प्रश्न: आचार्य जी, बचपन से ही अकेला रहने की आदत है। अकेला रहना अच्छा लगता है, समूह में अच्छा नहीं लगता। सामाजिक रीति-रिवाज में शामिल होना अच्छा नहीं लगता। ऑफिस में अगर ग्रुप-डिस्कशन हो रहा होता है, अच्छा नहीं लगता। ये क्या है?
आचार्य प्रशांत जी: इतने बड़े समूह के सामने तो बोल रहे हो। और क्या चाहिए?
प्रश्नकर्ता: शामिल नहीं हो पाता।
आचार्य प्रशांत जी: किस अर्थ में शामिल नहीं हो पाते? अभी जो कर रहे हो, ये पूरी संलग्नता है। इससे ज़्यादा चाहिए भी नहीं होता है। इससे ज़्यादा जो लोग करते हैं, वो बल्कि गड़बड़ करते हैं।
(श्रोताओं की ओर इंगित करते हुए) अभी यहाँ पर कोई समूह के साथ शामिल होना शुरु कर दे, कभी इनसे बात करे, कभी उनसे बात करे, कभी इधर-उधर कंधा मारे, कभी कोई पर्चा बाँटे, तो ऐसा शामिल होना चाहिए भी नहीं न।
बहुत ज़्यादा दूसरे से ताल्लुक रखना ही क्यों है? जितना ताल्लुक रखो, ऐसा रखो कि तुम्हारे लिए भी शुभ हो, दूसरे के लिए भी शुभ हो।
ये भी हो सकता है कि दूसरों को देखते हो कि वो तो दूसरों की ज़िंदगी में घुसे चले जाते हैं, और तुम घुसते नहीं, तुलना करके तुम्हें हीन-भावना महसूस होती हो कि – “बाकि सब तो बड़े सामाजिक हैं। उन्हें ये भी पता है कि पड़ोसी के घर में बाथरूम का टब किस रंग का है, वो इस हद तक सामाजिक हैं, और मुझे तो कुछ पता ही नहीं।”


