प्रश्नकर्ता: सर, पूछने में शर्म आ रही है पर पूछना ये चाहता हूँ कि कामवासना बहुत परेशान करती है। क्या करूँ?
आचार्य प्रशांत: ये शर्म ही परेशानी है। तुम्हारी जो हालत है, उस बर्तन की तरह है जिसे नीचे से आँच दी जा रही है और ऊपर से बिल्कुल ढँककर रख दिया गया है। तो उसके भीतर दबाव बढ़ता ही जा रहा है, बढ़ता ही जा रहा है, तो विस्फोट तो होगा। यही परेशानी है तुम्हारी।
नीचे से जो आँच दे रहा है, उसी ने तुम्हें ऊपर से ढँककर भी रख दिया है, और तुम पके जा रहे हो। जो तुम्हें उत्तेजना दे रहा है, उसी ने तुम्हें शर्म का भाव भी दे रखा है। यही कह रहे हो ना, "सर, शर्म आ रही है पुछने में पर उत्तेजना बहुत है।" ये शर्म और उत्तेजना अलग-अलग नहीं हैं; ये दोनों एक ही जगह से आ रहे हैं। तुम देख भी नहीं पाते कि तुम किस तरह इनका शिकार हो जाते हो।
तुम जानते हो कि ये दुनिया, ये समाज, ये बाज़ार तुम्हारे साथ क्या करता है? एक तरफ तो ये तुम्हें उत्तेजित करके रखता है। कामवासना का अर्थ उसकी पूर्णता में लेना सिर्फ यही नहीं है कि किसी औरत या मर्द का शरीर चाहिए; कामवासना का अर्थ है चाहिए, और चाहिए।
एक तरफ तो तुम्हारे भीतर वो ही एक आग लगाकर रखता है कि तुम्हें चाहिए, तुम्हें चाहिए, तुम्हें मिले। तुम्हें दिनरात उत्तेजना की सामग्री परोसी जाती है। और दूसरी ओर तुम्हारे सर पर नैतिकता का बोझ लाद दिया जाता है कि अगर तुम ये करोगे तो गलत करोगे। एक तरफ तो बाकायदा लाइसेंस (अनुज्ञा) देकर शराबखाने खोले जाते हैं। और दूसरी ओर तुम्हारे भीतर ये भाव भी बिठाया जाता है कि शराब पीना गलत बात है। यदि शराब पीना गलत बात है, तो बाकायदा लाइसेंसशुदा शराबखाने कैसे खुले हुए हैं? उन्हें खुलने कैसे दिया गया?


