सुखों को छोड़ो, बंधनों को तोड़ों || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)

श्रीभगवानुवाच मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते। श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः।।
श्रीभगवान बोले – मुझमें मन को एकाग्र करके निरंतर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझ सगुणरूप परमेश्वर को भजते हैं, वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं।
— श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १२, श्लोक २
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अध्याय बारह, श्लोक दो में जो सगुणरूप कृष्ण को श्रद्धायुक्त होकर भजने वाले को अति उत्तम कहा गया है, तो क्या षड् रिपुओं को ही जीवन से बाहर करना कृष्ण को भजना है? अकर्ता कर्म तथा बिना फल-आकांक्षा के सम्यक कर्म भी भजने के अंग हैं? मैं इसमें भ्रम में हूँ। कृपया स्पष्ट करें।
आचार्य प्रशांत: षड् रिपुओं को जीवन से बाहर करना साधना का एक अंतरिम उद्देश्य है और उसके लिए निष्काम कर्म साधन बनता है। इनमें कोई अलगाव, कोई दूरी नहीं है। ये सब एक दूसरे से जुडी हुई चीज़ें हैं, कोई एक दूसरे से विरुद्ध नहीं है।
निष्काम योगी जो है, उसके जीवन से षड् रिपु अपने-आप हटेंगे। दूसरे सिरे से, अगर कोई कहे कि मुझे अपने जीवन से षड् रिपुओं को हटाना है तो उसे निष्काम कर्म का सहारा लेना ही पड़ेगा। तो एक को अगर आप उद्देश्य बनाएँगे तो दूसरा साधन हो जाएगा, दूसरे को साधन बनाएँगे तो पहला उद्देश्य हो जाएगा।



