जहाँ समय है, वहाँ कर्मफल है || आचार्य प्रशांत, श्री अष्टावक्र पर (2014)

वक्ता:अष्टावक्र गीता, ग्यारहवाँ अध्याय, तीसरा श्लोक :
आपदः सम्पदः काले दैवादेवेति निश्चयी
तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वांछति न शोचति
संपत्ति (सुख) और विपत्ति (दुःख) का समय प्रारब्धवश (पूर्व कृत कर्मों के अनुसार) है, ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला संतोष और निरंतर संयमित इन्द्रियों से युक्त हो जाता है। वह न इच्छा करता है और न शोक।
प्रश्न:यहाँ पूर्व कृत कर्मों से क्या अभिप्राय है? इसे कैसे समझा जाए?
वक्ता:आप दो हैं।जिसमें से दूसरा पहले की लीला है। तो वस्तुतः आप एक ही हो। लेकिन दूसरे की दृष्टि से जब भी देखेंगे, तो भेद दिखाई देगा, दो अलग–अलग दिखाई देंगे। तो व्यवहारिक रूप से यह कहा जा सकता है कि हम दो हैं। कैसे दो हैं? एक वो जो समय में जीता है, जिसका आदि-अंत है, जो कार्य-कारण में जीता है। उसकी सीमाएँ हैं। जिसकी इन्द्रियगत नहीं होती है। और दूसरे आप वो हैं, जिसमें गहराई है, जिसमें फैलाव नहीं है, जिसमें विस्तार नहीं है, जो समय में नहीं है, जो बिंदु सामान है। उसका कोई आदि-अंत नहीं है।
जो समय में जीता है उसके ऊपर समय का प्रभाव पड़ता है; मात्र उसको। आपके पास ऐसा जो कुछ है, जो समय से आया है, उस पर समय का असर ही पड़ेगा। वो कर्मफल के सिद्धांत के भीतर ही चलेगा। शरीर आपको समय ने दिया है, तो शरीर पर समय का असर पड़ेगा। शरीर की उम्र बढ़ेगी, परिपक्व होगा, फिर ज़रा जीर्ण होगा और अंततः मृत्यु को प्राप्त होगा। कोई ये चाहे भी कि शरीर समय के पार हो जाए, तो ये हो नहीं सकता है क्योंकि शरीर ही समय है, समय का उत्पाद है। मन भी आपको समय ने दिया है। आपके मन में अभी जो विचार हैं, और विचारों के नीचे जो वृत्तियाँ हैं ये और कहाँ से आई? सब संसार की देन है। संसार माने समय, संसार और समय अलग-अलग नहीं हैं।



