

सुबह उठते ही, "जानू उठ गई? जानू टट्टी कर ली, ब्रश कर लिया? नाश्ते में क्या खा रही हो? क्यों खा रही हो? खा ही क्यों रही हो, पी क्यों नहीं रही? जानू पैरों से चल रही हो? सर के बल क्यों नहीं चल रही?"
अभी हॉट है मामला भई!…

सब प्रेमियों की निशानी है – दो-दो, चार-चार घण्टे लगे हुए हैं फ़ोन पर। और फ़ोन पर नहीं तो आमने-सामने बैठकर एक-दूसरे का भेजा चबा रहे हैं। और मजाल है कि उधर से कचरा फेंका जा रहा है और तुम इधर से फ़ोन काट दो। बेवफ़ा कहलाओगे। कितना मज़ा आता…

तुम अभी नये-नये किसी नौकरी में लगे हो और जहाँ तुम्हारी कोई हैसियत नहीं, औकात नहीं, आमदनी नहीं, तुमने अभी कुछ सीखा नहीं, कोई तरक्की नहीं करी, कोई पहचान नहीं बनायी, ना ज्ञान अर्जित किया। ना तुम अभी सामाजिक दृष्टि से कुछ हो, ना आंतरिक, आध्यात्मिक दृष्टि से कुछ हो…

प्रश्नकर्ता: ज़िंदगी में कोई प्रिय है, जिसे हम बहुत ज़्यादा चाहते हैं, उसे हम खो देते हैं – तो वो अच्छा कैसे हो सकता है फिर? आचार्य प्रशांत: वो आपको बताएगा कि आपको जो दुःख हो रहा है, वो आपके प्रिय के साथ आपका जो रिश्ता था, उसकी अपूर्णता का…

अध्यात्म यह नहीं कहता कि तुम स्त्री को त्याग ही दो। अध्यात्म इस बात की अक्ल देता है कि कैसी स्त्री की संगति करनी है।
किसने कह दिया कि अध्यात्म ने पाबंदी लगा रखी है स्त्री सहवास पर? कृष्ण को नहीं देखा? राम को नहीं देखा? इतने ऋषि-मुनि थे, इनकी…

आपका साथी कैसा है, वो आपको नहीं पता चलेगा जब तक वह आपके साथ है। उसको जानना चाहते हैं तो उस दिन जानिएगा जिस दिन वह आपको छोड़ता है। फिर देखिएगा उसका चेहरा!
जब किसी का आपसे कोई स्वार्थ ना बचे और फिर भी वह आप के प्रति सद्भावना रखे,…

आचार्य प्रशांत: आपका साथी कैसा है, वो आपको नहीं पता चलेगा जब तक वह आपके साथ है। उसको जानना चाहते हैं तो उस दिन जानिएगा जिस दिन वह आपको छोड़ता है। फिर देखिएगा उसका चेहरा!
जब किसी का आपसे कोई स्वार्थ ना बचे और फिर भी वह आप के प्रति…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम। कुछ चीज़ें हमें साफ़-साफ़ पता चलती हैं कि हम ग़लत कर रहे हैं। लेकिन कुछ ऐसी चीज़ें होती हैं जो व्यर्थ होती हैं लेकिन जब हम उस काम में मशगूल रहते हैं तो पता नहीं चलता कि व्यर्थ है, जैसे हम हँसी-मज़ाक और गपशप करते रहते…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं लोगों से बहुत जल्दी आसक्त हो जाती हूँ। पहले पिता से बहुत आसक्ति थी, फिर पति से, और अब बेटे से आसक्त हूँ, ‘हुक ’ (अंकुड़ा) की तरह फँस जाती हूँ।
पहले मुझे लगता था कि ग़लती दूसरों की है, लेकिन आपको सुना तो जाना…

आचार्य प्रशांत: प्रेम और कारोबार के नियम अलग-अलग होते हैं। कारोबार का नियम है कि अगर लिया है तो लौटाना पड़ेगा, और प्रेम का नियम होता है कि मिला हो चाहे न मिला हो, बाँटना पड़ेगा। प्रेम यह देखता ही नहीं मिला कितना और कारोबार अगर यह न देखे कि…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्यार क्यों नहीं है रिश्तों में आजकल?
आचार्य प्रशांत: किसके?
प्र: सबके।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, पिता के पास रहूँ या उनसे दूर रहने लग जाऊँ, समझ में नहीं आता। कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: नहीं बाहर चली जाओ, उन्हें भी साथ ले जाओ; उन बेचारों को भी तो मन करता होगा बाहर जाने का।
प्र: मेरे कहने का आशय है कि मैं…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कृपया मोह को थोड़ा और समझाइए। मोह एक वादा लेकर आता है कि "तुम्हारे अकेलेपन को दूर कर दूँगा।" कुछ पल का साथ भी कम-से-कम उस पल के लिए अकेलापन मिटा देता है। ये और बात है कि जब वो व्यक्ति या वस्तु नहीं रहती, तो अकेलापन…

प्रश्न: आचार्य जी, कुछ दिन पहले घर में एक दुर्घटना हुई। घर के बगल की बिल्डिंग में काम चल रहा था। अचानक उसकी एक दीवार मेरे घर की एक दीवार पर गिरी। संयोगवश मेरी पत्नी उस दीवार के पास थीं और उन्हें काफ़ी चोट आई। उन्हें तुरंत अस्पताल में…

प्रश्न: आचार्य जी, ज़िंदगी में ख़ुद खूब अनुभव करके निराशा भी ले ली, अपने आसपास के लोगों की ज़िंदगी में भी शादी और कामवासना को एक परेशानी की तरह ही पाया। स्वयं का भी अनुभव हो गया, दूसरों की ज़िंदगियाँ भी देख लीं, फिर भी मेरे मन में लड़कियों, महिलाओं…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रेम में इतना दर्द क्यों होता है? इश्क़ में इतना दर्द क्यों मिलता है? यह भ्रमवश उपजी आशिक़ी किस तरह बर्बाद कर रही है?
आचार्य प्रशांत: जिसको तुम इश्क़ कहते हो, वो और क्या होता है? किसी की खुशबू, किसी की अदाएँ, किसी की बालियाँ – यही…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अकेले रहना बेहतर है, या दूसरों के साथ?
आचार्य प्रशांत: दोनों में कुछ पता चलता है। जब किसी के साथ हो, तो तुम्हें पता चलता है कि तुम्हारे मन की क्या दशा होती है जब कोई सामने आता है। परख हो जाती है न। नहीं तो तुम…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं ये जानना चाह रहा था, कि हम अगर अपने जीवन में किसी की मदद करना चाहते हैं और हमें लगता है कि उसको हमेशा मदद की ज़रूरत है, लेकिन बार-बार मदद करने पर ऐसा महसूस होता है कि ये एक ज़िम्मेदारी बन गयी है। फिर आगे…

प्रश्न: आचार्य जी, बचपन से ही अकेला रहने की आदत है। अकेला रहना अच्छा लगता है, समूह में अच्छा नहीं लगता। सामाजिक रीति-रिवाज में शामिल होना अच्छा नहीं लगता। ऑफिस में अगर ग्रुप-डिस्कशन हो रहा होता है, अच्छा नहीं लगता। ये क्या है?
आचार्य प्रशांत जी: इतने बड़े समूह के…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, लोग मिलते हैं, फिर उन्हीं से रिश्ते बन जाते हैं। क्या यह भाग्य है?
आचार्य प्रशांत: ये भाग्य नहीं है। मन तो पचास जगह रिश्ता बनाता है। वो सब रिश्ते मन के खेल हैं, मन की प्यास हैं; समय के संयोग हैं। डेस्टिनी (क़िस्मत) होती है वो…

*प्रश्न: क्या बदलाव सही है और क्या गलत?*
आचार्य प्रशांत: सही गलत का सवाल नहीं उठता, बदलाव है, जो हो ही उसपर सही गलत का ठप्पा नहीं लगाना चाहिए, बदलाव जीवन है, हम सब समय में जीते हैं, और समय का अर्थ ही है बदलना।

प्रश्नकर्ता: जिस स्थिति में दो लोग आपस में जुड़े हों, और दोनों में बहुत ज़्यादा मतभेद हो, तो वो स्थिति क्या साथ ही रहने में सुधर सकती है?
आचार्य प्रशांत: नहीं देखिए, ये कोई नियम नहीं हो सकता है, ये बाध्यता नहीं हो सकती। बात सिर्फ़ इतनी सी है कि…

रिश्ते में अगर आज़ादी नहीं तो रिश्ता झूठा है|
आचार्य प्रशांत: मालिक मने क्या?
श्रोता : अधिकार जमाने वाला।

आचार्य प्रशांत: तुम जो कुछ भी कर रहे हो, देखना उसको कि, "ये मैं सतह पर कर रहा हूँ या स्रोत पर कर रहा हूँ?” सतही काम क्या होता है?
श्रोतागण: जो बाहर से आ रहा हो।
आचार्य:

वक्ता: देखिये, रमन महर्षि थे। तो लोग पूछते थे कि-“आप यहाँ पड़े रहते हो मंदिर में, बाहर निकल कर के कुछ करते क्यों नहीं?” और वो जिस समय पर थे, पिछली सदी का जो पूर्वार्थ था, सन से 1910 से 1940। 1950 तक जीए थे। अब उस समय पर भारत…

प्रश्न: मैं क्या पूछूँ समझ में नहीं आ रहा है पता नहीं क्यूँ।
वक्ता: दसवीं कक्षा की गणित की चल रही हो क्लास और उसमें बढ़िया पढ़ाया जा रहा है टॉपिक, क्वाड्रैटिक इक़ुएशन मान लो। वहाँ बिठा दो पाँचवी के बच्चे को, जिसको अभी लीनियर इक़ुएशन ही नहीं पता, तो…

वक्ता: एक कॉलेज में था और सभी छात्रों से बात कर रहा था; काफ़ी चिंतित लग रहे थे सब। अभी-अभी रिज़ल्ट निकला है, जनवरी की बात थी, बैक आ गयीं हैं। अब संवाद चल रहा है और मुँह लटका के बैठे हैं तो मैंने कहा कि ऐसे नहीं बात करुँगा…

प्रश्नकर्ता: क्या मेरा हल्का होना सामने वाले को पता चलेगा?
आचार्य प्रशांत: यही बोझ है।
प्र: सर, मैं इसलिए पूछ रही हूँ…

प्रश्न: क्या सम्बन्ध इनके अलावा भी होते हैं – शरीर, विचार, गुरु?
वक्ता: अभी मैं अगर बताऊँगा भी, तो वो वैचारिक ही हो जाएगा ना। सोचिये, उसके बारे में आपको जानकारी मिल गयी, वो जानकारी क्या है? विचार है। तो ये पता भी चल गया कि, हाँ इसके अलावा भी…

चले गए सो ना मिले, किसको पूछूँ बात। मात – पिता सुत बान्धवा, झूठा सब संघात।। ~ संत कबीर
आचार्य प्रशांत: जो कुछ भी जन्म से आया है, जो कुछ भी जीवन में मिला है, वो तो चला ही जाना है। इनके आने और जाने को अगर परख लिया, तब…

प्रश्न: सर, माता-पिता का प्रेम निःस्वार्थ होता है पर उनकी बात हर बार ठीक नहीं लगती। क्या करें?
वक्ता: सवाल इस बात का बिल्कुल भी नहीं है कि हम सहमत होना चाहते हैं या नहीं। है ना? बात करीब-करीब वैज्ञानिक है। जैसे विज्ञान होती है कि उसमें तुम्हारा मत या…

वक्ता: बात सुनने में थोड़ी अजीब लगेगी पर ध्यान दोगे तभी समझ आएगी। ध्यान नहीं दोगे तो कहोगे कि सर आप बड़ी विपरित बात कर रहे हैं। जिसने अपने अकेलेपन में खुश रहना सीख लिया सिर्फ वही पार्टी में मज़े मार सकता है। जो अकेले भी खुश है, सिर्फ वही…

श्रोता: सर, हम पर इतना निवेश किया जा रहा है, तो हम से कुछ परिणाम की भी उम्मीद की जाएगी।
वक्ता: ये तो मात्र एक व्यापार है।
श्रोता: सर, ये तो जीवन है।

होर की मँगना दित्ता सब कुछ, सजदा करां मैं तेरा, वाहे गुरु
कैन्दी नि अंखिया, कैन्दे ने आंसू, शुक्राना तेरा, वाहे गुरु।
लफ़्ज़ों में कैसे कोई बताये, चर्चा जो तेरी हो, दिन बीत जाए

श्रोता: सम्बन्धों को कैसे बनाए रखें?
वक्ता: पहले यह समझना पड़ेगा ‘सम्बन्ध’ माने क्या ? यह शब्द जब हमारे दिमाग में आता है तो इसके दो अर्थ हो सकते हैं। ध्यान से समझिएगा:
एक अर्थ तो यह है कि कुछ शब्द हैं जिनको हम सम्बन्ध मान लें। दोस्त, माँ, बाप,

छात्र: सर, HIDP ने हमें ये बताया है कि स्वतंत्रता हमारे लिए बड़ा जरूरी है । पर सारे संबंधों की ज़िम्मेदारी के बीच स्वतंत्र होना कैसे सम्भव है ?
वक्ता: गिरीश ने बड़ा अच्छा सवाल पूछा है । गिरीश, हम जब से पैदा होते हैं तो रिश्तों के एक पूरे…

श्रोता: मैं जब बारहवीं क्लास में था तो उस समय मैंने पढाई में दिलचस्पी नहीं रखी, न ही परिवार से बहुत मतलब रखा। मतलब उस समय मैं कुछ भी नहीं सोचता था। जो मन में आता था वो करता था। और उस समय मुझे लगता था कि सब लोग…

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ग्रेटर नोएडा। जीबीयू में आयोजित एक कार्यक्रम में पहुंचे आचार्य प्रशांत ने कहा कि महाशिवरात्रि केवल अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि यह मनुष्य को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि शिव को केवल मूर्ति या रूप में सीमित कर देना उनकी व्यापकता को संकुचित करना…




Questioner(Q): What is the process of clarity? Is it just listening with immersion and no resistance? What is Truth? How we decide it?
Acharya Prashant (AP): Listening without effort, plus if there is Truth in what you hear, there is change and transformation, and that Truth becomes the master. We…



पृथ्वी को बचाने के लिए यूनाइटेड नेशंस की सीओपी ने यह शर्त रखी थी कि 2030 तक वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री से अधिक नहीं बढ़ना चाहिए। हमने वह सीमा 2025 में ही लांघ दी है। यह आने वाले बहुत-बहुत बड़े विनाश का संकेत है। आदमी के इतिहास में इससे ख़तरनाक पल कभी नहीं आया। उस ख़तरे को चुनौती देने के लिए ही यह "ऑपरेशन 2030" है, जिसका उद्देश्य है कि आम आदमी में चेतना जगाई जाए — “देखो, तुम्हारा ग्रह विनाश की ओर कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है। तुम अपने बच्चों के लिए एक ऐसा ग्रह छोड़कर जा रहे हो, जहाँ आफ़तें ही आफ़तें होंगी।”
प्र: जिनसे हम जुड़े हुए हैं।
आचार्य: बस। तो अगर…
श्रोता: सर, हमारा जो अहंकार वो हमें एक भ्रम दे देता है की हम मालिक हैं|
वक्ता: सत्य से सम्बंधित एक बहुत मूलभूत बात,…
ठंडी हवा का झोंका भी…
The UGC regulations are only a spark. The explosive material is something far more intimate: the unexamined conviction, lodged in the deepest chamber of the collective psyche, that birth determines worth and that this determination carries divine sanction. The atmosphere itself is the disease; the regulation is at best a painkiller. India’s foundational scriptures contain the strongest possible arguments against caste. The Upanishadic view begins where hierarchy ends.
अध्यात्म की रोशनी जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ती है, तो राजनीति पर भी पड़ेगी ही पड़ेगी। ऐसा कुछ नहीं है कि आध्यात्मिक आदमी राजनीति के प्रति अंधा हो जाता है। बल्कि हक़ीक़त तो यह है कि राजनीति को आध्यात्मिक लोगों की बहुत सख़्त ज़रूरत है, क्योंकि राजनेता ताक़त की ऐसी गद्दियों पर बैठते हैं, जहाँ से वो आपके जीवन को बहुत तरीके से प्रभावित करते हैं। राजनेता अगर आध्यात्मिक नहीं है, तो देश रसातल में जाएगा। राजनीति त्यागनी नहीं है, सही राजनीति करनी है।https://acharyaprashant.org/en/articles/raajneeti-mein-adhyatm-kyon-zaroori-1_795988a15
This article is related to restlessness.