अर्जुन के समक्ष तो युद्ध था, हमारे लिए स्वधर्म क्या? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)

श्रीभगवानुवाच अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः। स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः।।
श्रीभगवान् बोले – जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह सन्यासी तथा योगी है और केवल अग्नि अथवा क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी नहीं है।
—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ६, श्लोक १
प्रश्नकर्ता: नमस्कार, आचार्य जी। उपरोक्त श्लोक में श्रीकृष्ण ने करने योग्य कर्म की बात कही है। इसी तरह अध्याय ३ के श्लोक ३५ में कहा है कि दूसरे के कर्तव्य का अनुसरण करने से श्रेष्ठ है अपने स्वधर्म का पालन करते हुए मर जाना।
करने योग्य कर्म या स्वधर्म क्या है? क्या इसका निर्धारण व्यक्तिगत होता है?
आचार्य प्रशांत: सुंदर प्रश्न है। पहली बात, कहा गया है कि योगी वो है जो कर्मफल का आश्रय लिए बिना करने योग्य कर्म करता है। उसी बात को और समझाते हुए कहा कि अग्नि का त्याग कर दो या क्रियाओं का त्याग कर दो तो इतने भर से योगी नहीं हो जाओगे।
अग्नि या क्रियाओं का त्याग करने से क्या अर्थ है? लोग हुआ करते थे, मान्यताएँ होती थीं, समुदाय होते थे जो अग्नि का त्याग कर देते थे। इस अर्थ में कि अपना खाना-पीना नहीं बनाएँगे, भिक्षु हो जाएँगे। इसके अतिरिक्त अग्नि के त्याग करने का अर्थ राजसिकता का त्याग करना भी होता था। भीतर जो आंतरिक अग्नि रहती है, अब उसमें स्वयं को पचने नहीं देंगे।



