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Poems

क्यों एक बार फिर?
Poems
क्यों एक बार फिर?
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एक बार फिर,

हाँ, फिर से एक बार,

नफरत हो गई है

अपनी कल्पनाओं से,

उन्मुक्त उड़ने, स्वच्छन्द सोचने वाले हृदय को

सीना फाड़ कर निकलने

और सामनें रख कर,

उस की उद्दंडता के लिए

उस के टुकड़े कर देने

की इच्छा है एक बार फिर

(पर क्या यह काम…

मैं चुप हूँ || आचार्य प्रशांत (1995)
Poems
मैं चुप हूँ || आचार्य प्रशांत (1995)
1min
8reads
जो कुछ लिखा तूने
Poems
जो कुछ लिखा तूने
1min
37reads

जो कुछ लिखा तूने, उसे मिट के मिटा

जो पास है तेरे, उसे खुद से बचा

जो बोया है तूने, उसे जड़ से हटा

जो बोया नहीं तूने, उसे अपना खून पिला

जो तेरी कमाई है, उसे आग दे लगा

जो कमाया नहीं तूने, उसे कभी न गँवा

जो याद…

आप को
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आप को
1min
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आप को: जन्मदिन मुबारक

और धन्यवाद

बताने का

कि कविता

रजनीगंधा का फूल

हो सकती है

पर

अभी

‘आप की फरमाइश’ पर

कविता

लिखूँ कहाँ से

जब

घड़ी के काँटे भी सो जाना चाहते हैं

और

नल से गिरता पानी

ध्यान जमने

देता नहीं

पहले तो

ज़रा यह नल बंद…

जब गीत न अर्पित कर पाओ
Poems
जब गीत न अर्पित कर पाओ
2min
15reads

पाते स्वयं को विचित्र युद्ध में

रक्षा करते शत्रु जनों की

टूटते न नींद न संग्राम

मोहलत नहीं चार पलों की

इधर भटकते उधर जूझते

गिरते पड़ते आगे बढ़ते

जब गीत न अर्पित कर पाओ

तो ग्लानि न लेना ओ मन

तुम्हारी व्यथित साँसों का

शोर ही संगीत है

हरिताभ…

Excerpts from Articles
Why do I restless
Hindi article on restlessness by AP
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Description enwcoiew fkwsc J. Krishnamurti.
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गुरु के प्रति धन्यवाद कम क्यों हो जाता है? आचार्य प्रशांत (2017)
अब देखिएगा, क्या हो रहा है। कोई कृतज्ञ कब अनुभव करेगा? जब पहले उसकी हालत ख़राब हो और कोई बचाए। आपके भीतर अभी यह इच्छा शेष है कि आप कृतज्ञ अनुभव करती रहें और कृतज्ञता अनुभव करने के लिए ज़रूरी है कि कुछ गड़बड़ हो और फिर उस गड़बड़ से आप उबार ली जाएँ। तो फिर आप कृतज्ञ अनुभव करेंगी कि, अरे, मेरा सौभाग्य कि मुझे किसी ने बचा लिया।
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राधा-कृष्ण में भी तो प्रेम था, तो आप हमारे प्रेम को सम्मान क्यों नहीं देते?
कृष्ण का खुद ऊँचा होना, कृष्ण के पूरे जीवनवृत्त में, उनकी ज़िंदगी की जो पूरी कहानी है उसमें और श्री कृष्ण की प्रेमकथा में एक सूत्र है जो साझा पिरोया हुआ है। गीता की ऊँचाई, कृष्ण के जीवन की ऊँचाई, और कृष्ण के प्रेम की ऊँचाई तीनों एक हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि कृष्ण बहुत ऊँचे हों और उनका प्रेम निचले तल का हो जाए। ये संभव नहीं है।
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कर्म और अतीत से मुक्ति कैसे मिले ?
इन सब से मुक्ति का एक ही तरीका है, वो बचो ही नहीं जो मूर्ख जाकर के दुनिया से, जगत से, प्रकृति से कामना पूर्ति की आशा रखता था, वो बचो ही नहीं। उसके अलावा और तुम कितने भी हथकंडे लगा लो, अतीत तो लौट-लौट के बार-बार आएगा और सर पर चढ़ेगा ही चढ़ेगा।
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Why do I restless
This article is related to restlessness.
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जीवन-मरण का ये चक्र चल क्यों रहा है? || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2021)
जन्म-मरण का चक्र क्यों है? इसका अर्थ यही नहीं है कि शिष्य बस इतना ही पूछना चाहता है कि कोई जन्मता क्यों है, कोई मरता क्यों है, चक्र क्यों चल रहा है। वो वास्तव में सबकुछ पूछ रहा है, सबकुछ। अब ये पढ़ने वाले की बुद्धि पर है कि वो इस बात को समझ जाए कि इतना ही नहीं पूछा गया है कि जन्म-मरण का चक्र क्यों है।
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आंसू अगर सच्चे हैं तो भीतर आनंद ही आनंद है
अगर आँसू सच्चे हैं तो उनका संबंध उत्सव और आनंद से है, उनका संबंध जाते हुए दुःख से है। आँसुओं के अर्थ ये नहीं है कि तुम दुखी हो, आँसुओं का अर्थ भी हो सकता है कि तुम आनंदित हो। मुक्त अनुभव कर रहे हो, भीतर की जकड़ को छोड़ने के लिए।
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रक्षा बंधन पर आचार्य प्रशांत का संदेश
\"रक्षाबंधन एक स्मरण हो सकता है कि हम सब मिलकर उस विवेक, उस करुणा की रक्षा करें जो जीवन को जीवन बनाती है। यह पर्व केवल उपहारों का आदान-प्रदान न रह जाए, बल्कि यह एक ऐसा संकल्प बन जाए जिसमें हम एक-दूसरे के आत्मबल और ऊंची चेतना के
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“माँसाहार गरीबों के लिए वरदान है क्योंकि माँसाहार के माध्यम से गरीबों को सस्ता प्रोटीन मिल जाता है।“ १ ग्राम प्रोटीन अगर आप मटन से लेते हैं तो लगते हैं ३ रुपये। उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप अंडे से लेते हैं तो लगते हैं १ रुपय ३० पैसे, उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप चिकन से लेते हैं तो लगता हैं १ रुपया।
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स्मोक टेस्ट हिन्दी लेख 16 अगस्त 2026
हिन्दी स्मोक टेस्ट लेख का संक्षिप्त विवरण।
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लोकमत न्यूज़ – "स्वतंत्रता दिवस: वास्तविक स्वतंत्रता क्या है
\"स्वतंत्रता कोई उपहार नहीं, बल्कि एक उपलब्धि है जिसे प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं अर्जित करना पड़ता है। राजनीतिक स्वतंत्रता हमें विरासत में मिल सकती है, किंतु मानसिक और आध्यात्मिक स्वतंत्रता के लिए सतत प्रयास
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शिव-शक्ति
नवरात्र का माहौल है। शक्ति के बारे में कुछ बातें करना प्रासंगिक रहेगा। शिव केंद्र हैं, शिव सत्य हैं। शिव वो हैं जिन तक मन, 'मन' रह कर नहीं पहुंच सकता। शिव को तो रहस्य रहना है सदा। शक्ति, मन है, संसार है। शिव में स्थिरता है, अचलता है।
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मेरे लिए यही है मेरा काम
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मेरे लिए यही है मेरा काम
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मेरे लिए यही है मेरा काम।

हर वीडियो, हर ब्लॉग एक चुम्बन है निरभ्र आकाश का अपनी धरा को।

इसीलिये बरसात चाहता हूँ। चंद बूँदों से मन नहीं भरता। हर नया पोस्टर, एक मत्त उच्छ्वास। देखो कि पृथ्वी के भाल पर अंकित हुआ तुम्हारा कोमल स्पर्श, और फिर निहारते रहो…

सोने का हक़
Poems
सोने का हक़
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मन शांत

सब के सोने पर मेरा एकांत

एक बार फिर वही आदिम नींद पलकों पर आए

एक बार फिर वही इच्छा मन पर छाए

कि सोऊँ ऐसे कि फिर जागूँ न जगाए ।

पर मेरा नीरव चैन जागृति की भेंट चढ़ जाना है

तुमने सदा सूरज और सुबह को…

क्या करेगी कविता
Poems
क्या करेगी कविता
1min
28reads

बेकार ही है

एक कविता से बहुत अपेक्षा करना।

पहले तो

बामुश्किल अस्तित्व में आएगी

आनंद पीड़ा के दुष्प्राप्य क्षणों से प्रजात

इस पल से निकला अनंत का टुकड़ा अज्ञात

अकुलायेगी, बेचैन…

आहिस्ता से उभर आएगी।

तपते युद्धरत दिवस का सांध्य-विश्राम

परिचितों की भीड़ में एक अपरिचित अनाम

कभी एक…

पूर्व संध्या पर
Poems
पूर्व संध्या पर
1min
18reads

मैं बड़ी लगन से

जतन कर रहा हूँ

खूब छुप-छुप के,

इसीलिए अब

कविता काफी कम लिखता हूँ ।

मैं पैने कर रहा हूँ

चुपके से

अपने हथियार

तुम्हारे ही बीच रह कर

रंग-बिरंगा वेश पहन कर

हूँ तुम में से एक

(अभी)

सतर्क हूँ मैं

खुद को भी नहीं…

मेरा ऑफ़िस और चाँद
Poems
मेरा ऑफ़िस और चाँद
1min
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मेरे ऑफ़िस में रोशनी खूब है

सफ़ेद,

जैसे चाँद की होती है ।

कई चाँद निकले रहते हैं दिन में भी,

हमारी आज्ञा पर।

आँखें जलती हैं।

और मज़े की बात तो यह है कि

दरवाज़ों और खिडकियों के काले शीशों से बाहर देखो

तो लगता है कि

चाँद निकला…

शहर पर व्यर्थ चाँद
Poems
शहर पर व्यर्थ चाँद
2min
13reads

यहाँ विशुद्ध अंधकार भी तो नहीं है ।

गौर से देखो तो मालूम पड़ता है

कि- हाँ कुछ चीज़ें हैं, यहाँ आसपास ।

दिखाई बस इतना पड़ता है

कि और दिखाई देने की व्यग्रता

या इतना दिखाई पड़ जाने का अवसाद

तुम्हें लिखने पर विवश कर दे ।

देखते रहो…

अल्पसंख्यक
Poems
अल्पसंख्यक
2min
11reads

मुश्किल है

खाने की मेज़ पर, बस के अन्दर

या बस टहलते हुए

बतियाना

दिशाओं से फूट-फूट पड़ते

अंधेरों की चर्चा में

आँख यूँ चमकाना

जैसे

हमने (बस तुमने और मैंने)

इन्हें अभी-अभी पकड़ा हो ।

कभी मायूस होना

और चर्चा को गंभीरता के साथ

मौका देना

आपसी निगाहों को…

सोता सपना
Poems
सोता सपना
1min
35reads

आज

तुम सोती हो

यहाँ मेरे सामने

मैं

तुम्हें बहुत ध्यान से देख रहा हूँ

तुम जानोगी भी नहीं

कि

तुम्हारी आँखों में नींद है

और मेरी आँखों में

तुम्हारे लिए

सपने ।

आज

बुरा होकर भी

बहुत अच्छा है

क्योंकि

कल आज में ही तो छुपा है ।

मैं…

देव अब छोड़ दो मुझको
Poems
देव अब छोड़ दो मुझको
2min
43reads

कब तक घिसटूँ

ढ़ोते हुए

अपने मस्तक पर

बोझ तुम्हारे पाँवों का

(तुम्हारे चरण तो मेरा उद्धार करने वाले थे, है न?)

तुमने मुझे सहारा दिया,

पर मेरे पाँव काट कर

तुमने मुझे शब्द दिए

पर उनके अर्थ छीन कर

तुमने मुझे रास्ता दिखाया

पर उस रास्ते में कांटे भी…

विजयादशमी के बैरियर का डंडा
Poems
विजयादशमी के बैरियर का डंडा
2min
16reads

विजयादशमी का डंडा

हर साल संभालता है

अनगिनत शरीरों को।

विजयादशमी का डंडा बनाये रखता है भीड़ का प्रवाह

बस एक ही दिशा में

वह पूरा ध्यान रखता है

छिटक न जाए एक भी श्रद्धालु

दाएँ या बाएँ।

विजयादशमी का डंडा

मैला हो चुका है

इतना हाथों के स्पर्श से…

रात, शहर और मैं
Poems
रात, शहर और मैं
2min
33reads

आकाश,

टुकड़ों में मेघाच्छन्न है

या तो पूरी तरह

या बिल्कुल नहीं।

खुले आकाश का सबसे चमकदार सितारा

मेघों को दूर से निहारता है

जैसे पड़ोस का बच्चा मुझको-

भय, संदेह से व्याकुल आँखों से,

कुछ दूरी पर खड़े रहकर।

आषाढ़ के काले बादलों का छोर

बस उनके पीछे चमकती…

मैंने पूछा
Poems
मैंने पूछा
1min
16reads

मैंने पूछा डूबते हुए सूरज से

तुम्हें देख वह पक्षी क्यों घर लौटता है ?

मैंने पूछा उड़ते हुए पक्षी से

क्यों तुम व्यर्थ गगन गुंजाते हो?

मैंने पूछा विस्तृत श्याम गगन से

क्यों तुम मेघों के पीछे मुँह छुपाते हो ?

पूछा मैंने मेघों से

क्यों तुम धरती पर…

अकेला
Poems
अकेला
1min
23reads

दिए का हवाओं से जूझना

प्रेरणास्पद लगा,

मुझे भी, तुम्हें भी ।

चींटी का अथक परिश्रम,

मन भाया,

मेरे भी, तुम्हारे भी ।

तिनके का डूबते को सहारा देना,

हौसला बँधा गया,

मेरा भी, तुम्हारा भी ।

इतिहास के पन्नों पर छपी,

संघर्षों की गौरवशाली गाथाएँ,

पिघला गईं,

मुझे भी,…

छवि तुम्हारी
Poems
छवि तुम्हारी
1min
18reads

मुझ से तुम्हारा परिचय,

सिमट कर रह गया

बस एक क्षण तक का,

और बसी है मेरी आँखों में,

बस उसी क्षण की,

एक,

छवि तुम्हारी ।

और,

संतुष्ट हूँ मैं।

उस एक क्षण से

आगे जाना भी नहीं चाहता

क्योंकि डरता हूँ

आगे जाने में

छिन न जाए मुझ…

आशा में
Poems
आशा में
1min
10reads

वह

हँसने की चाह में कितना रोता है

वह

समझता है कि

हँसा जा सकता है

हर बात पर और हमेशा

कुछ यही बात

समझाता है

वह सब को

लोग नहीं समझते

पर वह

समझाता रहता है

तब तक

जब तक

या तो लोग हँस नहीं देते

या

वह

वह…

स्नेहाकांक्षी
Poems
स्नेहाकांक्षी
2min
10reads

तुम प्रणाम करते हो

उसे रोज़ सवेरे

सर झुका कर

क्योंकि

डर है तुम्हें

झुलसा न दे तुम्हें वह कहीं।

तुम्हारा प्यारा चन्द्रमा

हो जाता है अदृश्य,

तारे अस्तित्वहीन

उस के समक्ष ।

फिर भी

वह तुम्हें कुछ भला नहीं लगता

क्योंकि

तेज बहुत है उस में

और

दोपहर को…

दार्शनिकता
Poems
दार्शनिकता
1min
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जाड़े की सुबह को,

बैठा हूँ मैं बाहर धूप में,

जब एक भूरा कुत्ता और काला कौवा

आकर कुछ इस तरह बैठ जाते हैं-

मेरे ठीक सामने तो नहीं-

पर किसी कोण से लगातार दिखाई देते रहते हैं।

भूरा कुत्ता बहुत कुछ सड़क पर पड़ी

गंदगी जैसा लगता है-

जिसे…

वह रात
Poems
वह रात
2min
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बस यूँ ही अनायास,

उदासी सी छा गयी थी,

सूरज के डूबने के साथ ही,

और मैं – मुरझाया, उदास

देखता था गहरा रही रात को

तारों की उभर रही जमात को ।

प्रत्येक पल युग सा प्रतीत होता था,

परितः मेरे सारा जग सोता था,

पर मैं, यूँ ही…

इंसान
Poems
इंसान
1min
30reads

इंसान,

लगता है बहुत आक्रामक होते जा रहे हो तुम,

गिद्ध सी तुम्हारी पैनी नज़र

तेंदुए सा तुम्हारा हमला,

सिंह सा प्रहार,

अपराजेय तुम,

शक्तिशाली, सामर्थ्यवान ।

सिद्धांत?

मात्र दो :

सफलता का कारक बहुधा अविश्लेषित रहता है।

प्रहार करे जो प्रथम, सफल भी बहुधा वही रहता है।

अतः हे…

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प्रश्नकर्ता: अभी आप कह रहे थे कि श्रीकृष्ण अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं और बाकी सब लोग अपने बारे में बोले जा रहे हैं। तो क्या इसका सम्बन्ध इससे है कि श्रीकृष्ण का कर्मफल और प्रारब्ध कट चुका है लेकिन बाकी सभी का कर्मफल और प्रारब्ध अभी जारी…

एक अध्याय अर्जुन का, सत्रह अध्याय कृष्ण के || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Bhagavad Gita
एक अध्याय अर्जुन का, सत्रह अध्याय कृष्ण के || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
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कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।

धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥

"कुल के नाश से, चले आ रहे कुल के धर्म नष्ट हो जाते हैं और कुलधर्म के नष्ट होने से पाप समस्त कुल को दबा लेता है।"

~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ४०

आचार्य प्रशांत तो अर्जुन के…

हमारे जीवन के युद्ध और कृष्ण की समीपता || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Bhagavad Gita
हमारे जीवन के युद्ध और कृष्ण की समीपता || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
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आचार्य प्रशांत: श्रीकृष्ण की निकटता सीखनी है अर्जुन से; अर्जुन के भीतर का कोहरा उधार नहीं ले लेना है। और हमारी हालत ज़बरदस्त है, हमारे पास वो सब कुछ है जो अर्जुन के पास है, बस एक चीज़ नहीं है। हम हर मायने में अर्जुन हैं, अर्जुन का पूरा नर्क…

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