
सेक्स अगर तुम्हें शांत कर सकता होता, दो बार, चार बार में कर गया होता न? यहाँ तो लोग अपने जीवन काल में हज़ारों बार कर जाते हैं और उसके बाद भी लालायित रहते हैं, प्यास ही नहीं बुझती।
अधेड़ हो गए, साठ के हो गए, अस्सी के हो गए,…

तुम्हें लगता है, “वाह! मज़ा आ गया। लाइन दे दी उसने।“
अरे! तुझे लाइन नहीं दे दी है। सेंटेंस लिख दिया है, मृत्युदंड!
जब किसी को मृत्युदंड दिया जाता है जानते हो क्या लिखता है जज? “टू बी हैंगड टिल डेथ!"

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरे मन में सेक्स से सम्बंधित बहुत विचार आते हैं तो फिर इनको कैसे कम करें या काबू में करें?
आचार्य प्रशांत: ज़िंदगी यूँ ही छोटी है उसमें किसी ऐसे काम के लिए तुम समय कहाँ से निकाल रहे हो जो तुमको पता है कि थोड़ी देर…

प्रश्नकर्ता: अध्यात्म में वीर्य बचाने को बहुत ज़्यादा महत्व दिया जाता है।
आचार्य प्रशांत: किस उपनिषद् में लिखा है, “वीर्य बचाओ”?
प्र: नहीं, मैंने पढ़ा था।

आचार्य प्रशांत: हमने बहुत बातें करी हैं तीन दिन में, लेकिन देखिए, कैसे कहूँ? क्योंकि इतनी बार कहा है इसीलिए, कैसे कहूँ? बार-बार कहा है, हर बार कहा है, ज़िन्दगी कैसी है? सब कुछ इस पर। जब निर्णय की घड़ी आती है तब निर्णय किधर को करते हो? सब कुछ…

प्रश्नकर्ता: अध्यात्म में कामवासना, शारीरिक-आकर्षण, इन सबके विरुद्ध सावधान रहने को कहा जाता है, लेकिन जिस प्रक्रिया से एक जीव इस दुनिया में, अस्तित्व में आता है, वह प्रक्रिया ग़लत कैसे हो सकती है?
आचार्य प्रशांत: जो सवाल पूछ रहे हैं, उनकी कुछ धारणाएँ हैं, जो सवाल के पीछे छुपी…

प्रश्नकर्ता: सर, पूछने में शर्म आ रही है पर पूछना ये चाहता हूँ कि कामवासना बहुत परेशान करती है। क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: ये शर्म ही परेशानी है। तुम्हारी जो हालत है, उस बर्तन की तरह है जिसे नीचे से आँच दी जा रही है और ऊपर से बिल्कुल ढँककर…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या वासनाओं का दमन आवश्यक है?
आचार्य प्रशांत: दबाना भी एक विधि है। शम- दम ये भी आवश्यक होते हैं। वासनाएँ तो भीतर बहुत समय तक बनी रहेंगी, निर्बीज नहीं हो जाओगेl और तुम ये इंतज़ार नहीं कर सकते कि जब वासनाएँ समूल नष्ट हो जाएंगी सिर्फ…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैंने अपने मन को बहुत टटोला, और पाया कि मेरा मन डरा हुआ है और अपने-आपको हीनता भरी निगाहों से देखता है। मुझे इतना जिस चीज़ ने गिराया है वो है मेरी कामुकता। इस कामुकता ने मुझसे बहुत ग़लत काम करवाए हैं, जिससे मैं अपने-आपको बहुत हीन…

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते।।
भावार्थ: जो मनुष्य कर्मेन्द्रियों को तो वश में करता है, किंतु मन से इंद्रियों के विषयों का चिंतन करता रहता है, ऐसा मूर्ख जीव मिथ्याचारी कहलाता है।

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मन में ये चलता रहता है कि आसपास के लोग क्या सोचते हैं। नफरत से डर लगता है। ये शायद देह की असुरक्षा का ही भाव है। इसका संबंध कामवासना से भी है, कामवासना को लेकर एक असहजता रहती है हमेशा से। बाहर प्रकट नहीं होने…

प्रश्नकर्ता: जो जीवन का सबसे कीमती समय होता है, जब हमें ज़िन्दगी बनानी होती है और ज़िन्दगी के बड़े-बड़े निर्णय करने होते हैं, ठीक उसी अवधि से गुज़रते हुए, ठीक उसी दरमियान हमें कामवासना सबसे ज़्यादा क्यों सताती है? एक बार अधेड़ हो गए, बूढ़े हो गए फिर कौन-सा बड़ा…

प्रश्नकर्ता: मैं अर्थशास्त्र विषय में अनुसंधान कर रहा हूँ। मैं अपने विभाग में मेरी एक सीनियर छात्रा से अनुसंधान के कार्य के दौरान संपर्क में आया। उन्होंने मुझसे सांख्यिकी विषय में मदद ली थी, इसी दौरान मैं उनकी ओर आकर्षित होना शुरू हुआ। इस आकर्षण के कारण मेरी पढ़ाई, मेरा…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, सेक्स की लत का क्या इलाज़ है?
आचार्य प्रशांत: इसका होना—किसी भी चीज़ का होना—जिसको आप निकृष्ट समझते हैं या गलत समझते हैं उतनी बड़ी समस्या नहीं है जितना कि उसको गंभीरता से ले लेना। तुम अपने-आपको बहुत महत्व देते हो, तुम अपने-आपको न जाने क्या समझते…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जीवन का अधिकांश समय कामवासना में व्यतीत किया है। किशोरावस्था से लेकर अब तक कामवासना से मन ग्रसित रहा। जीवन की सारी व्यग्रता, उदासी या मन की किसी भी व्यग्र कर देने वाली स्थिति में वासना को ही द्वार बनाया खाली होने के लिए या कुछ क्षणों…

प्रश्नकर्ता: बहुत समय से मेरे मन में ये सवाल था, आज पूछना चाहता हूँ: सेक्स, अच्छा या बुरा?
आचार्य प्रशांत: बस सेक्स! ना अच्छा ना बुरा! साँस लेते हो तो पूछते हो अच्छा या बुरा? पानी पिया, अच्छा या बुरा?
प्र: धर्म ग्रंथों में क्यों कहा गया है कि ब्रह्मचर्य…

आचार्य प्रशांत: ज़रा भीतर जाकर के देखा करो, थोड़ा वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखो, ज़रा खोजी का चित्त रखो। नहीं हैं चीज़ें वैसी जैसी दिखाई पड़ती हैं। नहीं है दुनिया वैसी जैसी तुम्हें प्रकट होती है। और चीज़ें तो वैसी दिखाई भी नहीं पड़ती जैसी कि वो चीज़ भी है, ख़ासतौर पर…

प्रश्न: आचार्य जी, ज़िंदगी में ख़ुद खूब अनुभव करके निराशा भी ले ली, अपने आसपास के लोगों की ज़िंदगी में भी शादी और कामवासना को एक परेशानी की तरह ही पाया। स्वयं का भी अनुभव हो गया, दूसरों की ज़िंदगियाँ भी देख लीं, फिर भी मेरे मन में लड़कियों, महिलाओं…

प्रश्न: योग वाशिष्ठ में स्त्री भोग एवं संगत को 'सर्पिणी' की संज्ञा दी गई है। परंतु फ्राइड ने कहा है कि लैंगिक इच्छाओं के दमन से मानसिक विकृतियाँ पैदा होती हैं। अध्यात्म और मनोविज्ञान में ये विरोधाभास कैसा?
आचार्य प्रशांत: अध्यात्म तुमको बता रहा है कि - "जिसको तुम रस्सी…

प्रश्न: आचार्य जी, मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि सेक्स का अभाव मानसिक अशांति का कारण बनता है। क्या सेक्स का कोई विकल्प नहीं है जिससे व्यक्ति शांत रहे?
आचार्य प्रशांत जी: घर में बच्चे होते हैं छोटे, उन्हें कुछ-न-कुछ उपद्रव करना है। जैसे-जैसे वो डेढ़-दो साल के हो गए, उनकी ऊर्जा…

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ग्रेटर नोएडा। जीबीयू में आयोजित एक कार्यक्रम में पहुंचे आचार्य प्रशांत ने कहा कि महाशिवरात्रि केवल अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि यह मनुष्य को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि शिव को केवल मूर्ति या रूप में सीमित कर देना उनकी व्यापकता को संकुचित करना…







प्रश्नकर्ता: पिछली बार चंडीगढ़ तरफ़ से आया था जी,। आप से जुड़ा था। तबजब मैं अकेला आया था, बिलकुल हताश, परेशान था। आज मेरीमेरे साथ श्रीमती जी भी आईं हैं। मेरा प्रश्न यह है जी, जैसे संतों ने कहा है—
प्रेम-गली अति सांकरी, तामे दो न समाहिं। जब मैं था…


लड़का-लड़की पंद्रह साल के हुए नहीं कि माँ-बाप बन सकते हैं, फिर? बहुत अक्ल आ जाएगी उनमें? और फिर जो बच्चा पैदा हो उसको सिखाएँ कि, “यह देवी-देवता हैं, हमने पैदा किया है।“ वह देवी-देवता ने नहीं पैदा किया है, वह पैदा इसलिए हो गया था क्योंकि देवी जी बहकी…

“ओ ले-ले-ले! मेला शोमू कितना स्टुपिड है!" अरे! स्टुपिड (मूर्ख) है तो यह बोलने के लिए भी काहे को रुकी कि शोमू स्टुपिड है? भाग! जान बचाकर भाग। पर शोमू क्यूट ही इसीलिए है क्योंकि वह स्टुपिड है। अजीब बात है! तुमको पता है वह स्टुपिड है पर तुम तब

लड़कीवाले लड़की देने को राज़ी नहीं होते अगर सरकारी नौकरी नहीं है। और कोई वजह हो-न-हो, वंश चलाने की ख़ातिर हमें यूपीएससी निकालना पड़ेगा। ‘वंश चलाने के लिए यूपीएससी निकालना पड़ेगा!’ यह सब तो तुम्हारे सारे कारण हैं सरकारी नौकरी के पीछे जाने के, नहीं तो और तुम क्यों इतने…

आज से १ लाख वर्ष पीछे जाओ तो अरबों-खरबों जानवर थे, हज़ारों-लाखों प्रजातियों के; और मनुष्य थे कुछ लाख, अधिक-से-अधिक। अब आदमी हो गए हैं ८ अरब और जानवर बचे हैं (हाथों से कम मात्रा दर्शाते हुए) इतने से!
साहब!
जानवर भी कौन से बचे हैं बताइए? जो मनुष्य के…

लोग कहते हैं सच्चा प्यार मिलता नहीं, मैं कहता हूँ सच्चा प्यार तुमसे बर्दाश्त होता नहीं। मिल तो आज जाए, झेल लोगे? बड़े अफ़साने लिखे जाते हैं, शायरों की दूकान ही चल रही हैं इसी बात पर कि ‘हम तो बड़े क़ाबिल थे पर कमबख़्त ज़िंदगी ने धोखा दे दिया,…

तो शादी से पहले तो तुम ख़ुद ही सच्चाई को पर्दे में रखते हो। तुम ख़ुद ही एक दूसरे के सामने सभ्यता का, शालीनता का, भलाई का मुखौटा पहन कर बैठते हो। “नहीं, नहीं तुम बैठो! पॉपकॉर्न मैं ले आता हूँ।“
“नहीं, नहीं तुम क्यों खर्च करोगी, मैं कर रहा…

यह एक बड़ा भ्रम कि जल्दी से शादी कर लो और शादी करने से दूसरा व्यक्ति ज़िम्मेदार हो जाएगा। जो माँ-बाप कहते हैं, “ये बड़ा उद्दण्ड है, लड्डू। गाँव भर में लुढ़कते फिरता है लड्डू। तो लड्डू को ज़िम्मेदार बनाने के लिए लड्डू की शादी कर देते हैं।” घर में…

भई! गर्मी का मौसम हो, तुम शरीर खुला रखो बात समझ में आती है। तुम कहीं नदी में, स्विमिंग पूल (तरणताल) में नहाने जा रहे हो, तुम कपड़े उतार दो, बात समझ में आती है। या तुम सिर्फ़ अपनी सुविधा के लिए कम कपड़े पहनो तो भी बात समझ में…

सुबह उठते ही, "जानू उठ गई? जानू टट्टी कर ली, ब्रश कर लिया? नाश्ते में क्या खा रही हो? क्यों खा रही हो? खा ही क्यों रही हो, पी क्यों नहीं रही? जानू पैरों से चल रही हो? सर के बल क्यों नहीं चल रही?"
अभी हॉट है मामला भई!…

नौ बजे खाना लगना है मेज़ पर, सात बजे से सूँघना शुरू कर देते हैं।
“तो आज क्या बन रहा है? तो आज क्या बन रहा है?”
जब ज़िंदगी बिलकुल बैरोनक और खाली होती है तो दिमाग में सिर्फ़ खाना और थाली होती है।

यह जगत तो लाभ का सौदागर है। वो आप से नहीं प्रेम करता; आपसे जो मिल रहा है उसे से प्रेम करता है। और इस बात का बड़ा कड़वा अनुभव आपको तब होता है जब आप देना बंद कर देते हैं। आप तो यही सोचते रह गए कि उस व्यक्ति…

लड़के अगर बेरोज़गार हों और शादी के लिए लालायित हो जाएँ तो तुम कहोगे, “छी! कमाता ना धमामा, शादी करने चला है!”
और लड़कियों से यह बात तुम बोलते नहीं। क्योंकि लड़कियाँ तो गाय हैं, उन्हें कमाना-धमाना थोड़े ही है। उन्हें तो घर में बैठकर बछड़े जनने हैं।
जब बहन…

हार मोतियों का हज़ार बार भी टूटेगा तो उसे तुम हज़ार बार जोड़ोगे, बार-बार जोड़ो! सुजन अगर रूठ जाएँ, तो बार-बार मनाओ क्योंकि उनसे प्यास बुझती है।
पर जिससे प्यास बुझती ना हो, उससे बस आदतवश जुड़े हो, भ्रमवश, धारणावश जुड़े हो, इसलिए जुड़े हो कि बीस साल से जुड़े…

ये ब्रेकअप होता क्या है? तुम्हें अगर प्रेम है तो क्या तुम तय करके किसी से दूर हो सकते हो? कर कैसे लोगे? ये बात तो हृदय की होती है, आत्मा की होती है। तुम तय थोड़े ही करोगे कि कल से इससे बात नहीं करनी है क्योंकि हमारा ब्रेकअप…

इस युग का सबसे केंद्रीय प्रश्न है ये कि, “बीबा हॉट है कि शीबा?” और आप सही चुनाव कर सकें इसके लिए आपको दोनों की एक नहीं चालीस-चालीस तस्वीरें दिखाई जाएँगी। किसकी कमर कैसी है, किसकी जाँघें कैसी हैं, किसका वक्ष कैसा है, और नज़दीक से देखो ताकि तुम्हारा निर्णय…

जो आप अपने साथ ज़िन्दगी में घटिया-से-घटिया काम कर सकते हैं वो ये है कि आप अपने शारीरिक सौंदर्य की रोटी खाना शुरू कर दें। “लड़की बहुत सुंदर है, इसको तो बहुत अच्छा लड़का मिला है। बड़े डॉक्टर ने इसको पसंद किया है।“ अगर इस वजह से पसंद किया है…

जिस साल मेरा चयन हुआ था, पाँच लाख बैठे थे और सीट थी मुश्किल से, मेरे ख्याल से, ढाई-सौ, तीन-सौ। वो जो पूरी प्रक्रिया है वो बनी ही ऐसी है कि उसमें से हज़ार में से नौ-सौ-निन्यानवे लोग अचयनित ही निकलेंगे और यह बात तुमको पहले से पता होती है…

औरतों से मुझे जितनी शिक़ायत है, उतना ही उनको लेकर के दुःख भी है। उनको देखता हूँ, बहुत दुःख लगता है। और शिक़ायत इस बात की है कि वो अपने दुःख का कारण स्वयं हैं। भावना को वो अपना हथियार समझती हैं। देह को वो अपनी पूंजी समझती हैं। देह…
ये तो ऐसा लग रहा है जैसे कि पुराना नारा हो, “वीर्य बचाओ, वीर्य बढ़ाओ।” ये कौन से उपनिषद् में…
(श्रीमद्भागवत गीता अध्याय ३, श्लोक ६)
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, क्या मानसिक विकारों और…
The UGC regulations are only a spark. The explosive material is something far more intimate: the unexamined conviction, lodged in the deepest chamber of the collective psyche, that birth determines worth and that this determination carries divine sanction. The atmosphere itself is the disease; the regulation is at best a painkiller. India’s foundational scriptures contain the strongest possible arguments against caste. The Upanishadic view begins where hierarchy ends.
अध्यात्म की रोशनी जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ती है, तो राजनीति पर भी पड़ेगी ही पड़ेगी। ऐसा कुछ नहीं है कि आध्यात्मिक आदमी राजनीति के प्रति अंधा हो जाता है। बल्कि हक़ीक़त तो यह है कि राजनीति को आध्यात्मिक लोगों की बहुत सख़्त ज़रूरत है, क्योंकि राजनेता ताक़त की ऐसी गद्दियों पर बैठते हैं, जहाँ से वो आपके जीवन को बहुत तरीके से प्रभावित करते हैं। राजनेता अगर आध्यात्मिक नहीं है, तो देश रसातल में जाएगा। राजनीति त्यागनी नहीं है, सही राजनीति करनी है।https://acharyaprashant.org/en/articles/raajneeti-mein-adhyatm-kyon-zaroori-1_795988a15
लड़की को पढ़ाई के लिए दो-सौ किलोमीटर दूर भेजना हो तो यही माँ-बाप और भाई कन्नी काट जाते हैं, और ब्याह कर वो दो-हज़ार किलोमीटर दूर जा रही हो इन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। और पढ़ाई के लिए जाएगी तो किसी यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में रहेगी, सुरक्षा में रहेगी, हॉस्टल…
कृष्ण का खुद ऊँचा होना, कृष्ण के पूरे जीवनवृत्त में, उनकी ज़िंदगी की जो पूरी कहानी है उसमें और श्री कृष्ण की प्रेमकथा में एक सूत्र है जो साझा पिरोया हुआ है। गीता की ऊँचाई, कृष्ण के जीवन की ऊँचाई, और कृष्ण के प्रेम की ऊँचाई तीनों एक हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि कृष्ण बहुत ऊँचे हों और उनका प्रेम निचले तल का हो जाए। ये संभव नहीं है।