आचार्य प्रशांत: अष्टावक्र सत्तरवें अध्याय में ‘सव्छेन्द्रियों’ की बात करते हैं, स्वक्ष इन्द्रियाँ। तो प्रिय कह रही हैं की इससे क्या अर्थ हुआ? ‘स्वक्ष इन्द्रिययाँ’ मैं एक ही शब्द बोलूँ अभी, उसको कुछ लोग बड़े साधारण तरीके से सुन लेंगे। कुछ उस पर मुँह बिसोरने लगेंगे। कुछ हँसदेंगे। एक सरल चित ऐसा भी हो सकता है जिसे उसमे ऐसा कुछ ख़ास दिखाए ही न दे। और एक मन ऐसा होगा जो उसके हज़ार अर्थ कर लेगा। शब्द एक ही था।
इन्द्रियाँ सिर्फ रास्ते की तरह हैं। वो ये भी तय नहीं कर सकती हैं की उन पर कौन चलेगा। जो शब्द आपके कान में पड़ रहा है, वो शब्द अपने आप में कोई अर्थ रखता ही नहीं है। आप ये मत समझियेगा की शब्द था, अर्थ आपने दिए। वो सिर्फ एक प्रकार का स्पंधन है, एक ध्वनि है। वो कान में पड़ता है, उसके बाद उसमें जितनी भावना भरी जाती है वो हमारे दवारा भरी जाती है। ‘स्वक्ष इन्द्रिययाँ’ का अर्थ ये नहीं है की उसमे स्वक्ष भावना भरी जाए। उसका अर्थ ये है की उसमें कोई भी भावना भरी ही न जाए। इसी कारण ऐसा आदमी देखता हुआ भी नहीं देखता, सुनता हुआ भी नहीं सुनता।
हमने पहले बात करी हुई है की मन को ऐसा कर लो की वो गन्दगी की तरफ आकर्षित ही न हो।
हमने कबीर को उद्द्रित किआ था कि
पहले तो मन काग था, करता जीवन घात।





