प्रश्न: कुछ महीने पहले जीवन की हर गतिविधि के प्रति उत्तेजना थी, अब नहीं है, समझ नहीं पा रहा हूँ कि चल क्या रहा है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि सब पता है लेकिन बार-बार सवाल उठता है, ”क्या मैं इतना कमज़ोर हूँ जीवन को जानने के लिए? मैं ख़ुद को क्यों नहीं जान सकता?”
श्रोता: शुभम (श्रोता को इंगित करते हुए) कह रहा है पहले जीवन के प्रति उत्तेजना थी अब कोई उत्तेजना नहीं है? क्या तुम बोध शिविर की बात कर रहे हो?
श्रोता: नहीं, पहले ऐसा होता था कि मतलब पार्टी है, किसी का जन्मदिन है। हाँ, खुश हैं यह करेंगे वो करेंगे, अब खालीपन है। किसी से मतलब नहीं रह गया है, इतना अजीब सा लग रहा है कुछ दोस्त कुछ दिन पहले घर पर भी आए थे तो टोक रहे थे कि ”क्यों नहीं रह गया तेरे को मतलब?” अजीब लगा समझ नहीं पा रहा था कि क्या हो रहा है।
वक्ता: नागार्जुन एक बौद्ध भिक्षु थे तो उन्होनें एक बड़ी मज़ेदार बात बोली — उनका एक ग्रन्थ है शून्यता सप्तति, बड़ी मज़ेदार बात वो बोले कि — तुमने उत्तेजना लिखा है न? उत्तेजना रहती थी। उन्होंने लिखा कि शरीर में खुजली हो अगर तो उसे खुजलाने में बड़ी उत्तेजना रहती है, बड़ा एक्साइटमेंट रहता है, बड़ा मज़ा आता है। देखा है कभी? शरीर में किसी जगह पर खुजली हो जाए, खाज का रोग हो जाए तो उसे खुजलाने में कितना मज़ा आता है? फिर उन्होंने अगली पंक्ति लिखी कि उससे भी ज़्यादा मज़ा है, अगर खुजली हो ही न।
बात समझ में आ रही है?
हम उत्तेजना बोलते ही किसको हैं, हम कहते ही कब हैं कि मज़ा आ गया? हमें मज़ा आता ही तब है जब पहले हमें बीमारी हो। पहले खुजली होनी चाहिए फिर उसे खुजलाने में बड़ा मज़ा आता है, पहले कष्ट होना चाहिए। तुम उत्तेजित हो सको उसके लिए ऊब होनी ज़रूरी है। उत्तेजना के लिए


