रूरी है कि कुछ गड़बड़ हो और फिर उस गड़बड़ से आप उबार ली जाएँ। तो फिर आप कृतज्ञ अनुभव करेंगी कि, अरे, मेरा सौभाग्य कि मुझे किसी ने बचा लिया।
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कर्म और अतीत से मुक्ति कैसे मिले ?
इन सब से मुक्ति का एक ही तरीका है, वो बचो ही नहीं जो मूर्ख जाकर के दुनिया से, जगत से, प्रकृति से कामना पूर्ति की आशा रखता था, वो बचो ही नहीं। उसके अलावा और तुम कितने भी हथकंडे लगा लो, अतीत तो लौट-लौट के बार-बार आएगा और सर पर चढ़ेगा ही चढ़ेगा।
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रक्षा बंधन पर आचार्य प्रशांत का संदेश
\"रक्षाबंधन एक स्मरण हो सकता है कि हम सब मिलकर उस विवेक, उस करुणा की रक्षा करें जो जीवन को जीवन बनाती है। यह पर्व केवल उपहारों का आदान-प्रदान न रह जाए, बल्कि यह एक ऐसा संकल्प बन जाए जिसमें हम एक-दूसरे के आत्मबल और ऊंची चेतना के
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लोकमत न्यूज़ – "स्वतंत्रता दिवस: वास्तविक स्वतंत्रता क्या है
\"स्वतंत्रता कोई उपहार नहीं, बल्कि एक उपलब्धि है जिसे प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं अर्जित करना पड़ता है। राजनीतिक स्वतंत्रता हमें विरासत में मिल सकती है, किंतु मानसिक और आध्यात्मिक स्वतंत्रता के लिए सतत प्रयास
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सनातन धर्म क्या है? सनातनी किसे मानें? (पूर्ण सत्र) || आचार्य प्रशांत, कार्यशाला (2023)
Bhagavad Gita
सनातन धर्म क्या है? सनातनी किसे मानें? (पूर्ण सत्र) || आचार्य प्रशांत, कार्यशाला (2023)
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प्रश्नकर्ता: नमस्कार, सर। आज का सबसे पहला प्रश्न जो है वह सनातन के ऊपर है कि सनातन माने क्या? और ऐसा क्या है जिसको वास्तविक रूप में सनातन कहा जा सकता है?

आचार्य प्रशांत: देखिए, सनातन का अर्थ होता है वो जो काल की सीमाओं से के बाहर का हो।…

शरीर के लिए योग, मन के लिए वेदांत || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Bhagavad Gita
शरीर के लिए योग, मन के लिए वेदांत || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, अर्जुन कहते हैं कृष्ण से कि ‘धृतराष्ट्र पुत्र चाहे मुझे मार भी दें तो भी उनसे लड़ना तो ग़लत ही है।‘ हमारे आम जीवन में भी ऐसे ही चलता रहता है कि हम इमोशनल ब्लैकमेल (भावनाओं से किसी को नियंत्रित करना) करते हैं बहुत बार, या…

समय और संसार क्यों? मर्यादा अनिवार्य क्यों? || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Bhagavad Gita
समय और संसार क्यों? मर्यादा अनिवार्य क्यों? || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
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प्रश्नकर्ता: कुछ दिन पहले आपने एक उदाहरण दिया था, एम एच ३७० का, कि हम जो खोज रहे हैं वो हमें कहीं मिल नहीं रहा इसलिए यूनिवर्स (ब्रह्माण्ड) इतना बड़ा है कि लगातार हम खोजते जा रहे हैं। तो स्पेस (स्थान) की तो बात उससे समझ में आ रही है।…

प्रारब्ध, कर्मफल और आत्मविचार || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Bhagavad Gita
प्रारब्ध, कर्मफल और आत्मविचार || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
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प्रश्नकर्ता: अभी आप कह रहे थे कि श्रीकृष्ण अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं और बाकी सब लोग अपने बारे में बोले जा रहे हैं। तो क्या इसका सम्बन्ध इससे है कि श्रीकृष्ण का कर्मफल और प्रारब्ध कट चुका है लेकिन बाकी सभी का कर्मफल और प्रारब्ध अभी जारी…

एक अध्याय अर्जुन का, सत्रह अध्याय कृष्ण के || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Bhagavad Gita
एक अध्याय अर्जुन का, सत्रह अध्याय कृष्ण के || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
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कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।

धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥

"कुल के नाश से, चले आ रहे कुल के धर्म नष्ट हो जाते हैं और कुलधर्म के नष्ट होने से पाप समस्त कुल को दबा लेता है।"

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ४०

आचार्य प्रशांत तो अर्जुन के…

हमारे जीवन के युद्ध और कृष्ण की समीपता || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Bhagavad Gita
हमारे जीवन के युद्ध और कृष्ण की समीपता || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
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आचार्य प्रशांत: श्रीकृष्ण की निकटता सीखनी है अर्जुन से; अर्जुन के भीतर का कोहरा उधार नहीं ले लेना है। और हमारी हालत ज़बरदस्त है, हमारे पास वो सब कुछ है जो अर्जुन के पास है, बस एक चीज़ नहीं है। हम हर मायने में अर्जुन हैं, अर्जुन का पूरा नर्क…

विचार नहीं, प्रेम || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Bhagavad Gita
विचार नहीं, प्रेम || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
9min
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कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मानिवर्तितुम्। कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥३९॥

"तो कुल क्षय से होने वाले दोष को देख-सुन कर भी हम लोगों को इस पाप से निवृत्त होने का विचार क्यों नहीं करना चाहिए?"

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ३९

आचार्य प्रशांत: इसी आशय के तर्क आगे भी…

हम सब के भीतर एक अर्जुन है || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Bhagavad Gita
हम सब के भीतर एक अर्जुन है || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
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आचार्य प्रशांत: देखिए, बात को समझिए। गीता, सांख्ययोग में, शुरू के कुछ श्लोकों के बाद से भी आरम्भ हो सकती थी। पहला अध्याय तो पूरा ही अर्जुन के विषाद का निरूपण है और दूसरे अध्याय के भी कुछ आरंभिक श्लोकों में अर्जुन की ही व्यथा है। कृष्ण की ज्ञानवर्षा तदोपरांत…

कर्म और कर्म में भेद || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Bhagavad Gita
कर्म और कर्म में भेद || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
8min
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आचार्य प्रशांत: श्रीमद्भगवद्गीता, प्रथम अध्याय, अर्जुन विषाद योग। देखेंगे कि श्रीकृष्ण अर्जुन के सब भावुक, मार्मिक वक्तव्यों को किस प्रकाश में देख रहे हैं। तो अपनी ही मोहजनित पीड़ा को आगे अभिव्यक्त करते हुए अर्जुन कहते हैं:

यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतस: |

कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥३८॥

यद्यपि ये…

हमारे जीवन में कब उतरती है गीता? || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Bhagavad Gita
हमारे जीवन में कब उतरती है गीता? || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
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प्रश्नकर्ता: आपकी जो बाकी शिक्षाएँ हैं वो भी मुझे बिलकुल गीता से मिलती हुई लग रही हैं। आप जैसे पहले कहते थे कि हृदय में शिव और भुजाओं में शक्ति। तो अभी आप बोले कि हृदय कोमल होना चाहिए और बलिष्ठ भुजाएँ होनी चाहिए तो बिलकुल वो बातें एक जैसी…

कौन है गीता का अधिकारी?  || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Bhagavad Gita
कौन है गीता का अधिकारी? || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
20min
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तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्। कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ॥27॥

अर्जुन उवाच।

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ॥28॥

वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥29॥

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चै व परिदह्यते।

न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥30॥

“जब कुन्तिपुत्र अर्जुन ने अपने बंधु बान्धवों को वहाँ…

कब घटित होती है गीता?  || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Bhagavad Gita
कब घटित होती है गीता? || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
12min
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यावदेतानिरीक्षेऽहं योद्धकामानवस्थितान्।

कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे ॥22॥

“मैं इन सब युद्ध करने की कामनाओं से अवस्थित योद्धाओं को देखूँ कि किन वीरों के साथ मुझे युद्ध करना होगा।”

~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोक २२, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग

आचार्य प्रशांत: क्या जानते नहीं हैं अर्जुन कि किनके साथ युद्ध करना होगा?…

गीता में कृष्ण के अनेकों नाम || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Bhagavad Gita
गीता में कृष्ण के अनेकों नाम || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
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आचार्य प्रशांत: हम सबके भीतर, हम कितना भी छुपा लें, पर होता है कोई जो सत्य को छोड़ नहीं सकता। हम स्वयं को कितना भी भ्रम में रख लें, एक तल पर सच्चाई हम सबको पता होती है। वास्तव में अगर सच्चाई पता ना हो तो स्वयं को भ्रम में…

सही जिज्ञासा क्या? सही माँग कैसी?  || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Bhagavad Gita
सही जिज्ञासा क्या? सही माँग कैसी? || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। मैं ईशावास्य उपनिषद् पढ़ रहा था जिसमें नौवाँ, दसवाँ, ग्यारहवाँ श्लोक था विद्या और अविद्या पर। तो उसमें यह लिखा था कि अविद्या इज़ ऑब्जेक्टिव नॉलेज एंड विद्या इज़ अविद्या विद सेल्फ नॉलेज (अविद्या भौतिक ज्ञान है और विद्या भौतिक ज्ञान के साथ-साथ आत्म-ज्ञान है)।

तो…

गीता उपनिषदों से ज़्यादा उपयोगी! || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Bhagavad Gita
गीता उपनिषदों से ज़्यादा उपयोगी! || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
3min
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जैसे मैं पहले किसी सत्संग में जाती थी, वहाँ पर कुछ बातें बतायी जाती थीं। अष्टावक्र गीता पर आपने बताया कि आज यहाँ पर उसकी उपयोगिता नहीं है। और अष्टावक्र जी ने जैसे बताया है कि ब्रह्म-ही-ब्रह्म है, आत्मा-ही-आत्मा है। तो अभी कुछ दिन पहले मैं अपने…

कृष्ण ही अंतिम उपाय || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Bhagavad Gita
कृष्ण ही अंतिम उपाय || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
8min
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आचार्य प्रशांत: इन सैकड़ों श्लोकों की यात्रा करेंगे हम। इस यात्रा में ये सोच कर आगे नहीं बढ़िएगा कि आप पहले से कुछ भी जानते हैं। हर जगह रुकिए और पूछिए — ये क्या हो रहा है? उसको आदत-सा बना लीजिए, अभ्यास करिए।

जो अभ्यास आपका बाहर की तरफ़ रहता…

अपने ही विरुद्ध रण है गीता || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Bhagavad Gita
अपने ही विरुद्ध रण है गीता || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
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आचार्य प्रशांत: पहले ही अध्याय में, अच्छे से देखिए, दो हैं जो परेशान हैं। कौन? रणक्षेत्र में दो हैं जिनकी चिंता पहले ही अध्याय में हमारे सामने आ जाती है — दुर्योधन और अर्जुन।

इस बात को अच्छे से पकड़िए। चिन्ताग्रस्त होना बुरा नहीं है; दुर्योधन वाली चिंता रखना बुरा…

कृष्ण को चुनना ही जीत है || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Bhagavad Gita
कृष्ण को चुनना ही जीत है || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
19min
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सञ्जय उवाच।

दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा। आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रतीत् ॥२॥

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्। व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥३॥

अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि । युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥४॥

धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् । पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः॥५॥

युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान् । सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥६॥

अस्माकं तु…

प्रश्न असली हो तो ही लाभकारी || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
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प्रश्न असली हो तो ही लाभकारी || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। बहुत बहुत धन्यवाद। आपके कोर्सेज़ को मैं यूट्यूब पर भी सुने हैं। कुछ मैंने ऑनलाइन सत्र भी अटेंड किए है।

मेरा जो प्रश्न है वो ये है कि मेरा मोटिवेशन लेवल बहुत फ्ल्कचुएट(ऊपर-नीचे) होता है। दिन में ही कई बार बहुत डिप (नीचे) में भी…

गीता पढ़ी, गर्लफ़्रेंड चिढ़ी? || नीम लड्डू
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गीता पढ़ी, गर्लफ़्रेंड चिढ़ी? || नीम लड्डू
2min
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मैं तो ऐसा भी सुन चुका हूँ कि, ”सर मेरी गर्लफ़्रेंड मुझे छोड़ कर चली गई।“ क्यों? “वो मैं हफ़्ते भर से रात को गीता के श्लोक फॉरवर्ड किया करता था व्हाट्सएप पर, वो चाहती थी कि मैं कुछ और भेजूँ उसको रात में होटम-हॉट। मैंने भेज दिए गीता के…

जब श्रीमद्भगवद्गीता ही पूर्ण है तो उत्तर गीता की ज़रूरत क्यों पड़ी? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
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जब श्रीमद्भगवद्गीता ही पूर्ण है तो उत्तर गीता की ज़रूरत क्यों पड़ी? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। कई बार ऐसा होता है कि विरोधी पक्ष के लोग विनीत भाव से मदद वग़ैरह माँगने आ जाते हैं, जैसे दुर्योधन ने शल्य का सहयोग माँगा, दुर्योधन ने बलराम से गदा सीखने का निवेदन किया और दुर्योधन ने श्रीकृष्ण से उनकी नारायणी सेना माँगी। ऐसी स्थितियों…

अपना कर्मफल कृष्ण को अर्पित करने का व्यवहारिक अर्थ क्या है? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
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अपना कर्मफल कृष्ण को अर्पित करने का व्यवहारिक अर्थ क्या है? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
24min
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अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्। अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय।।

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव। मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि।।

यदि तू मन को मुझमें अचल स्थापित करने में समर्थ नहीं है तो हे अर्जुन! अभ्यास योग के द्वारा मुझमें प्राप्त होने की इच्छा कर।

और अगर तू इस अभ्यास में भी…

शास्त्रविहित कर्म क्या? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
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शास्त्रविहित कर्म क्या? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
23min
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कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन। सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः।।

हे अर्जुन! जो शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है—इसी भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है—वही सात्विक त्याग माना गया है।

—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १८, श्लोक९

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मैं एक शिक्षक हूँ। मुझे विद्यालय…

नियत कर्म क्या है? गृहस्थी अध्यात्म में कब बाधा बनती है? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
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नियत कर्म क्या है? गृहस्थी अध्यात्म में कब बाधा बनती है? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
5min
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नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते। मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः।।

नियत कर्म का त्याग उचित नहीं है। मोह के कारण नियत कर्म का त्याग ही तामस कहा गया है।

—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १८, श्लोक ७

आचार्य प्रशांत: अभी हम तामस के बारे में ही बात कर रहे थे। जो बातें अभी तक करीं,…

मैडिटेशन कब और किसके लिए ज़रूरी है? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
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मैडिटेशन कब और किसके लिए ज़रूरी है? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
7min
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शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः। नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्।।

तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः। उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये।।

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः। संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्।।

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः। मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः।।

शुद्ध भूमि में, जिसके ऊपर क्रमशः कृशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत…

कृष्ण ने किन्हें बताया गीता सुनने का अधिकारी? ऐसा भेद क्यों? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Bhagavad Gita
कृष्ण ने किन्हें बताया गीता सुनने का अधिकारी? ऐसा भेद क्यों? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
11min
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विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।।

वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चांडाल में भी समदर्शी ही होते हैं।

—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ५, श्लोक १८

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति।।

तुझे यह गीतारूप रहस्यमय…

हमारे लिए यज्ञ का अर्थ क्या? जीवन में चमत्कार कब होते हैं? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Bhagavad Gita
हमारे लिए यज्ञ का अर्थ क्या? जीवन में चमत्कार कब होते हैं? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
11min
36reads

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः। तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः।।

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः। भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्।।

यज्ञ द्वारा देवता तुम लोगों को बिना माँगे ही इच्छित भोग देते रहेंगे। देवताओं द्वारा दिए गए भोगों को जो पुरुष उनको बिना दिए स्वयं भोगे, वह चोर ही…

शास्त्रसम्मत तप और मनःकल्पित तप क्या हैं? दान कब प्रेम बन जाता है? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Bhagavad Gita
शास्त्रसम्मत तप और मनःकल्पित तप क्या हैं? दान कब प्रेम बन जाता है? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
25min
15reads

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः। दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः।।

जो मनुष्य शास्त्र विधि से रहित केवल मन:कल्पित घोर तप को तपते हैं, वे दम्भ और अहंकार से युक्त एवं कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से भी युक्त हैं।

—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १७, श्लोक ५

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमन। तप किसे कहते…

श्रद्धा के चार प्रकार: तामसिक, राजसिक, सात्विक और वास्तविक || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
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श्रद्धा के चार प्रकार: तामसिक, राजसिक, सात्विक और वास्तविक || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
12min
17reads

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।।

हे भारत! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अंतःकरण के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धा वाला है, वह स्वयं भी वही है।

—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १७, श्लोक ३

प्रश्नकर्ता: चरण स्पर्श, आचार्य जी।…

प्रकृति के तीन गुणों का वास्तविक अर्थ क्या है? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Bhagavad Gita
प्रकृति के तीन गुणों का वास्तविक अर्थ क्या है? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
24min
31reads

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन। निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्।।

हे अर्जुन! वेद तीनों गुणों (सत, रज और तम) के कार्यरूप समस्त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन करने वाले हैं; इसलिए तू उन भोगों एवं उनके साधनों में आसक्तिहीन, हर्ष-शोकादि द्वंदों से रहित, नित्यवस्तु परमात्मा में स्थित, योग-क्षेम को न चाहने…

मान-अपमान हमारे लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Bhagavad Gita
मान-अपमान हमारे लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
20min
33reads

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः। शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः।।

सरदी-गरमी और सुख-दु:खादि में तथा मान और अपमान में जिसके अंतःकरण की वृत्तियाँ भलीभाँति शांत हैं, ऐसे स्वाधीन आत्मा वाले पुरुष के ज्ञान में सच्चिदानंदघन परमात्मा सम्यक प्रकार से स्थित हैं अर्थात् उसके ज्ञान में परमात्मा के सिवा अन्य कुछ है ही नहीं।…

अर्जुन के समक्ष तो युद्ध था,  हमारे लिए स्वधर्म क्या? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Bhagavad Gita
अर्जुन के समक्ष तो युद्ध था, हमारे लिए स्वधर्म क्या? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
34min
16reads

श्रीभगवानुवाच अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः। स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः।।

श्रीभगवान् बोले – जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह सन्यासी तथा योगी है और केवल अग्नि अथवा क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी नहीं है।

—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ६,…

सत्य की फ़िक्र छोड़ो, तुम बस ग़लत को ठुकराते चलो || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
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सत्य की फ़िक्र छोड़ो, तुम बस ग़लत को ठुकराते चलो || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
12min
50reads

आचार्य प्रशांत: अर्जुन का द्वंद सामने आता है इन शब्दों में, कह रहे हैं अर्जुन –

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयोयद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः। यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः।।

हम नहीं जानते कि हमारे लिए युद्ध करना और न करना – इन दोनों में से क्या श्रेष्ठ है,…

काम, क्रोध, और लोभ - नरक के द्वार || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Bhagavad Gita
काम, क्रोध, और लोभ - नरक के द्वार || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
2min
3reads

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्।।

काम, क्रोध और लोभ – ये तीन प्रकार के नरक के द्वार आत्मा का नाश करने वाले अर्थात् उसको अधोगति में ले जाने वाले हैं। अतएव इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १६, श्लोक २१

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैंने सुना…

संसार में चैन पाना असंभव क्यों है? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Bhagavad Gita
संसार में चैन पाना असंभव क्यों है? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
12min
15reads

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्। अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्।।

वे आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य कहा करते हैं कि जगत् आश्रयरहित, सर्वथा असत्य और बिना ईश्वर के, अपने-आप केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न है, अतएव केवल काम ही इसका कारण है। इसके सिवा और क्या है?

—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १६, श्लोक ८

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य…

दैवीय गुण और आसुरी गुण || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Bhagavad Gita
दैवीय गुण और आसुरी गुण || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
11min
14reads

दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता। मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव।।

दैवी संपदा मुक्ति के लिए और आसुरी संपदा बाँधने के लिए मानी गई है। इसलिए हे अर्जुन! तू शोक मत कर, क्योंकि तू दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुआ है।

—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १६, श्लोक ५

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। श्रीकृष्ण का…

बुद्धि नहीं, बुद्धि का संचालक महत्वपूर्ण है || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Bhagavad Gita
बुद्धि नहीं, बुद्धि का संचालक महत्वपूर्ण है || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
36min
8reads

प्रश्नकर्ता: बुद्धि परा प्रकृति है। तो अब यह कैसे जानें कि इस समय जो हम सुन या समझ रहे हैं तो मेरी बुद्धि किस दिशा में है? इस समय स्थिति ऐसी है कि डर भी लग रहा है, आगे कुछ ज़्यादा समझ नहीं आ रहा है और बेचैनी भी रहती…

कृष्ण के अलावा कुछ और माँगोगे तो फँस जाओगे || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Bhagavad Gita
कृष्ण के अलावा कुछ और माँगोगे तो फँस जाओगे || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
12min
8reads

यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रता:। भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्।।

देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितृों को पूजने वाले पितृों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मेरा पूजन करने वाले भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं। इसीलिए मेरे…

क्या गीता तब भी उतनी ही प्रचलित होती यदि अर्जुन युद्ध हार जाता || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Bhagavad Gita
क्या गीता तब भी उतनी ही प्रचलित होती यदि अर्जुन युद्ध हार जाता || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
37min
10reads

प्रश्नकर्ता: गीता में अर्जुन किस वजह से युद्ध जीते? और अगर हारते तो भी क्या गीता का महत्त्व उतना ही रहता जितना आज है?

आचार्य प्रशांत: कृष्ण अर्जुन को कभी भी जीतने का भरोसा नहीं दिला रहे हैं, बल्कि कृष्ण तो अर्जुन को जीत और हार का विचार ही न…

संसार की सारी उपलब्धि कृष्ण के बिना व्यर्थ है || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Bhagavad Gita
संसार की सारी उपलब्धि कृष्ण के बिना व्यर्थ है || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
8min
8reads

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापायज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्।।

तीनों वेदों में विधान किए हुए सकाम कर्मों को करने वाले, सोमरस को पीने वाले, पापरहित पुरुष मुझको यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग की प्राप्ति चाहते हैं, वे पुरुष अपने पुण्यों के फलरूप स्वर्गलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में…

ब्रह्मविद्या को सबसे कठिन विद्या क्यों कहा जाता है? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Bhagavad Gita
ब्रह्मविद्या को सबसे कठिन विद्या क्यों कहा जाता है? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
23min
24reads

आचार्य प्रशांत: छठा, सातवाँ और बाईसवाँ श्लोक उद्धृत कर रहीं हैं। कह रही हैं कि इंद्रियाँ, विषय, मन, बुद्धि, अहंकार, सुख-दु:ख, चेतना, धृति, ये सब क्षेत्र हैं और इनका दृष्टा है पुरुष। लेकिन यह पुरुष प्रकृतिस्थ है इसीलिए यह प्रकृति का भोग करता है, जन्म लेता है और मरता है।…

श्रीकृष्ण ने सगुण को निर्गुण से और भक्ति को ज्ञान से श्रेष्ठ क्यों कहा? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Bhagavad Gita
श्रीकृष्ण ने सगुण को निर्गुण से और भक्ति को ज्ञान से श्रेष्ठ क्यों कहा? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
11min
39reads

क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्। अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते।।

उन सच्चिदानंदघन निराकार ब्रह्म में आसक्त चित्तवाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है; क्योंकि देहाभिमानियों के द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है।

—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १२, श्लोक ५

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कृपया 'देहाभिमान' शब्द का अर्थ बताइए। लगता तो यह है कि साकार…

सुखों को छोड़ो, बंधनों को तोड़ों || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Bhagavad Gita
सुखों को छोड़ो, बंधनों को तोड़ों || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
52min
23reads

श्रीभगवानुवाच मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते। श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः।।

श्रीभगवान बोले – मुझमें मन को एकाग्र करके निरंतर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझ सगुणरूप परमेश्वर को भजते हैं, वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं।

—…

संसार है मोतियों की माला, और कृष्णत्व है उसमें छुपा धागा || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Bhagavad Gita
संसार है मोतियों की माला, और कृष्णत्व है उसमें छुपा धागा || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
43min
7reads

श्रीभगवानुवाच मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्। तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यंयन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्।।

श्रीभगवान बोले – हे अर्जुन! अनुग्रहपूर्वक मैंने अपनी योगशक्ति के प्रभाव से यह मेरा परम तेजोमय, सबका आदि और सीमारहित विराटरूप तुझको दिखलाया है, जिसे तेरे अतिरिक्त दूसरे किसी ने पहले नहीं देखा था।

—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ११, श्लोक…

तुम मुक्ति से नहीं, मुक्ति की कल्पना से डरते हो || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Bhagavad Gita
तुम मुक्ति से नहीं, मुक्ति की कल्पना से डरते हो || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
22min
12reads

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति। अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि।।

यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु। एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्।।

आपके प्रभाव को न जानते हुए, आप मेरे सखा हैं ऐसा सोचकर प्रेम से अथवा प्रमाद से भी मैंने 'हे कृष्ण!', 'हे यादव!', 'हे सखे!' इस तरह जो…

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