कृष्ण ने किन्हें बताया गीता सुनने का अधिकारी? ऐसा भेद क्यों? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)

विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।।
वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चांडाल में भी समदर्शी ही होते हैं।
—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ५, श्लोक १८
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति।।
तुझे यह गीतारूप रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तपरहित मनुष्य से कहना चाहिए, न भक्तिरहित से और न बिना सुनने की इच्छा वाले से कहना चाहिए; तथा जो मुझमें दोषदृष्टि रखता है, उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहिए।
—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १८, श्लोक ६७
प्रश्नकर्ता: पहला श्लोक कहता है, “ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते, चांडाल में भी समदर्शी ही होते हैं।” तो जो पहला श्लोक है, उसमें प्रतीत हो रहा है कि भेद को मिटा रहा है; वह कह रहा है कि चाहे विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण हो और चाहे गाय, हाथी, कुत्ता, चांडाल कुछ हो, इन सबके प्रति समदर्शी ही रहते हैं ज्ञानीजन, जैसे भेद मिटाए जा रहे हों।



