दुनिया से अछूता कुछ है आपके पास? || आचार्य प्रशांत, अष्टावक्र गीता पर (2014)

अक्षयं गतसंतापमात्मानं पश्यतो मुने:।
क्व विद्या च क्व वा विश्वं क्व देहोअहम ममेति वा।।
(जो मुनि आत्मा को अक्षय व गतसंताप देखता है, उसके लिए कहाँ विद्या है और कहाँ विश्व है? उसके लिए कहाँ ‘मैं देह हूँ’, और कहाँ ‘देह मेरी है’ की भावना है?)
(अष्टावक्र गीता, १८.७४)
आचार्य प्रशांत: कुछ शब्द हैं – अच्छे शब्द हैं – लिख लीजिये: अक्षय, गतसंताप, मुनि। ‘अक्षय’ शब्द में जाना पड़ेगा, अपने भीतर कुछ ऐसा पाना पड़ेगा जो कभी कम नहीं होता तब आप इसके पास आ पायेंगे। देखिये ये श्लोक ऐसे ही नहीं हैं कि इनकी कोई आप तार्किक टीका कर दें या अनुवाद भर कर दें। ये महसूस करने की बातें हैं, ये गहराई से महसूस करने की बातें हैं।
‘अक्षय’ शब्द आपके लिए कोई मायने ही नहीं रखेगा जबतक आपने अपने भीतर कुछ ऐसा पाया ना हो जिसको दुनिया कभी हिला नहीं पाती, छोटा नहीं कर पाती। हम कैसे जीते हैं? हम ऐसे जीते हैं कि हमारा आकार उतना ही रहता है जितना हमारी परिस्थितियाँ अनुमति देती हैं। दुनिया में बड़ी ताकत होती है, परिस्थितियों में बड़ी ताकत होती है हमें छोटा कर देने की, हमें बड़ा कर देने की। हमारा क्षय बड़ी जल्दी हो जाता है।
हम लगातार उसमें जीते हैं जो टूट रहा है, जो गल रहा है, और फिर इसी कारण फिर वो लगातार बन भी रहा है; इसी बनते-बिगड़ते में हम जीते हैं| क्षय लगातार है; अक्षय को हमने जाना नहीं है, अक्षय को हमने ज़रा भी जाना नहीं है। होना ये चाहिए आप जैसे ही इस श्लोक को पढ़ें और शब्द सामने आये ‘अक्षय’ तो आपके भीतर से एक आवाज़ निकले, “हाँ मैं जनता हूँ, ‘अक्षय’ का मुझे पता है”, तब इसमें रस आएगा आपको अन्यथा आप कुछ ऐसा सा बोल देंगे जिसमें कुछ बात नहीं बनेगी, उसमें कुछ रस ही नहीं आएगा। ऐसा लगेगा ही नहीं कि कोई असली बात बोली गई है; ऐसा लगेगा जैसे कोई सिद्धांत बोल दिया गया है, जिसमें कोई जान नहीं है। ये शब्द सामने आयें तो आँखें चमक उठें, और वो यूँ ही नहीं चमक उठती हैं कि ‘अ’ ‘क्ष’ और ‘य’ लिखा हुआ है। वो तब चमक उठेंगी जब आपकी पहचान पहले से ही हो अक्षय से।




