
यत्राज्ञानाद्भवेद्दवैतमितरस्तत्र पश्यति। आत्मत्वेन यदा सर्वं नेतरस्तत्र चाण्वपि।।
“जहाँ अज्ञान से द्वैत-भाव होता है, वहीं कोई और दिखलाई देता है। जब सब आत्मरूप ही दिखाई देता है, तब अन्य कुछ भी नहीं रहता।”
~अपरोक्षानुभूति (श्लोक ५३)
यस्मिन्सर्वाणि भूतानि ह्यात्मत्वेन विजानतः। न वै तस्य भवेन्मोहो न च शोकोऽद्वितीयतः।।
“उस अवस्था में सम्पूर्ण…

आचार्य प्रशांत: हम एक भूत, माने एक पदार्थ की उत्पत्ति का कारण सदा दूसरे पदार्थ को मानते हैं और बात निपटा देते हैं। भूत माने मैटेरियल, भौतिक पदार्थ। जब आप एक भूत की उत्पत्ति का कारण दूसरे भूत को मानते हो और दूसरे की उत्पत्ति की वजह तीसरे को…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आपने बताया है कि सब सांसारिक विषय मूल में एक ही हैं, बस रूप अलग-अलग हैं। जैसे ख़राब दूध से बनी सभी मिठाइयाँ ख़राब ही होंगी। चाहे रसगुल्ला खाओ, बर्फी खाओ, रसमलाई खाओ सब गंधाएँगी और पेट ख़राब करेंगी। आचार्य जी, कृपया बताएँ कि इस संसार में…

प्रश्नकर्ता: प्रकृति हमारे प्रति इतनी बेरहम और असम्वेदनशील क्यों होती है?
आचार्य प्रशांत: प्रकृति ने ऐसा क्या किया भाई? तुम प्रकृति ही हो, तुम प्रकृति के वो विशिष्ट उत्पाद हो जिसके माध्यम से स्वयं प्रकृति निर्वाण खोज रही है। मैं बार-बार कहता हूँ न कि तुम अहंकार हो; अहंकार कोई…

आचार्य प्रशांत: कोई ऐसा नहीं है जो समाप्त हो जाना चाहता हो। बड़ी अजीब बात है ये; कोई आयु हो, कोई वर्ण हो, कोई रंग हो, कोई लिंग हो, कोई देश हो, कोई काल हो - जैसे हम सब के भीतर बने रहने की एक निरंतर अभीप्सा रहती है। कोई…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, समय बदल रहा है, और जिस क्षेत्र में मैं कार्यरत हूँ उस क्षेत्र में धीरे-धीरे मंदी आ रही है। मैं इस मंदी से आंतरिक रूप से बहुत ज़्यादा प्रभावित हुआ हूँ। कारणवश अब आर्थिक रूप से भी मैं बिल्कुल खाली हो गया हूँ, और इस प्रक्रिया में…

प्रश्न: आचार्य जी, जीवन की छोटी-छोटी बातों में भी भ्रमित रहता हूँ कि क्या करना उचित है और क्या अनुचित।
आचार्य प्रशांत: एक फ़िल्म देखी थी मैंने। उसमें समझ ही में न आए कि नायक इतना पिट क्यों रहा है। पिक्चर का क्लाइमेक्स है, चरम पर पहुँच चुकी है। दुश्मनों…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मुझे ये जानना है कि – जन्म और मृत्यु की ये जो प्रक्रिया है, ये क्यों हो रही है? कोई आदमी जन्म ले रहा है, तो क्यों ले रहा है? और मर रहा है, तो क्यों मर रहा है? जो भी लोग बुद्धत्त्व को उपलब्ध हो…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अकेले रहना बेहतर है, या दूसरों के साथ?
आचार्य प्रशांत: दोनों में कुछ पता चलता है। जब किसी के साथ हो, तो तुम्हें पता चलता है कि तुम्हारे मन की क्या दशा होती है जब कोई सामने आता है। परख हो जाती है न। नहीं तो तुम…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आत्मा सत्य है, शुद्ध चैतन्य है, यह हम सब जानते हैं। क्या यह जगत जिसे हम मिथ्या जानते हैं, यह भी सत्य है?
आचार्य प्रशांत: शरीर है, इसका काम है पचास चीज़ों का अनुभव करना। पूरा शरीर ही एक इन्द्रिय है, पूरा शरीर ही अपने आप में…

आचार्य प्रशांत: मैं आशा करता हूँ कि हम सभी को उत्कृष्टता की चाह है। यह मेरी कल्पना है, आशा है कि मैं गलत नहीं हूँ। क्या मैं गलत हूँ? हम में से कितने हैं, जो उत्कृष्टता नहीं चाहते?
देखिये, होता क्या है कि जिस तरीके से हम बड़े होते…

आचार्य प्रशांत: कुंदन ने बात कही है एक कि अगर यह स्पष्ट ही दिखने लग जाए कि दुनिया कैसी है तो क्या इस दिखने के बाद दुनिया वैसी ही रह जाती है?
नहीं, बिलकुल भी नहीं!
क्योंकि दुनिया रूप और आकर से ज़्यादा नाम और धारणा है, एक बार आपकी…

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानी सा निशा पश्यतो मुनेः।।
वो जो सबके लिए रात है, उसमें संयमी जागृत रहता है।
वह जिसमें सब जगे होते हैं, वह दृष्टा मुनि के लिए रात्री है।
आचार्य प्रशांत: भगवद्गीता के दूसरे अध्याय से…

प्रश्नकर्ता: अध्यात्म में “अन्दर” और “बाहर” से क्या आशय होता है?
आचार्य प्रशांत: जो कुछ भी मन की पकड़ में आ सके वो बाहर है। जिस भी चीज़ के बारे में तुम सोच सको वो बाहर है। जिसको तुम अन्दर कहते हो उसके बारे में भी तुम सोच लेते हो…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम हर बार कहते रहते हैं कि सब माया है, ये माया है, वो माया है। जैसे मैं यहाँ पर हूँ, तो मैं अभी कैसे अंतर करूँगा कि ये एक साफ़ मन का निर्णय होना चाहिए, और ये एक प्राप्त और अधिकृत मन का निर्णय होना…

उमरिया धोखे में खोये दियो रे पाँच बरस का भोला भला, बीस में जवान भयो। तीस बरस में माया के कारण, देश-विदेश गयो। उमर सब धोखे में… चालीस बरस अंत अब लागै, बाढ़ै मोह गयो। धन धाम पत्र के कारण, निस दिन सोच भयो।। बरस पचास कमर भई टेढ़ी, सोचत…

प्रश्न: यहाँ तक तो ठीक है कि मैं जानूँ कि दुनिया कैसी है? मेरे भाई कैसे हैं? मेरा दोस्त कैसा है? मेरी संगति कैसी है? समाज कैसा है? यहाँ तक तो मेरा मन अनुमति देता है पर जब बात आती है अपने को भीतर से जानने की तब बहुत डर…

श्रोता१: जो भी माइंड (मन) में थॉट्स (विचार) घूमते रहते हैं, वो तो हमेशा होते ही हैं।
वक्ता: हाँ, हाँ।
श्रोत१: लेकिन उनके बारे में सोचने लगता हूँ तो फ्रस्ट्रेशन अपने आप बढ़ती रहती है।
वक्ता: नहीं बढ़ेगा क्योंकि जिसको तुम फ्रस्ट्रेशन कह रहे हो ना, वो भी सिर्फ़ एक …

वक्ता : आदमी का मन ऐसा है कि वो हमेशा कार्य-कारण में जीना चाहता है| अपने से बाहर की किसी सत्ता को किसी हाल में स्वीकार करना नहीं है| वो यह कहता है कि संसार में जो हो रहा है उसके कारण हैं ही, मुझे जो मिला या नहीं मिला,…

प्रश्न: सर, एक चीज़ मन में बैठ गयी थी। ओशो ने कहा है, बाज़ार में ही रहना है, पहाड़ों में नहीं। तो अपनेआप को सिद्ध करने की चाह थी कि अब तो बाज़ार में ही रह कर शांत रहेंगे। तो वहाँ पर अभी भी संघर्ष है, अपने को साबित…

श्रोता:सर, कई बार एसा होता है कि ये जो बात है कि माइंड जो कुछ भी दिखा रहा है वो सब झूठ है, इसको माइंड नकार देता है। पर फिर बैठ के सोचते हैं तो इस दुनिया का कोई आधार भी समझ नहीं आता।
वक्ता:नहीं, ‘झूठा’ जो है…

सोया साधु जगाइए, करे नाम का जाप ये तीनो सोते भले, साकट सिंह और साँप
-संत कबीर
आचार्य प्रशांत: आध्यात्मिकता के प्राथमिक सूत्रों में ही यह है कि संत जो भी कहे, उस बात को संसार का नहीं मन का जानो, भले ही उसमें जो दृष्टांत दिया गया हो, वो…

आचार्य प्रशांत: समय को सच मानने का अर्थ है, उस सबको सच कह देना, जो समय में आया और समय में चला जाएगा। मतलब फिर यह जितने पदार्थ हैं, इन सबको सच कह देना। इसमें दिक़्क़त बस एक छोटी सी है कि यह कैसा असहाय सच है, जिसकी मौत हो…

श्रोता: सर, जो भी होता है, कोई कारण या फिर किसी तरह का कोई तरीका है क्या? एक घटना का एक हिस्सा है जो पूर्वनिर्धारित है?
वक्ता: ये सब न एक हार्मोनी है जो स्वतः ही चल रही है। स्टैंडिंग वेव्स पढ़ीं थी ना क्लास 12 में?
दो हिस्से होते…

अवधूता गगन घटा गहरानी रे।।
पच्छम दिसा से उलटी बादली, रुमझुम बरसे मेहा,
उठो ज्ञानी खेत संभारो, बह निसरेगा पानी।।१।।
निरत सूरत के बेल बनावो, बीजा बोवो निज धानी,
दुबध्या डूब जन्म नहीं पावे, बोवो नाम की धानी।।२।।
चारों कोनें चार रखवाले, चुग न जावे मृग धानी,
काटया खेत मींड़ा…

न विक्षेपो न चैकाग्रयं नातिबोधो नमूढता।
न सुखं न च वा दुःखं उपशान्तस्य योगिनः।।
~ अष्टावक्र गीता, श्लोक १०, अध्याय १८
(अर्थ: अपने स्वरुप में स्थित होकर शांत हुए तत्वज्ञानी के लिए न विक्षेप है और न एकाग्रता, न ज्ञान है और न अज्ञान, न सुख है और न दुःख)…

कबिरा नौबत आपनी, दिन दस लेहु बजाय।
वह पुर पट्टन यह गली, बहुरि न देखौ आय।।
~ संत कबीर ~
वक्ता: जो तमाशा करना है दस दिन कर लो, यहाँ पर दोबारा नहीं आओगे। बार-बार कबीर हमें स्मरण कराते हैं ‘मौत’ का। ‘मौत’ कबीर के यहाँ बार-बार, बार-बार सुनने को…

हद चले सो मानवा, बेहद चले सो साध।
हद बेहद दोनों तजे, ताका मता अगाध।।
~ संत कबीर ~
वक्ता: और ये आपने लिखा है:
हद टपे सो औलिया, बेहद टपे सो पीर।
हद बेहद दोनों टपे, ताका नाम कबीर।।
दोनों एक ही हैं। आदमी लगातार रहता है वर्जनाओं में,…

वक्ता: प्रश्न है कि अगर ये स्पष्ट ही दिखने लग जाए कि दुनिया कैसी है, तो क्या इस दिखने के बाद दुनिया वैसी ही रह जाती है?
नहीं, बिलकुल भी नहीं, क्योंकि दुनिया रूप और आकर से ज़्यादा नाम और धारणा है। एक बार आपकी आँखें साफ़ हो गईं उसके…

प्रश्न: विचार क्या हैं?
वक्ता:
विचार क्या हैं? सारी मानसिक गतिविधियाँ ही विचार हैं।
यह ही विचार की परिभाषा है। मन में जो हो रहा है, उसी का नाम विचार है।
श्रोता: सर, क्या सभी मानसिक गतिविधियाँ विचार हैं? जो शब्द आ रहे हैं वो भी?
वक्ता: हाँ बिलकुल, दुनिया…

प्रश्नकर्ता: जिस व्यक्ति के जीवन में चैन नहीं है, उत्तेजना बहुत ज़्यादा है। इसका मतलब ये है कि वो पदार्थों के तल पर ही जी रहा है। सर, प्रश्न ये है कि उसको अगर शिफ्ट करना है तो कैसे करें?
आचार्य प्रशांत: जाँच करें, थोड़ा प्रयोग करें। जो कुछ बहुत…

श्रोता: सर एक बात समझ में नहीं आती कि हम हैं क्या? जो हमारी इन्द्रियाँ हमें दिखाती हैं हम वही हैं क्या या कुछ और?
वक्ता: हमें बड़ी आसानी हो जाती है यह मान लेने में कि जो कुछ भी दिखाई दे रहा है वो सिर्फ द्वैत का एक भ्रम…

प्रश्न: सर, ऐसा क्यों होता है कि हमारे विचार और हमारी जो करनी है उसमें अन्तर रहता है? कि हम कुछ जानते नहीं हैं कि क्या चीज़ सही है, कि ऐसा ना करके कुछ स्वभाव ही अलग रहता है। स्थिरता नहीं रहती तीनों चीज़ों में।
वक्ता: विचार और…

प्रश्न: आपने अभी कहा कि जो बदल जाए वो झूठ है। तो जब मैं अपने जीवन को देखता हूँ तो मेरे जीवन में तो हर एक चीज़ बदल ही रही है। जैसे मन की स्थिति बदलती है, तो वह भी बदलाव ही है। कृपया प्रकाश डालें।
वक्ता: और जब कुछ…

जो कोई निन्दै साधु को, संकट आवै सोय।
नरक जाय जन्मे मरै, मुक्ति कबहू न होय।।
~ कबीर
वक्ता: *(दोहा पढ़ते हुए)*“जो कोई निन्दै साधु को, संकट आवै सोय। नरक जाय जन्मे मरै, मुक्ति कबहू न होय।”
साधु माने कौन है? तुम साधु से जब सम्प्रक्त…

श्री प्रशांत: कम्युनिकेशन (संचार) की ज़रुरत हमेशा से बरकरार रही है। टेलीग्राम (तार), वायरलेस फ़ोन, और जानकारी एक जगह से दूसरी जगह भेजने का, इन सबसे ज़्यादा सुविधाजनक तरीका तो इन्टरनेट हो गया है।
बदला क्या है?
‘द नीड टू कम्यूनिकेट’ (संवाद करने की ज़रुरत) तो वही की वही…

श्री प्रशांत: अगर मोह को त्यागना है तो त्याग को भी त्यागना होगा। पर चूँकि त्याग क्रम-विकास की ही देन है, तो क्रम-विकास को स्वयं को ही त्यागना होगा।
क्या हम कुछ ऐसा त्याग सकते हैं जो कभी हमारे पास था ही नहीं?
क्या है हमारे करने को और क्या…

माया तो ठगनी बनी, ठगत फिरे सब देश।
जा ठग ने ठगनी ठगी, ता ठग को आदेश।।
~ कबीर
प्रश्न: सर,माया के ठग लिए जाने का क्या अर्थ है?
वक्ता: इस बात से क्या अर्थ है – *‘*जा ठग ने ठगनी ठगी’? इसका क्या अर्थ है? माया कैसे ठग…

वक्ता: आप बिंदु पर बैठते हैं। आपका आसन वहाँ पर है, वहाँ कुछ बदलता नहीं है। आपका आसन थोड़ा सा डोलता है, मन का क्षेत्र शुरू हो जाता है। वहाँ तीन खंड होते हैं – जाग्रृत, सुषुप्ति, स्वप्न। दो ही मान लीजिये – जगना और सोना। पर दो खंड तो…

प्रश्न: सर, अगर हम किसी को कुछ समझा नहीं पा रहे तो इसमें हमारी तरफ से कहाँ चूक है?
वक्ता:न चूक है, न निशाना है; लीला है । उसमें चूकने का कोई सवाल नहीं है । तुम्हें नहीं पता कि तुम चूक-चूक कर कहाँ पहुँचे जा रहे हो ।…

प्रश्न: सर, ईगो(अहंकार) और सेल्फ-रेस्पेक्ट(स्वाभिमान), ये दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं, या ये सिर्फ हमारे सोचने के ऊपर है?
वक्ता: ‘सेल्फ-रेस्पेक्ट’ तो बाद में आता है। हम जिसको रेस्पेक्ट ही कहते हैं, वही क्या है? तुम किसी की इज्ज़त करती हो उस बात का अर्थ क्या होता है? ध्यान से बताना।…




Questioner(Q): What is the process of clarity? Is it just listening with immersion and no resistance? What is Truth? How we decide it?
Acharya Prashant (AP): Listening without effort, plus if there is Truth in what you hear, there is change and transformation, and that Truth becomes the master. We…


पृथ्वी को बचाने के लिए यूनाइटेड नेशंस की सीओपी ने यह शर्त रखी थी कि 2030 तक वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री से अधिक नहीं बढ़ना चाहिए। हमने वह सीमा 2025 में ही लांघ दी है। यह आने वाले बहुत-बहुत बड़े विनाश का संकेत है। आदमी के इतिहास में इससे ख़तरनाक पल कभी नहीं आया। उस ख़तरे को चुनौती देने के लिए ही यह "ऑपरेशन 2030" है, जिसका उद्देश्य है कि आम आदमी में चेतना जगाई जाए — “देखो, तुम्हारा ग्रह विनाश की ओर कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है। तुम अपने बच्चों के लिए एक ऐसा ग्रह छोड़कर जा रहे हो, जहाँ आफ़तें ही आफ़तें होंगी।”

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, एक तरफ़़ तो फ़िल्में हमें मनोरंजन देती हैं, हँसाती हैं, रुलाती हैं और दूसरी ओर उसी इंडस्ट्री से दुःखद और चौका देने वाली खबरें भी आती रहती हैं। कुछ कहिए।
आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो हमें इस धारणा से बाहर आना होगा कि फ़िल्में हमें मात्र मनोरंजन…


प्रश्नकर्ता: आज सुबह के सत्र में चर्चा हुई थी भय और सम्मान के बारे में। उस चर्चा में कुछ लोगों का कहना था कि हम अपने अभिभावकों की बात इसलिए मानते हैं क्योंकि हमें उनसे भय है, और कुछ का कहना था कि हम उनकी बात इसलिए मानते हैं क्योंकि…