
“माँसाहार गरीबों के लिए वरदान है क्योंकि माँसाहार के माध्यम से गरीबों को सस्ता प्रोटीन मिल जाता है।“ १ ग्राम प्रोटीन अगर आप मटन से लेते हैं तो लगते हैं ३ रुपये। उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप अंडे से लेते हैं तो लगते हैं १ रुपय ३० पैसे, उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप चिकन से लेते हैं तो लगता हैं १ रुपया।

ना ब्रह्म से मतलब, ना गीता से मतलब, ना उपनिषदों से मतलब। अंधविश्वासों से मतलब है, कुट्टू के आटे से मतलब है।
"क्या चबा रही हो भाभी?" कहेंगी, "ये फलाहारी लड्डू हैं।" ये फलाहारी लड्डू कौन-से होते हैं? अब यह धार्मिकता का प्रमाण दिया जा रहा है कि, "हम फलाहारी…

दिल में जिसको बैठाना था उसकी जगह और बहुत कुछ बैठा लिया। अब सरकारी नौकरी का लालच बैठा हुआ है दिल में, क्यों? सब जानते हैं क्यों! गाड़ी मिल जाएगी, सरकारी बंगला मिल जाएगा, कोई निकाल नहीं सकता। कोई निकाल नहीं सकता बड़ा आनंद रहता है, अज़ीम-ओ-शान-शहंशाह। ग्यारह बजे जाओ,…

हर आदमी अपनी नज़र में नाकाम आशिक़ बन कर घूम रहा है। बहुतों का तो ब्रेकअप तब हो जाता है जब उनका कोई अफ़ेयर भी नहीं था। कहो, “क्यों इतने उदास हो?” “ब्रेकअप हो गया है!” तेरा अफ़ेयर कब था भाई? पर ब्रेकअप में जो रुहानी आनंद है वो तो …

एक बेज़ुबान निरीह को पकड़ कर काट दिया, उसका माँस पका कर खा गए – इससे कौन-सी परम सत्ता आपको आशीर्वाद देने वाली है, बताइए ज़रा? इससे आसमानों से फूल बरसेंगे आप पर? क्या तुक है!
जब बात की जाती है पशु बलि की, तो वास्तव में कहा जाता है…

सोचो तुम किसी शॉपिंग-मॉल में हो और वहाँ कबीर साहब का भजन बजने लग जाए; बिक्री आधी रह जाएगी बता रहा हूँ। इसलिए बाज़ार का अध्यात्म से छत्तीस का आँकड़ा है। बाज़ार कभी नहीं चाहेगा कि अध्यात्म सफल हो और बाज़ार हर तरह की साज़िशें करेगा अध्यात्म को गिराने की।…

तुम ग़लत राहों को ठुकरा कर तो देखो, सही राह खुलती है कि नहीं खुलती। और यह घटिया और झूठा तर्क बिलकुल मत दे दो कि, “मुझे सही राह मिली नहीं मैं इसलिए ग़लत राह चल पड़ा।“ बात यह नहीं है, सही राह हमेशा खुली होती है और उपलब्ध होती…

बहुत मोटी मार पड़ती है ठीक तब जब तुम्हें ज़रा भी अंदेशा नहीं होता कि मार खाने वाले हो। माया भी कोई छोटी-मोटी खिलाड़न थोड़े ही है। बेहोशों को छोड़ देती है, वह कहती है, “यह तो पहले ही गिरा हुआ है इसको क्या गिराएँ? शू!” वह भी पसंद करती…

जिस स्तर के तुम आदमी हो, जिस औकात की तुम्हारी ज़िंदगी है, तुम्हारी प्रेम कथा भी उसी स्तर, उसी औकात की होगी। तो ये हिमाक़त तो करना ही मत कि ज़िंदगी है दो फुट की औकात की और दुनिया को बताते घूम रहे हो कि, “मेरी आशिक़ी का आसमानी अफ़साना…

दुनिया की ताक़तों से, और घरवालों से, और पचास लोगों से डरते हो इस बात से भी तो डरो कि, ‘जन्म ही व्यर्थ हो गया तो?’
जीवन से छोटे-मोटे डर सब हटाने हों तो बड़ा डर ले आओ। और बड़ा डर यही है – कल्पना में तो खोए ही रहते…

अकसर जो नंगा होता जाता है उसको हम लिख देते हैं, “ये तो बोल्ड (निर्भीक) कपड़ों में आया है।“ उसमें बोल्डनेस (निर्भीकता) क्या है? फिर तो सबसे बोल्ड जानवर हुए। एक गधा तो बोल्डनेस की प्रतिमूर्ति हो गया, उसे बोल्डनेस का नोबेल प्राइज़ मिलना चाहिए, उसने ज़िन्दगी में कोई कपड़ा…

माया एक औसत ज़िंदगी का नाम है।
उफ्! कैसे पकड़ोगे?
द एवरेज लाइफ़!

पुरुषों ने खूब बहती गंगा में हाथ धोए हैं। स्त्री वैसे ही आतुर रहती है कि कोई ज़रा तारीफ़ कर दे, तो उन्होंने कहा “इसको फँसाने का तो बढ़िया तरीका है, ज़रा-सी तारीफ़ कर दो।”
एक बात बताना, तुमने आज तक कितनी शायरी, कितनी कविताएँ, ग़ज़लें, नग़में पढ़ीं जिसमें स्त्री…

जो लोग ग़लत राह पर चल रहे हों, और सफल आदि होते दिखाई देते हों, समृद्ध होते दिखाई देते हों, मौज मारते दिखाई देते हों, उनको देख कर कभी मन छोटा मत कीजिएगा। उनकी सफलता, उनकी समृद्धि, उनकी मौज बहुत सतही है। अंदर-ही-अंदर महा दुःख है उनमें। उनके लिए प्रार्थना…

तुम्हें क्या लगता है नर्क वो जगह है जहाँ बड़े-बड़े कड़ाहों में तेल उबल रहा है और लोग उसमें पकौड़ो की तरह तले जा रहे हैं? ना! नर्क वो जगह है जहाँ सब खूब मेहनत करते हैं, कमाते हैं, खाते हैं और सो जाते हैं। नर्क बड़ी साफ़-सुथरी जगह है…

दुनिया के सामने इंसान की तरह खड़े होना सीखो भाई! केचुए की तरह थोड़े ही है कि किसी भी के भी पाँव के नीचे आ गए। इस चेहरे पर तेज होना चाहिए, ऑंखों में ताक़त झलकनी चाहिए! कुछ बोलो तो उसमें साहस हो और संकल्प हो! आवाज़ काँपे नहीं, थरथराए…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बताया तो बहुत गया है कि विषम परिस्थितियों में भी व्यवहार कैसा करें पर जब वैसी विपरीत या विषम परिस्थितियाँ सामने आती हैं, तब सारा ज्ञान हिरा जाता है (खो जाता है) और आदमी अपना आपा खो बैठता है।
आचार्य प्रशांत: वह तो होगा ही, ज्ञान से…

प्रश्नकर्ता: जो इतने वर्षों में सीखा, घर में रह कर, दोस्तों के साथ, शिक्षा में, उसका बल इतना है कि लगता है कि वो गलत है—ये मैं अपना एक प्रोजेक्शन (प्रक्षेपण) कर रहा हूँ; गलत लगता तो छोड़ ही देता—लेकिन बल इतना है कि उसको गिराने के लिए अक्षम पा…

प्रश्नकर्ता: मैंने जीवन में अभी तक लाभ-हानि देखकर ही निर्णय लिया लेकिन अभी मुझे जीवन में कोई सार नज़र नहीं आता। अब मैं आपके पास बैठकर बस देखना चाहता हूँ। अब मैं अध्यात्म की ओर ही आना चाहता हूँ।
आचार्य प्रशांत: अच्छा है। कहीं कोई दुविधा है?

प्रश्नकर्ता: दुनिया में ताकतवर लोगों का ही क्यों बोलबाला है? कमज़ोर और गरीब को हर जगह दबाया क्यों जाता है? भगवान कमज़ोरों की मदद क्यों नहीं करते?
आचार्य प्रशांत: भगवान कमज़ोरों की मदद लगातार कर रहे हैं उनकी कमज़ोरी बन कर। तुम्हें जो कुछ भी मिला हुआ है वो भगवान…

प्रश्नकर्ता (प्र): शिव जी की तीन आंखों की परिभाषा सूर्य, चंद्रमा, अग्नि है। इनका क्या अर्थ है?
आचार्य प्रशांत (आचार्य): सूरज और चंद्रमा, दिन और रात के प्रतीक हैं। दिन और रात मतलब द्वैत के दो सिरे। दिन व रात मतलब वो सब कुछ जो हमें खंडित प्रतीत होता है।…

प्रश्न: आचार्य जी, मन हमेशा उलझन में क्यों रहता है? हमेशा मन में कुछ-न-कुछ क्यों चलता रहता है? इससे कैसे बाहर आएँ?
आचार्य प्रशांत: तुम्हारा जो पूरा माहौल है, तुम्हारा जो अपना पूरा पर्यावरण है, उसकी सफ़ाई करनी पड़ेगी।

प्रश्नकर्ता: गीता में जो बातें कही गई हैं: ध्यान-योग, ज्ञान-योग, और कर्म-योग, ये तीनों सबके लिए उचित नहीं। लेकिन ये कैसे पता चले कि किसके लिए क्या उचित हैं?
आचार्य प्रशांत: तीन नहीं, अट्ठारह बातें कही गईं हैं। भगवत गीता में अट्ठारह अध्यायों में अट्ठारह प्रकार के योग हैं। और

प्रश्न: क्या ध्यान का मतलब है सब कुछ होगा बाहर, लेकिन आपके मन पर उसका असर नहीं होगा?
आचार्य प्रशांत: बढ़िया, सब चलेगा।
तुम्हारे ध्यान में आने से दुनिया का काम-धाम नहीं रुक जाएगा। तुम्हारा अपना काम-धाम भी रुक नहीं जाएगा। तुम खेल रहे हो तो खेलोगे, तुम दौड़ रहे

प्रश्न: कभी-कभी ऐसा होता है कि मन करता है कि सब कुछ छोड़-छाड़ कर चला जाऊँ, क्या ऐसा करना सही होगा?
आचार्य प्रशांत: देखो दो तरह की बातें हो सकती हैं:

प्रश्न: आचार्य जी, जैसे कि किसी ने मुझसे पहली बार झूठ बोला, और जब मैं उसे धमकाता हूँ, जो मुझे उस समय अच्छा लगता है, वो अगर मैं उसको दस दिन बाद बोलूँगा, तो मुझे वो चीज़ नहीं मिलेगी। मैं छटपटा लिया, तब जाकर मैंने उसे बताया, तो फिर वो…

आचार्य प्रशांत: कबीर का है,
सज्जन जन वही है, ढाल सरीखा होय।
दुःख में आगे रहे, सुख में पाछे होय।।

धरती फाटे, मेघ मिलै, कपडा फाटे डौर,
तन फाटे को औषधि, मन फाटे नहिं ठौर।
~ संत कबीर

प्रश्न: आदमी बँटा हुआ कैसे है ?
आचार्य प्रशांत: जितनी भी चीज़ें अलग-अलग दिखाई देती हैं, उनके बंटने का कारण आदमी का दिमाग ही है। फिर उसमें जात, धर्म, देश, हज़ार तरीके के बंटवारे चारों तरफ आ जाते हैं। दुनिया इसीलिए बंटी हुई है क्योंकि आदमी का मन…

पंडित और मशालची, दोनों सूझत नांहि
औरन को करै चांदना, आप अँधेरे मांहि

श्रोता १: सर, मेरी लाइफ में बहुत सारे चिंता के विषय होते हैं जैसे मेरे परिवार में मेरे पेरेंट्स के बीच कुछ हो गया, झगड़ लिए हैं दोनों तो फिर उन दोनों को समझाना है पर वो समझ नहीं रहे । जैसे एक दोस्त है कि जा रहा है खाए…

श्रोता: सर, मैं इतना कन्फ्यूज्ड क्यूँ रहती हूँ?
वक्ता: क्या कंफ्यूज़न है? किन मामलों में कंफ्यूज़न है?
श्रोता: किसी भी चीज़ में।

स्वाति बूंद केतली में आए, पारस पाये कपूर कहाए । दर्पण फूटा कोटि पचासा, दर्शन एक सब में बासा ।। ~ संत दादू दयाल
वक्ता: आप एक स्थान पर खड़े हैं और आपके चारों तरफ असंख्य शीशे हैं—ऊपर, नीचे, दसों दिशाओं में शीशे हैं; हर रंग, हर आकार और हर…

वक्ता: इम्तिहान में आया है कि दो और दो कितना होता है। तो आप क्या करते हो? आप क्या करते हो? आप चार लिख देते हो, और उसके बाद आप रुक नहीं जाते।
श्रोता १: नेक्स्ट क्वेश्चन (अगला प्रश्न )।

प्रश्न: कई आवाज़ें उठे मन में, तो कैसे पता चले कि कौन-सी आवाज़ असली है?
वक्ता: जहाँ जो आवाज़ बता रही हो कि – “मेरा पालन करो तो तुम्हें ये मिलेगा और ये मिलेगा, और मेरा पालन नहीं करोगे तो ये नुकसान हो जाएगा और वो नुकसान हो जाएगा,” तो…

प्रश्न: क्या सम्बन्ध इनके अलावा भी होते हैं – शरीर, विचार, गुरु?
वक्ता: अभी मैं अगर बताऊँगा भी, तो वो वैचारिक ही हो जाएगा ना। सोचिये, उसके बारे में आपको जानकारी मिल गयी, वो जानकारी क्या है? विचार है। तो ये पता भी चल गया कि, हाँ इसके अलावा भी…

प्रश्न: सर, जैसे-जैसे बड़े होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे उलझनें बढ़ती जा रही हैं। सर, पैसों की दिक्कत होया कुछ और प्रॉब्लम हो, जैसे-जैसे बड़े होते जा रहे हैं, परेशानियाँ और बढ़ती चली जा रही हैं। तो ऐसा क्या है, जो अब होने लगा है, जो पाँच साल पहले…

अंतर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः। भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्-तादृशा एव जानते॥ – अष्टावक्र गीता (१४- ४)
अनुवाद : भीतर से निर्विकल्प और बाहर से स्वच्छंद आवरण वाले, प्रायः भ्रांत पुरुष जैसे ही दिखने वाले प्रकाशित पुरुष अपने जैसे प्रकाशित पुरुषों द्वारा ही पहचाने जा सकते हैं ।

प्रश्न: सर, बचपन से एक सपना था, लगता था कि डॉक्टर बनना है| फिर थोड़े बड़े हुए तो सोचा कि डॉक्टर नहीं, इंजीनियर बनना है| कुछ और समझ आयी तो सोचा कि राजनीति में चला जाऊँ क्योंकि मेरा सम्बन्ध राजनीति से भी रहा है, पर फिर किसी ने कहा कि…

आचार्य प्रशांत: दिनेश का सवाल है कि मन सभी का अधिकतर गलत कार्यों की तरफ ही क्यों भागता है। मन कैसे ऐसा कर ले कि उधर को ना जाए?
यदि मन को साफ़-साफ़ पता ही हो कि कुछ गलत है, तो उधर जाएगा नहीं। मन उधर को ही जाता है…

प्रश्न: निर्णय लेने की जो शक्ति है, ये क्या है और इसे कैसे बढ़ायें?
वक्ता: सुरेन्द्र, बात को और मूल रूप में पकड़ो। निर्णय शब्द का अर्थ क्या है? निर्णय करना क्यों पड़ता है? बात को ध्यान से देखना। निर्णय की जरूरत तभी पड़ती है जब मामला पूरा साफ़ ना…

वक्ता: तुमने बड़ी ख़ूबसूरत बात कही कि जो कुछ है वो बाहर से है। ठीक-ठीक देख पा रहे हो कि मन में जो कुछ भरा हुआ है वो दूसरों का दिया हुआ है और दिया ही नहीं है, देने में तो ऐसा लगता है किसी ने तुम पर कुछ उपकार…

प्रश्न: सर, असल में होता क्या है कि कुछ बातों से हम सम्बद्ध हो पाते हैं, तो उसे अमल भी कर पाते हैं लेकिन कई बातें ऐसी हैं जो सिर्फ लेक्चर तक ही रह जाती हैं, मतलब की वो सिर्फ़ बातें बन कर ही रह जाती हैं ।
वक्ता: बिल्कुल…




इन सब से मुक्ति का एक ही तरीका है, वो बचो ही नहीं जो मूर्ख जाकर के दुनिया से, जगत से, प्रकृति से कामना पूर्ति की आशा रखता था, वो बचो ही नहीं। उसके अलावा और तुम कितने भी हथकंडे लगा लो, अतीत तो लौट-लौट के बार-बार आएगा और सर पर चढ़ेगा ही चढ़ेगा।

Questioner(Q): What is the process of clarity? Is it just listening with immersion and no resistance? What is Truth? How we decide it?
Acharya Prashant (AP): Listening without effort, plus if there is Truth in what you hear, there is change and transformation, and that Truth becomes the master. We…


पृथ्वी को बचाने के लिए यूनाइटेड नेशंस की सीओपी ने यह शर्त रखी थी कि 2030 तक वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री से अधिक नहीं बढ़ना चाहिए। हमने वह सीमा 2025 में ही लांघ दी है। यह आने वाले बहुत-बहुत बड़े विनाश का संकेत है। आदमी के इतिहास में इससे ख़तरनाक पल कभी नहीं आया। उस ख़तरे को चुनौती देने के लिए ही यह "ऑपरेशन 2030" है, जिसका उद्देश्य है कि आम आदमी में चेतना जगाई जाए — “देखो, तुम्हारा ग्रह विनाश की ओर कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है। तुम अपने बच्चों के लिए एक ऐसा ग्रह छोड़कर जा रहे हो, जहाँ आफ़तें ही आफ़तें होंगी।”
ये इसमें, कहाँ है? ये कहाँ से आया है कि ‘सज्जन जन वही है जो दूसरों की मुसीबत के ख़ुद आने वाली चीज़ को ढाल की तरह आगे…
वक्ता: चिराग की रोशनी तो फिर भी उसकी अपनी है, यहाँ तो मशाल पकड़ी हुई है, जो तुम्हारा हिस्सा भी नहीं। तुम मशाल नहीं हो, तुमने तो मशाल उठा ली है बस,…
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This article is related to restlessness.