
तुम छः-छः, आठ-आठ साल की लड़की को ‘मुन्नी बदनाम हुई’ और, ‘मैं तो तेरा बटर-चिकन हूँ’ और इस तरह के गानों पर नचा रही हो, यह कला है? आग लगे ऐसी कला को! देखो न वह किस तरीके की भाव भंगिमा दिखा रही है, देखो वह आँखों से कैसे इशारे…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम! मेरा प्रश्न है कि क्या गृहस्थ जीवन होकर भी अध्यात्म जीवन में ज़्यादा समय दे सकते हैं? क्या यह सम्भव है?
आचार्य प्रशांत: दो तरीके होते हैं जीने के, या तो यह कह दो कि, "मैं गृहस्थ हूँ और मुझे अध्यात्म भी चलाना है।" या यह…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, अपने परिजनों की मृत्यु के साथ पीड़ा क्यों आती है?
आचार्य प्रशांत: दो बातें हैं मोटी-मोटी। पहली बात तो ये है कि जो कुछ भी अपना है वो अपनी हस्ती का, अपनी अस्मिता का अंग बन जाता है तो वो जब छिनता है तो ऐसा लगता है…

प्रश्नकर्ता: जब मैं आपको नहीं सुनता था तो ऐसा सोचता था कि जो माता-पिता शादी करवाते हैं वह कुदरती घटना है। क्योंकि हम जन्मे वह भी कुदरती, तो जो समाज में शादी हुई वह भी कुदरती घटना है और जो लव मैरिज करते हैं वह आर्टिफिशियल है लेकिन आपको सुनते-सुनते…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, परिवारजन या रिश्तेदार की मृत्यु को देखकर भयभीत हो जाती हूँ, कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: अध्यात्म के साथ रहिए। पूरा अध्यात्म ही डर से मुक्ति पाने के केंद्रीय लक्ष्य को लेकर है और सब डरों में मूल डर और सबसे बड़ा डर मृत्यु का ही डर…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। आज आश्रम आते हुए मन ज़रा दुविधापूर्ण रहा, आँखें अश्रुपूरित थीं। खयाल आ रहा था कि “देर रात घर से बाहर रहूँगी, जबकि आज दोनों बेटे घर पर ही हैं।“ मन चाहता था उनके साथ समय बिताऊँ, घर से बाहर ना जाऊँ।
आचार्य प्रशांत: जो आप…

प्रश्न: आचार्य जी, मेरा एक बेटा आठ साल का है और एक दस साल का। उनका मन बिलकुल भी पढ़ाई में नहीं लगता, वो बिलकुल भी पढ़ना नहीं चाहते। ऐसा क्या करूँ कि उनका मन पढ़ाई में लगने लगे?
आचार्य प्रशांत: तुम उन्हें पढ़ाना क्यों चाहते हो?

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, माँ-बाप के चंगुल से कैसे छूटूँ? जब भी वो मुझसे कुछ कहते हैं, मैं मन-ही-मन उनके खिलाफ़ सोचता हूँ, लेकिन कह नहीं पाता। हालाँकि मुझे पता है कि उन्होंने मेरे लिए बहुत सारे संघर्ष किए हैं, लेकिन फिर भी मैं उनकी बातों से सहमत हो नहीं पाता,…

प्रश्न: आचार्य जी, घरवालों को अध्यात्म कैसे समझाएँ?
आचार्य प्रशांत जी: देखो तिवारी जी (प्रश्नकर्ता), माँ-बाप का जीवन में एक तल पर बहुत ख़ास स्थान होता है। जब कहीं मैं ये देखता हूँ कि माँ-बाप उस तल से आगे जाकर, अनधिकृत रूप से, बच्चे के मन के दूसरे तलों पर…

प्रश्न: आचार्य जी, मुक्ति के मार्ग में एक गृहिणी के लिए क्या-क्या बाधाएँ आती हैं?
आचार्य प्रशांत जी: तुम्हारी जो पूरी गति हो रही है किसकी ख़ातिर हो रही है? कौन बैठा है उस गति के केंद्र में? किसको तुम सबसे अधिक महत्त्व दे रहे हो? प्रथम कौन है तुम्हारे…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, दुनिया में इतने कम कबीर क्यों हुए हैं? मेरे परिवारजन मुझे इसी बात का उदाहरण देकर आध्यात्मिक मार्ग से विचलित करते हैं और खुद को भी दुनिया की ओर आकर्षित पाता हूँ, कृपया स्पष्ट करें।
आचार्य प्रशांत: करोड़ों कबीर हो जाते, पर हर कबीर के पास वैसा…

श्रोता: सर, कई बार ऐसा होता है कि हमारे परिवार में कोई समस्या होती है जिसके कारण हमारा मन बहुत परेशान हो जाता है, तो हम पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाते। तो कुछ ऐसी बातें बता दीजिए जिससे हम इन परेशानियों से निकलने की कोशिश करें, और पढ़ाई पर…

आचार्य प्रशांत: आओ बात करें। मैंने सुना है आप लोगों को बात करना पसंद है। तो आओ थोड़ा और बात करें। हम पहले मिल चुके हैं?
प्रश्नकर्ता: हाँ, सर।

प्रश्न: सर, माता-पिता का प्रेम निःस्वार्थ होता है पर उनकी बात हर बार ठीक नहीं लगती। क्या करें?
वक्ता: सवाल इस बात का बिल्कुल भी नहीं है कि हम सहमत होना चाहते हैं या नहीं। है ना? बात करीब-करीब वैज्ञानिक है। जैसे विज्ञान होती है कि उसमें तुम्हारा मत या…

प्रश्नकर्ता: सर, सत्र के बाद ये सभी बाते हम तो समझ रहे हैं कि हमें क्या चाहिए, जागरुकता बढ़ गई है, हम समझ सकते हैं लेकिन माता-पिता को कैसे समझाएँ? वो हमारा भला ही चाहते हैं।
आचार्य प्रशांत: भला चाहने भर से नहीं होता। भला तो दुनिया में हर माँ-बाप…

प्रश्न: क्या माँ का अपने बच्चे के प्रति प्रेम आसक्ति है?
वक्ता: ये जो शब्द है, ‘माँ’ इसके दो अर्थ हो सकते हैं। सच तो ये है कि शब्दकोष में जितने भी शब्द पाये जाते हैं, उनके हमेशा दो अर्थ होते हैं। और दो अर्थों से मैं ये नहीं कह…

प्रश्न : माँ-बाप मुझे समझते क्यों नहीं?
वक्ता : माँ-बाप की बात नहीं है।
*विचारों से,* *पूर्वाग्रहों,* धारणाओं से लदा मन कुछ नहीं समझ सकता।

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ग्रेटर नोएडा। जीबीयू में आयोजित एक कार्यक्रम में पहुंचे आचार्य प्रशांत ने कहा कि महाशिवरात्रि केवल अनुष्ठान का पर्व नहीं, बल्कि यह मनुष्य को अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करती है। उन्होंने कहा कि शिव को केवल मूर्ति या रूप में सीमित कर देना उनकी व्यापकता को संकुचित करना…







पृथ्वी को बचाने के लिए यूनाइटेड नेशंस की सीओपी ने यह शर्त रखी थी कि 2030 तक वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री से अधिक नहीं बढ़ना चाहिए। हमने वह सीमा 2025 में ही लांघ दी है। यह आने वाले बहुत-बहुत बड़े विनाश का संकेत है। आदमी के इतिहास में इससे ख़तरनाक पल कभी नहीं आया। उस ख़तरे को चुनौती देने के लिए ही यह "ऑपरेशन 2030" है, जिसका उद्देश्य है कि आम आदमी में चेतना जगाई जाए — “देखो, तुम्हारा ग्रह विनाश की ओर कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है। तुम अपने बच्चों के लिए एक ऐसा ग्रह छोड़कर जा रहे हो, जहाँ आफ़तें ही आफ़तें होंगी।”



जो कुछ बाहर से आ रहा है, वो भाग्य के अधीन है, उस पर आपका कोई नियंत्रण नहीं। सुख-दुःख, लाभ-हानि, जन्म-मरण — सब संयोग हैं। ये इसलिए बताया गया है ताकि आप इन पर नियंत्रण करने की व्यर्थ कोशिश छोड़ दें। जिस पर नियंत्रण किया ही नहीं जा सकता, उसे नियंत्रित करने में ऊर्जा और समय व्यर्थ करेंगे। इस झूठी सुरक्षा भावना से बचें और अपनी ऊर्जा वहीं लगाएँ जहाँ वह सच में फलदायी हो सकती है।




प्रश्नकर्ता: पिछली बार चंडीगढ़ तरफ़ से आया था जी,। आप से जुड़ा था। तबजब मैं अकेला आया था, बिलकुल हताश, परेशान था। आज मेरीमेरे साथ श्रीमती जी भी आईं हैं। मेरा प्रश्न यह है जी, जैसे संतों ने कहा है—
प्रेम-गली अति सांकरी, तामे दो न समाहिं। जब मैं था…

हम कहते हैं कि अब कुछ नया करते हैं, फ़ूड योगा , मूड योगा * । कोई ऐसा शब्द नहीं है जो अब * योगा के साथ नहीं जोड़ दिया गया है। नई-नई क्रियाएँ निकल रही हैं, नई-नई प्रक्रियाएँ निकल रही हैं। ये मुद्रा, ये आसान, ये करते हैं, वो


प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, हम लोग कुछ भी करने बैठें, जैसे पढ़ने बैठें, योग करें, मैडिटेशन करें, यहाँ तक कि जब मैं आपसे ये सवाल भी पूछ रहा हूँ तो ये सवाल पूछते हुए भी मेरे दिमाग में कुछ और चल रहा है। तो प्रश्न ये है कि मन को नियन्त्रित…
(लगभग सभी हाथ उठाते हैं)
लगभग सभी,…
The UGC regulations are only a spark. The explosive material is something far more intimate: the unexamined conviction, lodged in the deepest chamber of the collective psyche, that birth determines worth and that this determination carries divine sanction. The atmosphere itself is the disease; the regulation is at best a painkiller. India’s foundational scriptures contain the strongest possible arguments against caste. The Upanishadic view begins where hierarchy ends.
अध्यात्म की रोशनी जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ती है, तो राजनीति पर भी पड़ेगी ही पड़ेगी। ऐसा कुछ नहीं है कि आध्यात्मिक आदमी राजनीति के प्रति अंधा हो जाता है। बल्कि हक़ीक़त तो यह है कि राजनीति को आध्यात्मिक लोगों की बहुत सख़्त ज़रूरत है, क्योंकि राजनेता ताक़त की ऐसी गद्दियों पर बैठते हैं, जहाँ से वो आपके जीवन को बहुत तरीके से प्रभावित करते हैं। राजनेता अगर आध्यात्मिक नहीं है, तो देश रसातल में जाएगा। राजनीति त्यागनी नहीं है, सही राजनीति करनी है।https://acharyaprashant.org/en/articles/raajneeti-mein-adhyatm-kyon-zaroori-1_795988a15
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लड़की को पढ़ाई के लिए दो-सौ किलोमीटर दूर भेजना हो तो यही माँ-बाप और भाई कन्नी काट जाते हैं, और ब्याह कर वो दो-हज़ार किलोमीटर दूर जा रही हो इन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा। और पढ़ाई के लिए जाएगी तो किसी यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में रहेगी, सुरक्षा में रहेगी, हॉस्टल…
कृष्ण का खुद ऊँचा होना, कृष्ण के पूरे जीवनवृत्त में, उनकी ज़िंदगी की जो पूरी कहानी है उसमें और श्री कृष्ण की प्रेमकथा में एक सूत्र है जो साझा पिरोया हुआ है। गीता की ऊँचाई, कृष्ण के जीवन की ऊँचाई, और कृष्ण के प्रेम की ऊँचाई तीनों एक हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि कृष्ण बहुत ऊँचे हों और उनका प्रेम निचले तल का हो जाए। ये संभव नहीं है।
प्रश्नकर्ता: कृष्ण अध्याय नौ में बताते हैं कि वे सब भूतों में समभाव से व्यक्त हैं, वहीं अध्याय दस में बताते हैं कि जो कुछ भी विभूतियुक्त, कांतियुक्त और शक्ति युक्त है, वो कृष्ण की अभिव्यक्ति है। अध्याय नौ में कृष्ण कहते हैं कि ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद मैं ही हूँ…
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने:।।
जो सब जीवों के लिए रात्रि है, वह आत्मसंयमी के जागने का समय है और जो समस्त जीवों के जागने का समय है, वह आत्मनिरीक्षक मुनि के लिए रात्रि है।
—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ६९
प्रश्नकर्ता: जब…
प्रश्नकर्ता: नमस्कार, सर। आज का सबसे पहला प्रश्न जो है वह सनातन के ऊपर है कि सनातन माने क्या? और ऐसा क्या है जिसको वास्तविक रूप में सनातन कहा जा सकता है?
आचार्य प्रशांत: देखिए, सनातन का अर्थ होता है वो जो काल की सीमाओं से के बाहर का हो।…


प्रश्नकर्ता: पिछली बार चंडीगढ़ तरफ़ से आया था जी, आपसे जुड़ा था। तब मैं अकेला आया था, बिलकुल हताश, परेशान था। आज मेरी साथ श्रीमती जी भी आई हैं। मेरा प्रश्न यह है जी, जैसे संतों ने कहा है—
"प्रेम-गली अति सांकरी, तामे दो न समाहिं। जब मैं था तब…

उन्होंने भारतीय स्त्रियों को दयनीय स्थिति से बाहर निकालने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि अगर व्यक्ति दृढ़ निश्चय कर ले तो गरीबी, अभाव, व दुर्दशा की स्थिति पर विजय प्राप्त करके वे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ सकता है।…

आज ही के दिन, 22 अगस्त 1907 को जर्मनी में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में इन्होंने भारत का झंडा फहराया था।
आज़ादी से 40 साल पहले, भारत का झंडा फहराने वाली वे पहली भारतीय बनी। अधिकतम समय उन्होंने भारत से बाहर ही बिताया लेकिन उन्हें आज भी 'भारतीय क्रांति की जननी'…

इन्होंने पिछड़े वर्ग व महिलाओं की शिक्षा के लिए काम किया, लेकिन अधिकतर लोग इन्हें भूल चुके हैं। इन्होंने आधुनिक भारत के सबसे बड़े शिक्षा आंदोलनों में से एक को, फलने-फूलने की ज़मीन दी, लेकिन आज लोगों को उनका नाम भी नहीं पता। इन्हें भारत की पहली मुस्लिम महिला अध्यापिका…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, अर्जुन कहते हैं कृष्ण से कि ‘धृतराष्ट्र पुत्र चाहे मुझे मार भी दें तो भी उनसे लड़ना तो ग़लत ही है।‘ हमारे आम जीवन में भी ऐसे ही चलता रहता है कि हम इमोशनल ब्लैकमेल (भावनाओं से किसी को नियंत्रित करना) करते हैं बहुत बार, या…

प्रश्नकर्ता: कुछ दिन पहले आपने एक उदाहरण दिया था, एम एच ३७० का, कि हम जो खोज रहे हैं वो हमें कहीं मिल नहीं रहा इसलिए यूनिवर्स (ब्रह्माण्ड) इतना बड़ा है कि लगातार हम खोजते जा रहे हैं। तो स्पेस (स्थान) की तो बात उससे समझ में आ रही है।…

प्रश्नकर्ता: अभी आप कह रहे थे कि श्रीकृष्ण अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे हैं और बाकी सब लोग अपने बारे में बोले जा रहे हैं। तो क्या इसका सम्बन्ध इससे है कि श्रीकृष्ण का कर्मफल और प्रारब्ध कट चुका है लेकिन बाकी सभी का कर्मफल और प्रारब्ध अभी जारी…

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत ॥४०॥
"कुल के नाश से, चले आ रहे कुल के धर्म नष्ट हो जाते हैं और कुलधर्म के नष्ट होने से पाप समस्त कुल को दबा लेता है।"
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ४०
आचार्य प्रशांत तो अर्जुन के…

आचार्य प्रशांत: श्रीकृष्ण की निकटता सीखनी है अर्जुन से; अर्जुन के भीतर का कोहरा उधार नहीं ले लेना है। और हमारी हालत ज़बरदस्त है, हमारे पास वो सब कुछ है जो अर्जुन के पास है, बस एक चीज़ नहीं है। हम हर मायने में अर्जुन हैं, अर्जुन का पूरा नर्क…

कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मानिवर्तितुम्। कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥३९॥
"तो कुल क्षय से होने वाले दोष को देख-सुन कर भी हम लोगों को इस पाप से निवृत्त होने का विचार क्यों नहीं करना चाहिए?"
~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग, श्लोक ३९
आचार्य प्रशांत: इसी आशय के तर्क आगे भी…

आचार्य प्रशांत: देखिए, बात को समझिए। गीता, सांख्ययोग में, शुरू के कुछ श्लोकों के बाद से भी आरम्भ हो सकती थी। पहला अध्याय तो पूरा ही अर्जुन के विषाद का निरूपण है और दूसरे अध्याय के भी कुछ आरंभिक श्लोकों में अर्जुन की ही व्यथा है। कृष्ण की ज्ञानवर्षा तदोपरांत…