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The UGC regulations are only a spark. The explosive material is something far more intimate: the unexamined conviction, lodged in the deepest chamber of the collective psyche, that birth determines worth and that this determination carries divine sanction. The atmosphere itself is the disease; the regulation is at best a painkiller. India’s foundational scriptures contain the strongest possible arguments against caste. The Upanishadic view begins where hierarchy ends.

ग्रेटर नोएडा। जीबीयू में आयोजित एक कार्यक्रम में पहुंचे आचार्य प्रशांत ने कहा कि महाशिवरात्रि केवल अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि यह मनुष्य को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि शिव को केवल मूर्ति या रूप में सीमित कर देना उनकी व्यापकता को संकुचित करना…


प्रश्नकर्ता: पिछली बार चंडीगढ़ तरफ़ से आया था जी,। आप से जुड़ा था। तबजब मैं अकेला आया था, बिलकुल हताश, परेशान था। आज मेरीमेरे साथ श्रीमती जी भी आईं हैं। मेरा प्रश्न यह है जी, जैसे संतों ने कहा है—
प्रेम-गली अति सांकरी, तामे दो न समाहिं। जब मैं था…

आचार्य प्रशांत: पूछा है कि, "कबीर साहब कह गए हैं कि;
कोटि नाम संसार में, तासे मुक्ति ना होए। आदि नाम जो गुप्त है, बूझे बिरला कोए।। ~कबीर साहब
तो इसमें किस नाम की बात हो रही है? फिर आगे कहते हैं कि ऐसे ही तुलसीदास कह गए हैं कि…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी को प्रणाम। आचार्य जी, कबीर दास जी कहते हैं , "लूट सको तो लूट लो, राम नाम की लूट। पाछे फिर पछताओगे, प्राण जाएँ जब छूट।" तो राम नाम की लूट से क्या आशय है? कृपया प्रकाश डालें और प्रणाम स्वीकार करें।
आचार्य प्रशांत: कपिल (प्रश्नकर्ता), जीवन…

प्रश्नकर्ता: सर, कोई आदमी कब सुसाइड (आत्महत्या) करने के बारे में सोचने लगता है? हम लोगों के दिमाग में तो आता भी नहीं है यह ख़याल।
आचार्य प्रशांत: यह किसके दिमाग में आया अभी-अभी?
प्र: कुछ लोग मर जाते हैं सुसाइड करके, क्यों?
आचार्य: बेटा, हर आदमी लगातार दुःख से…

खसम उलटि बेटा भया, माता मिहरी होय।
मूरख मन समुझै नहीं, बड़ा अचम्भा होय।।
~ कबीर साहब
आचार्य प्रशांत: कर्म, कर्म का केंद्र, कर्म का स्वामी, कर्मफल—समझेंगे इनको।
खसम उलटि बेटा भया
'खसम' का अर्थ हुआ जिसको तुमने स्वामी का स्थान दिया, और 'बेटा' हुआ स्वामी को स्वामित्व देने का…

कहता हूँ कहि जात हूँ, कहा जु मान हमार।
गल तुम काटि हो, सो फिर काटि तुम्हार।।
~ संत कबीर
आचार्य प्रशांत: कबीर जो भी कहें, उसमें शब्द भले ही हमारी भाषा के हों, वस्तुएँ भले ही हमारी ज़िंदगी की हों, सारे प्रतीक, सारी उपमाएँ हमारे ही संसार के हों,…

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर। ।
~गुरु कबीर
प्रश्न: आचार्य जी, प्रणाम। कृपया गुरु कबीर की इन पंक्तियों का आशय स्पष्ट करें।
आचार्य प्रशांत जी:
एक ही है जो बड़ा है, जो वृहद है, उसे ‘ब्रह्म’ कहते हैं। उसके…

प्रश्न: आचार्य जी, नमन।
कबीर दास जी का एक दोहा है –
सभी कर्म हमारो किया, हम कर्मण ते न्यारे हो
कृपया आशय स्पष्ट करें ।
आचार्य प्रशांत जी: ये कबीरों की, संतों की अपनी आंतरिक स्थिति है, अपनी कहावत है। कह रहे हैं, “ऊपर-ऊपर से प्रतीत होता है कि…

प्रश्न:
कबिरा यह मन लालची, समझे नहीं गंवार।भजन करन को आलसी, खाने को तैयार।।
~ गुरु कबीर
आचार्य जी, मेरा मन तो खाने के साथ-साथ वस्त्रों आदि की ओर भी बहुत आकर्षित रहता है । वस्त्र खरीदती भी बहुत हूँ, पर कभी तृप्त नहीं होती । कृपया मार्गदर्शन करें…

चकमक पत्थर रहे एक संगा, नहीं उठे चिंगारी।
बिनु दया संयोग गुरु बिनु, होत नहीं उजियारी।।
~ संत कबीर साहिब
आचार्य प्रशांत: चकमक पत्थर। चकमक कौन-सा पत्थर होता है?
श्रोता: आग जलाने के काम आता है।
आचार्य प्रशांत: ठीक है!
चकमक पत्थर रहे एक संगा।
अकेला है वो। वो कह…

लकड़ी जल डूबे नहीं, कहो कहाँ की प्रीति।
अपनी सीची जानि के, यहीं बड़ने की रीति।।
~ गुरु कबीर
आचार्य प्रशांत: “लकड़ी जल डूबे नहीं, कहो कहाँ की प्रीति” — सवाल उठा रहे हैं कबीर, यह कौन सा प्रेम है, यह किसका प्रेम है, क्या प्रकार है इसका कि एक…

*साधो भाई जीवत ही करो आसा।***
*जीवत समझे, जीवत बुझे,* *जीवत मुक्तिनिवासा।*
*जीवत करम की फाँस न कटी,* *मुये मुक्ति की आसा।*
*तन छूटे, जिव मिलन कहत है,* *सो सब झूठी आसा।*
*अबहूँ मिला तो…

गगन दमदमा बाजिया, पड़ेया निसानी घाव।खेत बुहारया सूरमा, मुझे मरण का चाव।।
~ कबीर
आचार्य प्रशांत: जब कबीर गगन की, आकाश की बात करते हैं, तो उनका आश्य होता है मन का आकाश, चिदाकाश। वो बात कर रहें हैं कि जो आपका आतंरिक आकाश है, वहाँ पर ध्वनि हो…

जो तू चाहे मुक्त को, छोड़ दे सब आस|
मुक्त जैसा ही हो रहे, सब कुछ तेरे पास||
~ कबीर
आचार्य प्रशांत: तो अनु पूँछा है कि ‘मुक्त जैसा ही’ माने क्या? ये बड़ी सुंदर विधि है, जो कबीर ने बताई है और इस विधि का बहुत सारी परम्पराओं में…

सुख सागर का शील है, कोई न पावै थाह।
सुख सागर का शील है, कोई न पावै थाह।
शब्द बिना साधू नहीं, द्रव्य बिना नहीं शाह।।
~कबीर
आचार्य जी: दो तरफा प्रयोजन है यहाँ पर कबीर का, शब्द से। एक तो गहरी परीक्षा साधू…

निन्दक तो है नाक बिन, सोहै नकटी माहि। साधुजन गुरुभक्त जो, तिनमे सोहै नाही॥
निन्दक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाय। बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥
~ गुरु कबीर
आचार्य प्रशांत: निंदक तो है नाक बिन। नाक से अर्थ है—मान, कीमत। उसकी अपनी कोई कीमत नहीं होती है। उसकी…

जाके जौन स्वाभाव, छूटे नहीं जीव सो,
नीम ना मीठी होय, सींचै गुड़ घीव सो।।
संत कबीर
प्रश्न: जब स्वभाव बदल ही नहीं सकता तो गुरु किसी मनुष्य को कैसे जगाने में सहायता कर सकता है?
आचार्य प्रशांत: यहाँ पर कबीर जिस स्वभाव की बात कर रहे हैं,…

उमरिया धोखे में खोये दियो रे पाँच बरस का भोला भला, बीस में जवान भयो। तीस बरस में माया के कारण, देश-विदेश गयो। उमर सब धोखे में… चालीस बरस अंत अब लागै, बाढ़ै मोह गयो। धन धाम पत्र के कारण, निस दिन सोच भयो।। बरस पचास कमर भई टेढ़ी, सोचत…

हाथ सुमरनी पेट कतरनी, पढ़त भागवत गीता ।
राम भजा सो जीता जग में, राम भजा सो जीता ।।
संत कबीर
वक्ता: पढ़ने में और भजने में क्या अंतर है?
श्रोता१: भजा तभी जा सकता है जब उस चीज़ को समझ सको।
श्रोता२: भजा मतलब एक पूरी मौजूदगी इन्वॉलव्ड है।…

कबिरा आप ठगाइये, और न ठगिए कोय|
आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुःख होय||
~संत कबीर
वक्ता: इसको समझने के लिए एक दोहा और लिखिए इसके साथ:
माया तो ठगनी भयी, ठगत फिरत सब देश|
जा ठग ने ठगनी ठगी, ता ठग को आदेश||
मुक्ति सर्व आयामी और…

दुःख में सुमिरन सब करै, सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करै, तो दुःख काहे को होय।।
संत कबीर
प्रश्न: आपने कई बार कहा है कि सुख, दुःख अलग-अलग नहीं, पर यहाँ पर कबीरदास कहते हैं कि सुख के क्षणों में याद करने से दुःख से…

आशा तो गुरुदेव की, दूजी आस निरास।
पानी में घर मीन का, क्यों मरे पियास।।
कबीर
वक्ता: मुदित जी का सवाल है कि, अष्टावक्र जैसे ज्ञानियों ने कहा है कि आशा ही परमम दुखम। और दूसरी ओर कबीर कह रहे हैं कि आशा तो गुरुदेव की, दूजी आस नीरास। ये…

कबीरा जब पैदा हुए तो जग हँसा हम रोये
ऐसी करनी कर चलो कि हम हँसे जग रोये
सात जन्म के सात फेर हैं
साँप सीढ़ी है भाई
जम का दंड मुंड पे लागे
धरी रहे चतुराई
कबीरा जब पैदा हुए तो जग हँसा हम रोये
ऐसी करनी कर चलो…

सन्त पुरुष की आरसी, सन्तों की ही देह|
लखा जो चाहे अलख को, उन्हीं में लख लेह||
~संत कबीर
वक्ता: संत कौन है? संत पुरुष की आरसी, सन्तों की ही देह, लखा जो चाहे अलख को, उन्हीं में लख जे लेह| संत कौन है? संत वो है जिसने अपनी हर…

वक्ता: दो बातें हैं। पहली, योग है। दूसरी, अनंत समय है।
“युगन युगन हम योगी।” और ये दोनों ही बातें जब एक साथ कह दी जाती हैं, तो पूर्ण कह दिया जाता है। योग का अर्थ है: केंद्र। ‘अनंत समय’ का अर्थ है: उस केंद्र से फैला हुआ पूरा विस्तार।…

जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ। मैं बपुरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ।।
~ संत कबीर
प्रश्नकर्ता: इस दोहे को जब मैं अपने जीवन के सन्दर्भ में देखती हूँ तो पाती हूँ कि मेरे सारे प्रयत्न, जवाबों को ढूँढने की राह में कम ही पड़ते हैंI अपने प्रयासों को…

वक्ता: एक तरफ़ तो ये कहा गया है कि प्राप्ति, उपलब्धि तत्क्षण है। जो समयातीत है, उसे समय का उपयोग करके नहीं पाया जा सकता। भविष्य में आगे देखना, कल्पना करना कि, ‘’किसी मार्ग के द्वारा, किसी विधि के द्वारा मैं शान्ति को, मुक्ति को पाउँगा, ये सिर्फ़ आपकी…

बिरहिन ओदी लाकड़ी, सकुचे और धुन्धाये ।छुटी पड़ी यह बिरह से, जो सगरी जली जाये ।।
~ संत कबीर
वक्ता: नियति तो उसकी जलना ही है। और नहीं जलेगी तो इतना ही करेगी कि, खूब धुआं देगी। कोई रोशनी नहीं, कोई ऊष्मा नहीं, सिर्फ़ धुआं। गंदगी फैलाएगी। जलेगी,…

साधु गाँठ न बाँधई, उदर समाता लेय ।
आगे पाछे हरि खड़े, जब माँगे तब देय ।।
~संत कबीर
वक्ता: साधु बस उतना ही लेगा जितना उसके उदर में समा जाए, बस उतना ही लेगा। उदर अर्थ सिर्फ़ भूख नहीं और कुछ भी होगा। गाँठ नहीं बांधेगा, आगे पीछे…

“श्रम से सब कुछ होत है,बिन श्रम मिले कुछ नाहीं।
सीधे उंगली घी जमो,कबसू निकसे नाहीं।“
~ संत कबीर
वक्ता: कबीर हैं।
सवाल यह है कि कबीर श्रम की महत्ता पर इतना ज़ोर दे रहें हैं, और आपने बार-बार कहा है कि श्रम की कोई कीमत…

कबीर क्षुधा कूकरी, करे भजन में भंग
वाकूं टुकड़ा डारि के, सुमिरन करूँ सुरंग
~ संत कबीर
प्रश्न:मैं खा रहा हूँ या शरीर अपना काम कर रहा है?
वक्ता:संवेदनशीलता का अर्थ ही यह है कि ‘मैं’ बीच में न आए। जहाँ ‘मैं’ बीच में आ जाता…

ऐसी वाणी बोलिये, मन का आपा खोय। औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय।।
~ संत कबीर
आचार्य प्रशांत: बड़ी ग़लती कर देते हैं हम, हमें लगता है कबीर कह रहे हैं - ऐसी वाणी बोलिये जिससे मन का आपा खो जाए, नहीं। कबीर कह रहे हैं - ऐसी वाणी…

धरती फाटे, मेघ मिलै, कपडा फाटे डौर,
तन फाटे को औषधि, मन फाटे नहिं ठौर।
~ संत कबीर
वक्ता: धरती फट गई हो, ऐसा ताप पड़ा हो कोई वर्षा न हुई हो और धरती फट उठी हो। तो इलाज संभव है। मेघ आएगा और सींच देगा। फटी धरती दुबारा नम…

सोना, सज्जन, साधुजन, टूट जुड़े सौ बार
दुर्जन कुम्भ कुम्हार के, एकै धक्का दरार
~ संत कबीर
वक्ता: क्या है टूटना? और जुड़ना क्या है? एक टूटना-जुड़ना तो वो होता है, जो हम लगातार अनुभव करते ही रहे हैं और दुनिया में भी रोज़ होता देखते हैं। मन कहीं जाकर…

सोया साधु जगाइए, करे नाम का जाप ये तीनो सोते भले, साकट सिंह और साँप
-संत कबीर
आचार्य प्रशांत: आध्यात्मिकता के प्राथमिक सूत्रों में ही यह है कि संत जो भी कहे, उस बात को संसार का नहीं मन का जानो, भले ही उसमें जो दृष्टांत दिया गया हो, वो…

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर।
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर॥
– कबीर
वक्ता: मन से ज्यादा कहीं पहुँचने को कोई आतुर नहीं होता और मन से ज्यादा पहुँचने से कोई डरता नहीं है। बड़ी गहरी बेचैनी रहती है मन की, कि किसी…

राम बिनु तन को ताप न जाई
जल में अगन रही अधिकाई
राम बिनु तन को ताप न जाई
तुम जलनिधि में जलकर मीना
जल में रहि जलहि बिनु जीना
राम बिनु तन को ताप न जाई
तुम पिंजरा मैं सुवना तोरा
दरसन देहु भाग बड़ मोरा
राम बिनु तन…

पंडित और मशालची, दोनों सूझत नांहि
औरन को करै चांदना, आप अँधेरे मांहि
संत कबीर
वक्ता: चिराग की रोशनी तो फिर भी उसकी अपनी है, यहाँ तो मशाल पकड़ी हुई है, जो तुम्हारा हिस्सा भी नहीं। तुम मशाल नहीं हो, तुमने तो मशाल उठा ली है बस,…

अवधूता गगन घटा गहरानी रे।।
पच्छम दिसा से उलटी बादली, रुमझुम बरसे मेहा,
उठो ज्ञानी खेत संभारो, बह निसरेगा पानी।।१।।
निरत सूरत के बेल बनावो, बीजा बोवो निज धानी,
दुबध्या डूब जन्म नहीं पावे, बोवो नाम की धानी।।२।।
चारों कोनें चार रखवाले, चुग न जावे मृग धानी,
काटया खेत मींड़ा…

सौ बरसा भक्ति करे, एक दिन पूजे आन ।
सौ अपराधी आत्मा, पड़े चौरासी खान ।।
~संत कबीर
वक्ता: सौ साल की भक्ति के बाद अगर एक दिन फिसल गए, तो उस एक दिन के फिसलने से ये तय है कि वो सौ साल में जो कर…

गुरु नारायन रूप है, गुरु ज्ञान को घाट। सतगुरु बचन प्रताप सों, मन के मिटे उचाट।। ~ संत कबीर
प्रश्नकर्ता: सर, हम छात्रों को जवाब देते हैं, तो मौका मिल रहा है, आप जैसा बनने का। मन में बड़ी हलचल सी मची है इस बात को लेकर, कुछ कहें।
आचार्य…

शून्य मरे, अजपा मरे, अनहद हूँ मरी जाय।
राम सनेही ना मरे, कहे कबीर समझाय।।
~ संत कबीर
वक्ता: ‘चंदा मरे है, सूरज मरे है’, बात कल्पना से थोड़ी आगे की है। खींचती है कल्पना को, आमतौर पर हम कभी ऐसा सोचते नहीं कि दुनिया ऐसी भी हो,…

नाहं देहो न मे देहो, जीवो नाहमहं हि चित्।
अयमेव हि मे बन्ध् आसीध्या जीविते स्पृहा।।
–अष्टावक्र गीता
वक्ता: यदि देह हूँ मैं, तो जन्म हुआ है मेरा, यदि जन्म हुआ है मेरा तो एक ही मंज़िल है मेरी, मौत। यदि देह हूँ मैं, तो जीवन…

नारि पुरुष की इसतरी, पुरुष नारि का पूत।
याही ज्ञान विचारि के, छाडि चले अवधूत।।
~ संत कबीर
वक्ता: अवधूत शब्द ही गहरा है; अव-धूत: जिसके मन से धूल, धुंआ पूरी तरह साफ़ हो गया, वो अवधूत। क्या दिखता है अवधूत को अपने साफ़ मन…

मन मते माया तजि, यूँ करे निकस बहार।
लागी रही जानी नहीं, भटकी भयो खुआर।।
संत कबीर
आचार्य प्रशांत: मन ने बड़ी होशियारी दिखाई, मन ने कहा माया तज दो, माया के नाम पर क्या तज दिया?
माया के नाम पर लोग क्या तजते हैं? ये खाऊंगा नहीं, ये पहनूंगा…