होर की मँगना दित्ता सब कुछ, सजदा करां मैं तेरा, वाहे गुरु
कैन्दी नि अंखिया, कैन्दे ने आंसू, शुक्राना तेरा, वाहे गुरु।
लफ़्ज़ों में कैसे कोई बताये, चर्चा जो तेरी हो, दिन बीत जाए
बातों में जैसे सागर समाये, न कुछ बोल पाएँ, वाहे गुरु।
ठंडी हवा का झोंका भी तू है, मेरे मन दा मालिक, दाता भी तू है
दामन बिछाके मंगदे दुआवां, सानु छड्के न जाना, वाहे गुरु।
वक्ता: स्त्रोत से एक गहरा रिश्ता होना बहुत महत्वपूर्ण है। यह एक कॉन्सेप्ट भर नहीं हो सकता है। आप जो चाहें- वाहे गुरु, अल्लाह- हमने अभी माँ बोला, कभी स्रोत बोला, कभी परम बोला या सत्य, जो भी बोलिये उसके साथ एक रिश्ता होना बहुत ज़रूरी है। अगर आपका उसके साथ कोई रिश्ता नहीं है तो आपकी अनाथ जैसी हालत रहेगी। अनाथ समझते हो, ‘अनाथ’ मतलब वही जिसका नाथ से कोई रिश्ता नहीं। मैं सबसे एक सवाल पूछ रहा हूँ क्या आपका कोई रिश्ता है, व्यक्तिगत रिश्ता, परम की साथ? कोई दोस्ती यारी? कैसा भी रिश्ता, माँ जैसा, बाप जैसा, भाई जैसा, प्रेमी जैसा, कोई रिश्ता है? रिश्ता नहीं है तो बड़ी दिक्कत हो जाएगी।


