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Duality

श्रध्दा है समाधान || (2018)
Duality
श्रध्दा है समाधान || (2018)
12min
22reads
1

यत्राज्ञानाद्भवेद्दवैतमितरस्तत्र पश्यति। आत्मत्वेन यदा सर्वं नेतरस्तत्र चाण्वपि।।

“जहाँ अज्ञान से द्वैत-भाव होता है, वहीं कोई और दिखलाई देता है। जब सब आत्मरूप ही दिखाई देता है, तब अन्य कुछ भी नहीं रहता।”

~अपरोक्षानुभूति (श्लोक ५३)

यस्मिन्सर्वाणि भूतानि ह्यात्मत्वेन विजानतः। न वै तस्य भवेन्मोहो न च शोकोऽद्वितीयतः।।

“उस अवस्था में सम्पूर्ण…

सारा संसार कहाँ से आया? कहाँ को जा रहा है? || (2021)
Duality
सारा संसार कहाँ से आया? कहाँ को जा रहा है? || (2021)
21min
33reads

आचार्य प्रशांत: हम एक भूत, माने एक पदार्थ की उत्पत्ति का कारण सदा दूसरे पदार्थ को मानते हैं और बात निपटा देते हैं। भूत माने मैटेरियल, भौतिक पदार्थ। जब आप एक भूत की उत्पत्ति का कारण दूसरे भूत को मानते हो और दूसरे की उत्पत्ति की वजह तीसरे को…

न अच्छा न बुरा है संसार, समझ गए तो रास्ता, न समझे तो दीवार || (2020)
Clarity
न अच्छा न बुरा है संसार, समझ गए तो रास्ता, न समझे तो दीवार || (2020)
13min
68reads

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने बताया है कि सब सांसारिक विषय मूल में एक ही हैं, बस रूप अलग-अलग हैं। जैसे ख़राब दूध से बनी सभी मिठाइयाँ ख़राब ही होंगी। चाहे रसगुल्ला खाओ, बर्फी खाओ, रसमलाई खाओ सब गंधाएँगी और पेट ख़राब करेंगी। आचार्य जी, कृपया बताएँ कि इस संसार में…

समूची प्रकृति की इच्छा
Duality
समूची प्रकृति की इच्छा
13min
18reads

प्रश्नकर्ता: प्रकृति हमारे प्रति इतनी बेरहम और असम्वेदनशील क्यों होती है?

आचार्य प्रशांत: प्रकृति ने ऐसा क्या किया भाई? तुम प्रकृति ही हो, तुम प्रकृति के वो विशिष्ट उत्पाद हो जिसके माध्यम से स्वयं प्रकृति निर्वाण खोज रही है। मैं बार-बार कहता हूँ न कि तुम अहंकार हो; अहंकार कोई…

सामान लौटाओ, चैन से सोओ
Duality
सामान लौटाओ, चैन से सोओ
21min
18reads

आचार्य प्रशांत: कोई ऐसा नहीं है जो समाप्त हो जाना चाहता हो। बड़ी अजीब बात है ये; कोई आयु हो, कोई वर्ण हो, कोई रंग हो, कोई लिंग हो, कोई देश हो, कोई काल हो - जैसे हम सब के भीतर बने रहने की एक निरंतर अभीप्सा रहती है। कोई…

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कर्म और अतीत से मुक्ति कैसे मिले ?
इन सब से मुक्ति का एक ही तरीका है, वो बचो ही नहीं जो मूर्ख जाकर के दुनिया से, जगत से, प्रकृति से कामना पूर्ति की आशा रखता था, वो बचो ही नहीं। उसके अलावा और तुम कितने भी हथकंडे लगा लो, अतीत तो लौट-लौट के बार-बार आएगा और सर पर चढ़ेगा ही चढ़ेगा।
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Why do I restless
Hindi article on restlessness by AP
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स्मोक टेस्ट हिन्दी लेख 16 अगस्त 2026
हिन्दी स्मोक टेस्ट लेख का संक्षिप्त विवरण।
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Who controls your mood?
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What does love mean?
You must know what is love. How it shapes your life.
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NDTV Column hindi
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आंसू अगर सच्चे हैं तो भीतर आनंद ही आनंद है
अगर आँसू सच्चे हैं तो उनका संबंध उत्सव और आनंद से है, उनका संबंध जाते हुए दुःख से है। आँसुओं के अर्थ ये नहीं है कि तुम दुखी हो, आँसुओं का अर्थ भी हो सकता है कि तुम आनंदित हो। मुक्त अनुभव कर रहे हो, भीतर की जकड़ को छोड़ने के लिए।
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जीवन-मरण का ये चक्र चल क्यों रहा है? || आचार्य प्रशांत, वेदांत पर (2021)
जन्म-मरण का चक्र क्यों है? इसका अर्थ यही नहीं है कि शिष्य बस इतना ही पूछना चाहता है कि कोई जन्मता क्यों है, कोई मरता क्यों है, चक्र क्यों चल रहा है। वो वास्तव में सबकुछ पूछ रहा है, सबकुछ। अब ये पढ़ने वाले की बुद्धि पर है कि वो इस बात को समझ जाए कि इतना ही नहीं पूछा गया है कि जन्म-मरण का चक्र क्यों है।
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लोकमत न्यूज़ – "स्वतंत्रता दिवस: वास्तविक स्वतंत्रता क्या है
\"स्वतंत्रता कोई उपहार नहीं, बल्कि एक उपलब्धि है जिसे प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं अर्जित करना पड़ता है। राजनीतिक स्वतंत्रता हमें विरासत में मिल सकती है, किंतु मानसिक और आध्यात्मिक स्वतंत्रता के लिए सतत प्रयास
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गुरु के प्रति धन्यवाद कम क्यों हो जाता है? आचार्य प्रशांत (2017)
अब देखिएगा, क्या हो रहा है। कोई कृतज्ञ कब अनुभव करेगा? जब पहले उसकी हालत ख़राब हो और कोई बचाए। आपके भीतर अभी यह इच्छा शेष है कि आप कृतज्ञ अनुभव करती रहें और कृतज्ञता अनुभव करने के लिए ज़रूरी है कि कुछ गड़बड़ हो और फिर उस गड़बड़ से आप उबार ली जाएँ। तो फिर आप कृतज्ञ अनुभव करेंगी कि, अरे, मेरा सौभाग्य कि मुझे किसी ने बचा लिया।
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राधा-कृष्ण में भी तो प्रेम था, तो आप हमारे प्रेम को सम्मान क्यों नहीं देते?
कृष्ण का खुद ऊँचा होना, कृष्ण के पूरे जीवनवृत्त में, उनकी ज़िंदगी की जो पूरी कहानी है उसमें और श्री कृष्ण की प्रेमकथा में एक सूत्र है जो साझा पिरोया हुआ है। गीता की ऊँचाई, कृष्ण के जीवन की ऊँचाई, और कृष्ण के प्रेम की ऊँचाई तीनों एक हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि कृष्ण बहुत ऊँचे हों और उनका प्रेम निचले तल का हो जाए। ये संभव नहीं है।
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Description enwcoiew fkwsc J. Krishnamurti.
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शिव-शक्ति
नवरात्र का माहौल है। शक्ति के बारे में कुछ बातें करना प्रासंगिक रहेगा। शिव केंद्र हैं, शिव सत्य हैं। शिव वो हैं जिन तक मन, 'मन' रह कर नहीं पहुंच सकता। शिव को तो रहस्य रहना है सदा। शक्ति, मन है, संसार है। शिव में स्थिरता है, अचलता है।
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रक्षा बंधन पर आचार्य प्रशांत का संदेश
\"रक्षाबंधन एक स्मरण हो सकता है कि हम सब मिलकर उस विवेक, उस करुणा की रक्षा करें जो जीवन को जीवन बनाती है। यह पर्व केवल उपहारों का आदान-प्रदान न रह जाए, बल्कि यह एक ऐसा संकल्प बन जाए जिसमें हम एक-दूसरे के आत्मबल और ऊंची चेतना के
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Why do I restless
This article is related to restlessness.
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“माँसाहार गरीबों के लिए वरदान है क्योंकि माँसाहार के माध्यम से गरीबों को सस्ता प्रोटीन मिल जाता है।“ १ ग्राम प्रोटीन अगर आप मटन से लेते हैं तो लगते हैं ३ रुपये। उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप अंडे से लेते हैं तो लगते हैं १ रुपय ३० पैसे, उतना ही प्रोटीन, १ ग्राम, अगर आप चिकन से लेते हैं तो लगता हैं १ रुपया।
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बाहरी घटनाएँ अन्दर तक हिला जाती हैं? || आचार्य प्रशांत (2019)
Duality
बाहरी घटनाएँ अन्दर तक हिला जाती हैं? || आचार्य प्रशांत (2019)
16min
18reads

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, समय बदल रहा है, और जिस क्षेत्र में मैं कार्यरत हूँ उस क्षेत्र में धीरे-धीरे मंदी आ रही है। मैं इस मंदी से आंतरिक रूप से बहुत ज़्यादा प्रभावित हुआ हूँ। कारणवश अब आर्थिक रूप से भी मैं बिल्कुल खाली हो गया हूँ, और इस प्रक्रिया में…

रिवॉल्वर बचाकर रखो, असली दुश्मन दूसरा है || आचार्य प्रशांत (2019)
Duality
रिवॉल्वर बचाकर रखो, असली दुश्मन दूसरा है || आचार्य प्रशांत (2019)
12min
15reads

प्रश्न: आचार्य जी, जीवन की छोटी-छोटी बातों में भी भ्रमित रहता हूँ कि क्या करना उचित है और क्या अनुचित।

आचार्य प्रशांत: एक फ़िल्म देखी थी मैंने। उसमें समझ ही में न आए कि नायक इतना पिट क्यों रहा है। पिक्चर का क्लाइमेक्स है, चरम पर पहुँच चुकी है। दुश्मनों…

जन्म-मृत्यु क्या हैं? || (2019)
Duality
जन्म-मृत्यु क्या हैं? || (2019)
7min
12reads

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मुझे ये जानना है कि – जन्म और मृत्यु की ये जो प्रक्रिया है, ये क्यों हो रही है? कोई आदमी जन्म ले रहा है, तो क्यों ले रहा है? और मर रहा है, तो क्यों मर रहा है? जो भी लोग बुद्धत्त्व को उपलब्ध हो…

अकेले रहना बेहतर है, या दूसरों के साथ? || आचार्य प्रशांत (2019)
Relationship
अकेले रहना बेहतर है, या दूसरों के साथ? || आचार्य प्रशांत (2019)
8min
32reads

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अकेले रहना बेहतर है, या दूसरों के साथ?

आचार्य प्रशांत: दोनों में कुछ पता चलता है। जब किसी के साथ हो, तो तुम्हें पता चलता है कि तुम्हारे मन की क्या दशा होती है जब कोई सामने आता है। परख हो जाती है न। नहीं तो तुम…

आत्मा और जगत का क्या सम्बन्ध है? || (2018)
Duality
आत्मा और जगत का क्या सम्बन्ध है? || (2018)
5min
62reads

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आत्मा सत्य है, शुद्ध चैतन्य है, यह हम सब जानते हैं। क्या यह जगत जिसे हम मिथ्या जानते हैं, यह भी सत्य है?

आचार्य प्रशांत: शरीर है, इसका काम है पचास चीज़ों का अनुभव करना। पूरा शरीर ही एक इन्द्रिय है, पूरा शरीर ही अपने आप में…

नयी दुनिया और पुराने तरीक़े || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2012)
Maturity
नयी दुनिया और पुराने तरीक़े || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2012)
33min
12reads

आचार्य प्रशांत: मैं आशा करता हूँ कि हम सभी को उत्कृष्टता की चाह है। यह मेरी कल्पना है, आशा है कि मैं गलत नहीं हूँ। क्या मैं गलत हूँ? हम में से कितने हैं, जो उत्कृष्टता नहीं चाहते?

देखिये, होता क्या है कि जिस तरीके से हम बड़े होते…

आँख खोल के देखो, दुनिया दूसरी हो जाएगी || आचार्य प्रशांत (2014)
Duality
आँख खोल के देखो, दुनिया दूसरी हो जाएगी || आचार्य प्रशांत (2014)
2min
17reads

आचार्य प्रशांत: कुंदन ने बात कही है एक कि अगर यह स्पष्ट ही दिखने लग जाए कि दुनिया कैसी है तो क्या इस दिखने के बाद दुनिया वैसी ही रह जाती है?

नहीं, बिलकुल भी नहीं!

क्योंकि दुनिया रूप और आकर से ज़्यादा नाम और धारणा है, एक बार आपकी…

जगते में जागे नहीं सोते नहीं सोए, वही जाने कृष्ण को दूजा न कोय ||आचार्य प्रशांत, श्रीकृष्ण पर (2015)
Bhagavad Gita
जगते में जागे नहीं सोते नहीं सोए, वही जाने कृष्ण को दूजा न कोय ||आचार्य प्रशांत, श्रीकृष्ण पर (2015)
15min
28reads

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।

यस्यां जाग्रति भूतानी सा निशा पश्यतो मुनेः।।

वो जो सबके लिए रात है, उसमें संयमी जागृत रहता है।

वह जिसमें सब जगे होते हैं, वह दृष्टा मुनि के लिए रात्री है।

आचार्य प्रशांत: भगवद्गीता के दूसरे अध्याय से…

अध्यात्म में ‘अन्दर’ और ‘बाहर’ से क्या आशय? || (2017)
Duality
अध्यात्म में ‘अन्दर’ और ‘बाहर’ से क्या आशय? || (2017)
8min
41reads

प्रश्नकर्ता: अध्यात्म में “अन्दर” और “बाहर” से क्या आशय होता है?

आचार्य प्रशांत: जो कुछ भी मन की पकड़ में आ सके वो बाहर है। जिस भी चीज़ के बारे में तुम सोच सको वो बाहर है। जिसको तुम अन्दर कहते हो उसके बारे में भी तुम सोच लेते हो…

माया माने क्या? || आचार्य प्रशांत (2014)
Duality
माया माने क्या? || आचार्य प्रशांत (2014)
13min
69reads

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम हर बार कहते रहते हैं कि सब माया है, ये माया है, वो माया है। जैसे मैं यहाँ पर हूँ, तो मैं अभी कैसे अंतर करूँगा कि ये एक साफ़ मन का निर्णय होना चाहिए, और ये एक प्राप्त और अधिकृत मन का निर्णय होना…

उमरिया धोखे में बीत गयो रे || (2017)
Saint Kabir
उमरिया धोखे में बीत गयो रे || (2017)
7min
35reads

उमरिया धोखे में खोये दियो रे पाँच बरस का भोला भला, बीस में जवान भयो। तीस बरस में माया के कारण, देश-विदेश गयो। उमर सब धोखे में… चालीस बरस अंत अब लागै, बाढ़ै मोह गयो। धन धाम पत्र के कारण, निस दिन सोच भयो।। बरस पचास कमर भई टेढ़ी, सोचत…

तुम दुनिया से भिन्न नहीं हो || आचार्य प्रशांत (2015)
Ego
तुम दुनिया से भिन्न नहीं हो || आचार्य प्रशांत (2015)
24min
25reads

प्रश्न: यहाँ तक तो ठीक है कि मैं जानूँ कि दुनिया कैसी है? मेरे भाई कैसे हैं? मेरा दोस्त कैसा है? मेरी संगति कैसी है? समाज कैसा है? यहाँ तक तो मेरा मन अनुमति देता है पर जब बात आती है अपने को भीतर से जानने की तब बहुत डर…

जो संसार से मिले सो समस्या; समस्या का साक्षित्व है समाधान
Ego
जो संसार से मिले सो समस्या; समस्या का साक्षित्व है समाधान
18min
53reads

श्रोता१: जो भी माइंड (मन) में थॉट्स (विचार) घूमते रहते हैं, वो तो हमेशा होते ही हैं।

वक्ता: हाँ, हाँ।

श्रोत१: लेकिन उनके बारे में सोचने लगता हूँ तो फ्रस्ट्रेशन अपने आप बढ़ती रहती है।

वक्ता: नहीं बढ़ेगा क्योंकि जिसको तुम फ्रस्ट्रेशन कह रहे हो ना, वो भी सिर्फ़ एक …

अपने करे संसार तो मिला नहीं, परमात्मा क्या मिलेगा || आचार्य प्रशांत (2014)
Duality
अपने करे संसार तो मिला नहीं, परमात्मा क्या मिलेगा || आचार्य प्रशांत (2014)
4min
11reads

वक्ता : आदमी का मन ऐसा है कि वो हमेशा कार्य-कारण में जीना चाहता है| अपने से बाहर की किसी सत्ता को किसी हाल में स्वीकार करना नहीं है| वो यह कहता है कि संसार में जो हो रहा है उसके कारण हैं ही, मुझे जो मिला या नहीं मिला,…

संसार के बीचोंबीच, संसार से मुक्त || आचार्य प्रशांत (2016)
Liberation
संसार के बीचोंबीच, संसार से मुक्त || आचार्य प्रशांत (2016)
11min
16reads

प्रश्न: सर, एक चीज़ मन में बैठ गयी थी। ओशो ने कहा है, बाज़ार में ही रहना है, पहाड़ों में नहीं। तो अपनेआप को सिद्ध करने की चाह थी कि अब तो बाज़ार में ही रह कर शांत रहेंगे। तो वहाँ पर अभी भी संघर्ष है, अपने को साबित…

तुम्हारे लिए जगत न मिथ्या है, न मिथ्या कहो || आचार्य प्रशांत (2014)
Ego
तुम्हारे लिए जगत न मिथ्या है, न मिथ्या कहो || आचार्य प्रशांत (2014)
5min
12reads

श्रोता:सर, कई बार एसा होता है कि ये जो बात है कि माइंड जो कुछ भी दिखा रहा है वो सब झूठ है, इसको माइंड नकार देता है। पर फिर बैठ के सोचते हैं तो इस दुनिया का कोई आधार भी समझ नहीं आता।

वक्ता:नहीं, ‘झूठा’ जो है…

तुम ही साधु, तुम ही शैतान || संत कबीर पर (2015)
Saint Kabir
तुम ही साधु, तुम ही शैतान || संत कबीर पर (2015)
8min
71reads

सोया साधु जगाइए, करे नाम का जाप ये तीनो सोते भले, साकट सिंह और साँप

-संत कबीर

आचार्य प्रशांत: आध्यात्मिकता के प्राथमिक सूत्रों में ही यह है कि संत जो भी कहे, उस बात को संसार का नहीं मन का जानो, भले ही उसमें जो दृष्टांत दिया गया हो, वो…

सच वो जो कभी छोड़ के न जाए, जो जा सकता उसकी बस चिंता सताए || आचार्य प्रशांत (2016)
Truth
सच वो जो कभी छोड़ के न जाए, जो जा सकता उसकी बस चिंता सताए || आचार्य प्रशांत (2016)
5min
15reads

आचार्य प्रशांत: समय को सच मानने का अर्थ है, उस सबको सच कह देना, जो समय में आया और समय में चला जाएगा। मतलब फिर यह जितने पदार्थ हैं, इन सबको सच कह देना। इसमें दिक़्क़त बस एक छोटी सी है कि यह कैसा असहाय सच है, जिसकी मौत हो…

न हुआ न हो रहा न होने के आसार,पर होता खूब प्रतीत होता ये संसार || आचार्य प्रशांत (2014)
Duality
न हुआ न हो रहा न होने के आसार,पर होता खूब प्रतीत होता ये संसार || आचार्य प्रशांत (2014)
14min
16reads

श्रोता: सर, जो भी होता है, कोई कारण या फिर किसी तरह का कोई तरीका है क्या? एक घटना का एक हिस्सा है जो पूर्वनिर्धारित है?

वक्ता: ये सब न एक हार्मोनी है जो स्वतः ही चल रही है। स्टैंडिंग वेव्स पढ़ीं थी ना क्लास 12 में?

दो हिस्से होते…

गगन घटा गहरानी रे || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
Saint Kabir
गगन घटा गहरानी रे || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
8min
17reads

अवधूता गगन घटा गहरानी रे।।

पच्छम दिसा से उलटी बादली, रुमझुम बरसे मेहा,

उठो ज्ञानी खेत संभारो, बह निसरेगा पानी।।१।।

निरत सूरत के बेल बनावो, बीजा बोवो निज धानी,

दुबध्या डूब जन्म नहीं पावे, बोवो नाम की धानी।।२।।

चारों कोनें चार रखवाले, चुग न जावे मृग धानी,

काटया खेत मींड़ा…

ज्ञान न अज्ञान, न सुख न दुःख || आचार्य प्रशांत, अष्टावक्र गीता पर (2014)
Ashtavakra Gita
ज्ञान न अज्ञान, न सुख न दुःख || आचार्य प्रशांत, अष्टावक्र गीता पर (2014)
6min
23reads

न विक्षेपो न चैकाग्रयं नातिबोधो नमूढता।

न सुखं न च वा दुःखं उपशान्तस्य योगिनः।।

~ अष्टावक्र गीता, श्लोक १०, अध्याय १८

(अर्थ: अपने स्वरुप में स्थित होकर शांत हुए तत्वज्ञानी के लिए न विक्षेप है और न एकाग्रता, न ज्ञान है और न अज्ञान, न सुख है और न दुःख)…

संसार बीतता देखकर भी संसार समझ नहीं आता? || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
Saint Kabir
संसार बीतता देखकर भी संसार समझ नहीं आता? || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
12min
44reads

कबिरा नौबत आपनी, दिन दस लेहु बजाय।

वह पुर पट्टन यह गली, बहुरि न देखौ आय।।

~ संत कबीर ~

वक्ता: जो तमाशा करना है दस दिन कर लो, यहाँ पर दोबारा नहीं आओगे। बार-बार कबीर हमें स्मरण कराते हैं ‘मौत’ का। ‘मौत’ कबीर के यहाँ बार-बार, बार-बार सुनने को…

न कैद की कसक, न मुक्ति की ठसक || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
Saint Kabir
न कैद की कसक, न मुक्ति की ठसक || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
10min
14reads

हद चले सो मानवा, बेहद चले सो साध।

हद बेहद दोनों तजे, ताका मता अगाध।।

~ संत कबीर ~

वक्ता: और ये आपने लिखा है:

हद टपे सो औलिया, बेहद टपे सो पीर।

हद बेहद दोनों टपे, ताका नाम कबीर।।

दोनों एक ही हैं। आदमी लगातार रहता है वर्जनाओं में,…

जब आँखें खुलती हैं तो दुनिया बदल जाती है || आचार्य प्रशांत (2014)
Duality
जब आँखें खुलती हैं तो दुनिया बदल जाती है || आचार्य प्रशांत (2014)
10min
13reads

वक्ता: प्रश्न है कि अगर ये स्पष्ट ही दिखने लग जाए कि दुनिया कैसी है, तो क्या इस दिखने के बाद दुनिया वैसी ही रह जाती है?

नहीं, बिलकुल भी नहीं, क्योंकि दुनिया रूप और आकर से ज़्यादा नाम और धारणा है। एक बार आपकी आँखें साफ़ हो गईं उसके…

दुनिया के साथ-साथ तुम भी मात्र विचार हो || आचार्य प्रशांत (2014)
Ego
दुनिया के साथ-साथ तुम भी मात्र विचार हो || आचार्य प्रशांत (2014)
9min
12reads

प्रश्न: विचार क्या हैं?

वक्ता:

विचार क्या हैं? सारी मानसिक गतिविधियाँ ही विचार हैं।

यह ही विचार की परिभाषा है। मन में जो हो रहा है, उसी का नाम विचार है।

श्रोता: सर, क्या सभी मानसिक गतिविधियाँ विचार हैं? जो शब्द आ रहे हैं वो भी?

वक्ता: हाँ बिलकुल, दुनिया…

जो भयानक है वो कुछ छीन नहीं सकता,जो आकर्षक है वो कुछ दे नहीं सकता || आचार्य प्रशांत (2015)
Fear
जो भयानक है वो कुछ छीन नहीं सकता,जो आकर्षक है वो कुछ दे नहीं सकता || आचार्य प्रशांत (2015)
5min
44reads

प्रश्नकर्ता: जिस व्यक्ति के जीवन में चैन नहीं है, उत्तेजना बहुत ज़्यादा है। इसका मतलब ये है कि वो पदार्थों के तल पर ही जी रहा है। सर, प्रश्न ये है कि उसको अगर शिफ्ट करना है तो कैसे करें?

आचार्य प्रशांत: जाँच करें, थोड़ा प्रयोग करें। जो कुछ बहुत…

मात्र इन्द्रियाँ ही शरीर व संसार का प्रमाण || आचार्य प्रशांत (2014)
Emotions
मात्र इन्द्रियाँ ही शरीर व संसार का प्रमाण || आचार्य प्रशांत (2014)
6min
39reads

श्रोता: सर एक बात समझ में नहीं आती कि हम हैं क्या? जो हमारी इन्द्रियाँ हमें दिखाती हैं हम वही हैं क्या या कुछ और?

वक्ता: हमें बड़ी आसानी हो जाती है यह मान लेने में कि जो कुछ भी दिखाई दे रहा है वो सिर्फ द्वैत का एक भ्रम…

मन जब आत्मा में दृढ नहीं होता तब वो अपनी ही बनाई दुनिया में भटकता है || आचार्य प्रशांत (2015)
Duality
मन जब आत्मा में दृढ नहीं होता तब वो अपनी ही बनाई दुनिया में भटकता है || आचार्य प्रशांत (2015)
7min
29reads

प्रश्न: सर, ऐसा क्यों होता है कि हमारे विचार और हमारी जो करनी है उसमें अन्तर रहता है? कि हम कुछ जानते नहीं हैं कि क्या चीज़ सही है, कि ऐसा ना करके कुछ स्वभाव ही अलग रहता है। स्थिरता नहीं रहती तीनों चीज़ों में।

वक्ता: विचार और…

बदलाव से ही डरता है ये निरंतर बदलता मन || आचार्य प्रशांत (2015)
Fear
बदलाव से ही डरता है ये निरंतर बदलता मन || आचार्य प्रशांत (2015)
5min
17reads

प्रश्न: आपने अभी कहा कि जो बदल जाए वो झूठ है। तो जब मैं अपने जीवन को देखता हूँ तो मेरे जीवन में तो हर एक चीज़ बदल ही रही है। जैसे मन की स्थिति बदलती है, तो वह भी बदलाव ही है। कृपया प्रकाश डालें।

वक्ता: और जब कुछ…

माया की स्तुति में रत मन सत्य की निंदा करेगा ही || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
Saint Kabir
माया की स्तुति में रत मन सत्य की निंदा करेगा ही || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
6min
29reads

जो कोई निन्दै साधु को, संकट आवै सोय।

नरक जाय जन्मे मरै, मुक्ति कबहू न होय।।

~ कबीर

वक्ता: *(दोहा पढ़ते हुए)*“जो कोई निन्दै साधु को, संकट आवै सोय। नरक जाय जन्मे मरै, मुक्ति कबहू न होय।”

साधु माने कौन है? तुम साधु से जब सम्प्रक्त…

तुम्हारी और संसार की प्रकृति है अनित्यता || आचार्य प्रशांत (2013)
Ego
तुम्हारी और संसार की प्रकृति है अनित्यता || आचार्य प्रशांत (2013)
4min
9reads

श्री प्रशांत: कम्युनिकेशन (संचार) की ज़रुरत हमेशा से बरकरार रही है। टेलीग्राम (तार), वायरलेस फ़ोन, और जानकारी एक जगह से दूसरी जगह भेजने का, इन सबसे ज़्यादा सुविधाजनक तरीका तो इन्टरनेट हो गया है।

बदला क्या है?

‘द नीड टू कम्यूनिकेट’ (संवाद करने की ज़रुरत) तो वही की वही…

मोह त्यागो, और त्याग को भी त्यागो || आचार्य प्रशांत (2013)
Duality
मोह त्यागो, और त्याग को भी त्यागो || आचार्य प्रशांत (2013)
3min
7reads

श्री प्रशांत: अगर मोह को त्यागना है तो त्याग को भी त्यागना होगा। पर चूँकि त्याग क्रम-विकास की ही देन है, तो क्रम-विकास को स्वयं को ही त्यागना होगा।

क्या हम कुछ ऐसा त्याग सकते हैं जो कभी हमारे पास था ही नहीं?

क्या है हमारे करने को और क्या…

माया नहीं दीवार ही, माया सत्य का द्वार भी || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
Saint Kabir
माया नहीं दीवार ही, माया सत्य का द्वार भी || आचार्य प्रशांत, संत कबीर पर (2014)
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माया तो ठगनी बनी, ठगत फिरे सब देश।

जा ठग ने ठगनी ठगी, ता ठग को आदेश।।

~ कबीर

प्रश्न: सर,माया के ठग लिए जाने का क्या अर्थ है?

वक्ता: इस बात से क्या अर्थ है – *‘*जा ठग ने ठगनी ठगी’? इसका क्या अर्थ है? माया कैसे ठग…

बदले स्थिति न बदले तुम्हारा स्थान, राजा वो जो आसन पर विराजमान || आचार्य प्रशांत (2014)
Goal
बदले स्थिति न बदले तुम्हारा स्थान, राजा वो जो आसन पर विराजमान || आचार्य प्रशांत (2014)
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वक्ता: आप बिंदु पर बैठते हैं। आपका आसन वहाँ पर है, वहाँ कुछ बदलता नहीं है। आपका आसन थोड़ा सा डोलता है, मन का क्षेत्र शुरू हो जाता है। वहाँ तीन खंड होते हैं – जाग्रृत, सुषुप्ति, स्वप्न। दो ही मान लीजिये – जगना और सोना। पर दो खंड तो…

जीत में जीते नहीं, न हार में हारे || आचार्य प्रशांत (2014)
Duality
जीत में जीते नहीं, न हार में हारे || आचार्य प्रशांत (2014)
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प्रश्न: सर, अगर हम किसी को कुछ समझा नहीं पा रहे तो इसमें हमारी तरफ से कहाँ चूक है?

वक्ता:न चूक है, न निशाना है; लीला है । उसमें चूकने का कोई सवाल नहीं है । तुम्हें नहीं पता कि तुम चूक-चूक कर कहाँ पहुँचे जा रहे हो ।…

आत्म-सम्मान और अहंकार || आचार्य प्रशांत (2014)
Beliefs
आत्म-सम्मान और अहंकार || आचार्य प्रशांत (2014)
6min
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प्रश्न: सर, ईगो(अहंकार) और सेल्फ-रेस्पेक्ट(स्वाभिमान), ये दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं, या ये सिर्फ हमारे सोचने के ऊपर है?

वक्ता: ‘सेल्फ-रेस्पेक्ट’ तो बाद में आता है। हम जिसको रेस्पेक्ट ही कहते हैं, वही क्या है? तुम किसी की इज्ज़त करती हो उस बात का अर्थ क्या होता है? ध्यान से बताना।…

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Saint Kabir
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asdasdknams kdas dlkas dasd

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Maturity
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dfbjdsh

Why do I restless
Shri Krishna
Why do I restless
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Hindi article on restlessness by AP

Title
Shri Krishna
Title
1min
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Questioner(Q): What is the process of clarity? Is it just listening with immersion and no resistance? What is Truth? How we decide it?

Acharya Prashant (AP): Listening without effort, plus if there is Truth in what you hear, there is change and transformation, and that Truth becomes the master. We…

Why do I restless
Bhagavad Gita
Why do I restless
9min
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ऑपरेशन 2030
Bhagavad Gita
ऑपरेशन 2030
11min
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पृथ्वी को बचाने के लिए यूनाइटेड नेशंस की सीओपी ने यह शर्त रखी थी कि 2030 तक वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री से अधिक नहीं बढ़ना चाहिए। हमने वह सीमा 2025 में ही लांघ दी है। यह आने वाले बहुत-बहुत बड़े विनाश का संकेत है। आदमी के इतिहास में इससे ख़तरनाक पल कभी नहीं आया। उस ख़तरे को चुनौती देने के लिए ही यह "ऑपरेशन 2030" है, जिसका उद्देश्य है कि आम आदमी में चेतना जगाई जाए — “देखो, तुम्हारा ग्रह विनाश की ओर कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है। तुम अपने बच्चों के लिए एक ऐसा ग्रह छोड़कर जा रहे हो, जहाँ आफ़तें ही आफ़तें होंगी।”

फ़िल्में: मनोरंजन या मनोविकार? || आचार्य प्रशांत (2020)
Mind
फ़िल्में: मनोरंजन या मनोविकार? || आचार्य प्रशांत (2020)
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक तरफ़़ तो फ़िल्में हमें मनोरंजन देती हैं, हँसाती हैं, रुलाती हैं और दूसरी ओर उसी इंडस्ट्री से दुःखद और चौका देने वाली खबरें भी आती रहती हैं। कुछ कहिए।

आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो हमें इस धारणा से बाहर आना होगा कि फ़िल्में हमें मात्र मनोरंजन…

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Bhagavad Gita
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दूसरों के सम्मान से पहले अपना सम्मान
Inferiority
दूसरों के सम्मान से पहले अपना सम्मान
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प्रश्नकर्ता: आज सुबह के सत्र में चर्चा हुई थी भय और सम्मान के बारे में। उस चर्चा में कुछ लोगों का कहना था कि हम अपने अभिभावकों की बात इसलिए मानते हैं क्योंकि हमें उनसे भय है, और कुछ का कहना था कि हम उनकी बात इसलिए मानते हैं क्योंकि…

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