प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, आज आप से सेलेब्रिटी-कल्चर (सेलिब्रिटी संस्कृति) के बारे में बात करना चाहता हूँ। एक आम आदमी का मन इन सेलिब्रिटीज़ से, क्रिकेटर्स से, फिल्मस्टार्ज़ से इतना ज़्यादा क्यों डॉमिनेटेड (शासित) रहता है? उन्हीं के बारे में सोचते हैं, उन्हीं के जैसा हो जाना चाहते हैं, उनकी जैसी बॉडी (शरीर) चाहते हैं।
आचार्य प्रशांत: लालच है और डर है। देखो, हर इंसान अपनी ज़िन्दगी से नाखुश है। कोई भी नहीं है जिसके मन में संतुष्टि हो। लेकिन लगता सबको यही है कि कोई तो और होगा जो शायद संतुष्ट होगा, जिसको ज़िन्दगी में सब कुछ मिल गया है जो होना चाहिए। तो फ़िर हम इन लोगों की ओर देखते हैं जिन्हें आप सेलिब्रिटीज़ बोलते हो। और उनको देखते हैं, उनसे डरते भी हैं, उनके जैसा बन भी जाना चाहते हैं, यही आम-आदमी की कहानी है। ये जाँचपड़ताल कोई नहीं करता है कि जिसकी ओर तुम देख रहे हो उसकी अपनी ज़िन्दगी कैसी है, उसके मन का अपना आंतरिक माहौल कैसा है, उसको क्या वाकई वो सब कुछ मिला है जिसकी तुमको चाहत है?
चकाचौंध की बात है बस और कुछ नहीं। इसी चकाचौंध में फँसकर आम-आदमी अपनी पूरी ज़िन्दगी गुज़ार देता है, ख़राब कर लेता है, मर जाते हैं।
प्र: नहीं, ये भी देखा है कि ये जो सेलिब्रिटीज़ हैं, ये एडवरटाइजमेंट्स (विज्ञापन) भी बहुत करते हैं और...
आचार्य: पैसा है उसमें।


