वह
हँसने की चाह में कितना रोता है
वह
समझता है कि
हँसा जा सकता है
हर बात पर और हमेशा
कुछ यही बात
समझाता है
वह सब को
लोग नहीं समझते
पर वह
वह
हँसने की चाह में कितना रोता है
वह
समझता है कि
हँसा जा सकता है
हर बात पर और हमेशा
कुछ यही बात
समझाता है
वह सब को
लोग नहीं समझते
पर वह
तब तक
जब तक
या तो लोग हँस नहीं देते
या
वह
वह रो नहीं पड़ता
फूट-फूट कर रोता है
सब के न हँसने पर
पर फिर
चुप हो जाता है
क्योंकि
उसे हँसना जो है ।
~ प्रशान्त (जून १२, १९९६)</p

एक बार फिर,
हाँ, फिर से एक बार,
नफरत हो गई है
अपनी कल्पनाओं से,
उन्मुक्त उड़ने, स्वच्छन्द सोचने वाले हृदय को
सीना फाड़ कर निकलने
और सामनें रख कर,
उस की उद्दंडता के लिए
उस के टुकड़े कर देने
की इच्छा है एक बार फिर
(पर क्या यह काम…


जो कुछ लिखा तूने, उसे मिट के मिटा
जो पास है तेरे, उसे खुद से बचा
जो बोया है तूने, उसे जड़ से हटा
जो बोया नहीं तूने, उसे अपना खून पिला
जो कमाया नहीं तूने, उसे कभी न गँवा
जो याद…