श्रद्धा के चार प्रकार: तामसिक, राजसिक, सात्विक और वास्तविक || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।।
हे भारत! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अंतःकरण के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धा वाला है, वह स्वयं भी वही है।
—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १७, श्लोक ३
प्रश्नकर्ता: चरण स्पर्श, आचार्य जी। इस श्लोक में श्रीकृष्ण श्रद्धा की बात कर रहे हैं, कह रहे हैं कि श्रद्धा भी सात्विक, तामसिक, राजसिक होती है। हम अपनी श्रद्धा के रूप को कैसे समझें? कैसे जानें कि हमारी श्रद्धा कैसी है और फिर इसका विकास कैसे करें? कृपया समझाएँ।
आचार्य प्रशांत: श्रद्धा वास्तव ने प्रकृति के गुणों के अधीन होती नहीं। पर यही तो श्रीकृष्ण की खूबी है, उनका वैशिष्ट्य है कि ऐसे समझाया है उन्होंने कि बात सबको समझ में आ जाए। और इसीलिए गीता दुनिया के सबसे ज़्यादा प्रभावी आध्यात्मिक ग्रंथों में से है।
तो तीन प्रकार की श्रद्धा की आपने बात करी। मैं इन तीनों की बात करूँगा, फिर एक चौथी की भी बात करूँगा।
अहम् प्रकृति का ही एक रूप है। उसे रूप कह लो, हिस्सा कह लो, अंश कह लो, अवयव कह लो, जो कहना चाहो। और जहाँ अहम् है, वहाँ कोई मान्यता है; जहाँ मान्यता है, वहाँ निष्ठा है। उसी निष्ठा को कई बार आप आस्था कह देते हैं। ‘आस्था’ शब्द समझते हैं? वो 'स्थ', स्थापना से जुड़ा हुआ, स्थान से जुड़ा हुआ है। जहाँ जाकर बैठ गए हो, उससे जुड़ा हुआ है। अहम् को कहीं-न-कहीं जाकर बैठना होता है, किसी-न-किसी से जुड़ना होता है, किसी-न-किसी जगह पर स्थापित हो जाना होता है। वही आस्था है, वही निष्ठा है।



