तुम शोर मचाओ। जब परमात्मा के लिए शोर मचाते हो, तो वो शोर भजन कहलाता है। मीरा गा रही है, रहदास गा रहे है, दादु गा रहे हैं, फरीद गा रहे हैं, कबीर गा रहे हैं, ये और क्या है? विरह में जब एक जोगी गाता है और रूठे यार को मनाता है, बुलाता है, तो वैसा ही है जैसे कोई बच्चा मां के लिए शोर मचाता है। चूंकि तुम अस्तित्व के मालिक को बुला रहे हो, इसीलिए अब ये शोर अस्तित्व के साथ हिल-मिल जाता है, संगीत बन जाता है। शोर में और संगीत में यही अंतर है। जो शब्द तुमने किसी और की आशा में, प्रतीक्षा में कहा, वो शोर है भले उसके पीछे संगीत का कितना कौशल, कितना अभ्यास हो, फिर भी वो शोर है। कितने मंझे-मंझे संगीतकार हैं, वो गाते हैं। अपनी दृष्टि में वो बड़े संगीतज्ञ हैं पर उनमें मीरा की बात है क्या? ये जितने गायक-गायिकाएं हैं, एक से एक सधे हुए, मंझे हुए, ये कोई मीरा का मुकाबला करेंगे? और मीरा नहीं करतीं थीं अभ्यास, पर मीरा का शब्द कृष्ण के लिए था। इनका शब्द किसके लिए है? ये बुला रहे हैं पड़ोस के मोहल्ले की किसी स्त्री-पुरुष को। इनकी गायकी सिर्फ मूर्खों के कानों को संगीत लगेगी। जो इन गायकों के संगीत को सुने, उससे बड़ा अभागा दूसरा नहीं है। मैं नहीं समझता कि कबीर शास्त्रीय संगीत जानते होंगे या कोई भी संगीत जानते होंगे। पर एक प्राकृतिक बहाव है, जैसे अस्तित्व आकर उनके कानों में लय फूंक गया हो। कौन जाने कैसा था कबीर का गला। फर्क क्या पड़ता है कबीर का गला कैसा था? हमें कबीर का हृदय दिख रहा है। गले से नीचे जाना सीखो, वहां दिल मिलेगा। जहां दिल है, वहां संगीत है। संगीत गले की बात नहीं है कि रियाज़ करे जा रहे हैं, तो संगीतज्ञ कहला गए। ये दो कौड़ी के संगीतज्ञ हैं रियाज़ वाले।