श्रोता: सर, मैं इतना कन्फ्यूज्ड क्यूँ रहती हूँ?
वक्ता: क्या कंफ्यूज़न है? किन मामलों में कंफ्यूज़न है?
श्रोता: किसी भी चीज़ में।
वक्ता: चलो तो शुरुआत अच्छी हुई है। सबसे पहले तो तुम्हें ये समझ में आया कि जो मन कन्फ्यूज्ड होता है, वो किसी एक मसले पर ही कन्फ्यूज्ड नहीं होता है। अक्सर हम किसी से पूछें कि, ‘’क्या कन्फ्यूज़न है’’ तो तुरतं कोई मुद्दा बता देगा। वो कहेगा “ये फैसला लेना है कि दाएं जाएं या बाएं जाएं और जान नहीं पा रहे हैं कि दाएं कि बाएं।” यही होता है न? तो तुम्हारे साथ ये बात अच्छी है कि तुम समझ रहे हो कि जो मन कन्फ्यूज्ड होता है, वो किसी एक मसले पर नहीं कन्फ्यूज्ड होता। कंफ्यूज़न उसका माहौल होता है। जैसे कि धुँआ भरा हो यहाँ पर तो क्या किसी एक जगह पर ही सांस में धुंआ जाएगा क्या?
इस कमरे में और बगल के कमरे में तमाम धुंआ भरा हो तो जहाँ जाओगे, धुंआ वहीं जाएगा न, माहौल बन गया है धुंआ। तो अच्छा है कि तुम समझते हो कि मन का माहौल ही कंफ्यूज़न का है। तो अब हम इस बात को दर-किनार कर सकते हैं कि कोई एक मुद्दा सामने आ गया था जिसने हमें *कन्फ्यूज़*न कर दिया। बात मुद्दे की नहीं है बात हमारी है, हम ऐसे हैं कि कन्फ्यूज्ड रहेंगे ही चाहें मुद्दा कुछ भी हो। ठीक है न?


